अगस्त 2026 के अंत में केरल के कोच्चि में हुए हब्बुल रसूल सम्मेलन में सुन्नी मुस्लिम विद्वान कांथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार, जिन्हें शेख अबूबक्र अहमद भी कहा जाता है, ने महिलाओं को लेकर एक बयान दिया, जिसने काफी विवाद खड़ा कर दिया। कुछ सुन्नी मुसलमान उन्हें भारत का ग्रैंड मुफ्ती मानते हैं। वे समस्ता केरल जमिय्यतुल उलमा,एपी गुट और ऑल इंडिया सुन्नी जमिय्यतुल उलमा के जनरल सेक्रेटरी हैं। उनकी उम्र लगभग 95 साल है।
मुख्य बयान क्या था?
उन्होंने कहा कि महिलाओं को घर के अंदर ही रहना चाहिए और सार्वजनिक क्षेत्र में नहीं आना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि पवित्र कुरान यही कहता है। उनके शब्दों में, “महिलाओं को घर के अंदर ही रहना चाहिए। उन्हें सार्वजनिक जीवन में बाहर नहीं आना चाहिए। पवित्र कुरान यही कहता है।”
उन्होंने महिलाओं की तुलना सोने के गहनों या हार से की। उन्होंने समझाया कि सोने का हार खरीदने के बाद उसे सावधानी से डिब्बे या अलमारी में रखा जाता है ताकि उसकी सुंदरता बनी रहे। अगर उसे सड़क किनारे छोड़ दिया जाए तो लोग छूते हैं, जिससे उसकी सुंदरता और कीमत कम हो जाती है। उन्होंने कहा, “अगर हार की सुंदरता बनाए रखनी है तो उसे सुरक्षित डिब्बे में रखना पड़ता है। अगर महिलाओं को इस तरह सार्वजनिक क्षेत्र में लाया गया तो बड़ी तबाही हो सकती है। इसी वजह से इस्लाम ने महिलाओं के लिए पर्दा व्यवस्था तय की।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका मकसद महिलाओं को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उनका सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। उन्होंने इस्लाम के ऐतिहासिक योगदान का जिक्र भी किया – जैसे इस्लाम से पहले अरब में कन्या हत्या प्रचलित थी, जिसे इस्लाम ने रोका, और महिलाओं को संपत्ति तथा विरासत का अधिकार दिया। उनके अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओं पर प्रतिबंध भी इसी सम्मान का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि समस्ता के विद्वान लगभग 100 साल से यही सिखाते आए हैं, जिससे महिलाओं की गरिमा बनी रही।
यह बयान उनके गुट द्वारा हाल ही में जारी एक सर्कुलर के बाद आया था। उसमें धार्मिक कार्यक्रमों में महिलाओं को गैर-महरम पुरुषों के साथ स्टेज पर या सार्वजनिक जगहों पर दिखाने से परहेज करने की बात कही गई थी।
प्रतिक्रियाएं
इस बयान पर केरल में तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। महिला एवं बाल विकास मंत्री बिन्दु कृष्णा ने कहा कि भारतीय संविधान पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार देता है। उन्होंने कहा कि ऐसे बयान महिलाओं को सदियों पीछे ले जा सकते हैं और इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता। महिलाओं को स्वतंत्र रूप से घूमने, काम करने और सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने का अधिकार है।
सीपीएम की नेता पीके श्रीमती और केके शैलाजा समेत कई महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसे पुरुषवादी और प्रतिगामी बताया। सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाश्मी ने कहा कि महिलाएं संपत्ति नहीं हैं और उनकी आजादी पर सौदा नहीं किया जा सकता। उन्होंने संविधान और समानता के अधिकारों का हवाला दिया।
कुछ राजनीतिक दलों और मुस्लिम संगठनों के नेताओं ने टिप्पणी करने से परहेज किया या कहा कि इसे विवादित बनाने की कोशिश हो रही है। कुछ धार्मिक नेताओं ने मुफ्ती के पक्ष में बोलते हुए कहा कि यह शरिया के अनुरूप है।
संदर्भ और महत्व
कांथापुरम केरल के पारंपरिक सुन्नी विद्वानों में प्रभावशाली व्यक्ति हैं। उनके संगठन मदरसे, शिक्षण संस्थान और सामाजिक काम चलाते हैं। यह बयान महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका, शिक्षा, रोजगार और धार्मिक कार्यक्रमों में भागीदारी जैसे मुद्दों पर पुरानी बहस को फिर से सामने लाया है। एक तरफ धार्मिक व्याख्या और सुरक्षा-गरिमा की बात है, दूसरी तरफ संवैधानिक समानता, महिलाओं की उपलब्धियों और आधुनिक समाज की मांगें हैं।
बयान मीडिया में व्यापक रूप से रिपोर्ट किया गया और सोशल मीडिया पर भी चर्चा हुई। मुफ्ती ने आलोचनाओं के बावजूद अपना रुख दोहराया और कहा कि धार्मिक विद्वान होने के नाते उनका फर्ज है कि वे अपनी समझ के अनुसार बोलें।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

