जातिसूचक नामों से मुक्ति की मांग: यूपी से उठी आवाज़, देशभर के नगर निकायों के लिए अहम सवाल

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वरिष्ठ अधिवक्ता फारूक अहमद ने मुख्यमंत्री से की कार्रवाई की मांग; कहा,चार साल पुराने शासनादेश का आज तक नहीं हुआ पूरी तरह अमल

 (रईस खान)

लखनऊ/उन्नाव। :क्या आज़ादी के 79 साल बाद भी हमारे शहरों और कस्बों की पहचान जाति के नाम से होती रहनी चाहिए? क्या किसी मोहल्ले, वार्ड या बस्ती का नाम किसी विशेष जाति के आधार पर रखा जाना सामाजिक बराबरी और आधुनिक लोकतांत्रिक सोच के अनुकूल है?

इन्हीं सवालों को लेकर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता फारूक अहमद ने मुख्यमंत्री को एक महत्वपूर्ण पत्र भेजकर प्रदेश के नगर निकायों में अब भी मौजूद जातिसूचक और असंसदीय नामों को हटाने की मांग की है।

मामला केवल नाम बदलने का नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान, बराबरी और भेदभाव से मुक्त पहचान का है। यही वजह है कि यह मुद्दा अब राष्ट्रीय स्तर पर भी बहस का विषय बन सकता है।

पत्र में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने 7 मई 2022 को एक शासनादेश जारी कर नगर निकायों के उन वार्डों और मोहल्लों के नाम बदलने के निर्देश दिए थे, जिनके नाम किसी असंसदीय शब्द, विशेष जाति सूचक शब्द अथवा आपत्तिजनक पहचान से जुड़े हुए हैं। सरकार का स्पष्ट मानना था कि ऐसे नाम समाज में किसी वर्ग या समुदाय के प्रति नकारात्मक और अपमानजनक भावना पैदा कर सकते हैं।

चार साल बाद भी अधूरा है अमल?

फारूक अहमद ने अपने पत्र में गंभीर सवाल उठाया है कि शासनादेश जारी होने के बावजूद प्रदेश के कई नगर निकायों में आज भी जातिसूचक नाम वाले वार्ड और मोहल्ले मौजूद हैं।

पत्र के मुताबिक, नगर निकायों को अपने क्षेत्रों में ऐसे नामों की पहचान कर संबंधित बोर्ड से प्रस्ताव पास कराने और जिलाधिकारियों की संस्तुति के साथ शासन को भेजने के निर्देश दिए गए थे। लेकिन कई जगहों पर इस प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया गया।

उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की है कि प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों और नगर निकायों को फिर से स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं और समयबद्ध तरीके से ऐसे नामों को बदलने की कार्रवाई की जाए।

बांगरमऊ से सामने आया बड़ा सवाल

इस मुद्दे की शुरुआत उन्नाव जिले के बांगरमऊ नगर पालिका क्षेत्र से जुड़े एक मामले से हुई। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, पहले एक वार्ड का नाम “भंगियाना” था, जिसे जातिसूचक और असंसदीय शब्द मानते हुए शासन ने संशोधित अधिसूचना जारी कर उसका नाम बदलकर “सिद्धार्थ नगर” कर दिया था।

यह फैसला अपने आप में एक मिसाल बना। सरकारी आदेश में स्पष्ट रूप से पुराने नाम को हटाकर सम्मानजनक और गैर-जातिगत नाम अपनाया गया।

इसी उदाहरण के आधार पर अब सवाल उठाया जा रहा है कि जब एक नगर निकाय में ऐसा बदलाव संभव है, तो प्रदेश और देश के दूसरे शहरों-कस्बों में अब भी जाति आधारित नाम क्यों बने हुए हैं?

हाईकोर्ट में भी उठा था मामला

इस विषय को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में जनहित याचिका भी दाखिल की गई थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने मई 2022 में प्रदेश के जिलाधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश जारी किए थे।

सरकारी आदेश में कहा गया था कि यदि किसी नगर निकाय के वार्ड अथवा मोहल्ले का नाम किसी असंसदीय नाम, अस्वीकृत पहचान या विशेष जातिसूचक शब्द पर आधारित है, तो संबंधित निकाय प्रस्ताव पारित कर नाम परिवर्तन की कार्रवाई करे।

इसका मकसद सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि समाज में सम्मानजनक और समावेशी पहचान को बढ़ावा देना था।

नाम केवल पहचान नहीं, समाज की मानसिकता भी हैं

सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी स्थान का नाम सिर्फ नक्शे पर लिखा हुआ शब्द नहीं होता। नाम समाज की सोच और उस समाज की ऐतिहासिक मानसिकता को भी दर्शाते हैं।

जब किसी मोहल्ले या वार्ड की पहचान जाति से जुड़ जाती है, तो वहां रहने वाले लोगों की सामाजिक पहचान भी उसी नजरिए से की जाने लगती है। कई बार यह पहचान नई पीढ़ी तक भेदभाव और हीनभावना का बोझ पहुंचाती रहती है।

इसीलिए आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में सार्वजनिक स्थानों की पहचान ऐसी होनी चाहिए, जो सम्मान, समानता और साझा नागरिकता का संदेश दे।

देशभर में हो सकती है नई बहस

फारूक अहमद का यह पत्र उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं माना जा रहा। देश के कई राज्यों में गांवों, बस्तियों, मोहल्लों और वार्डों के नाम ऐतिहासिक रूप से जाति, पेशे या सामाजिक वर्गों के आधार पर रखे गए हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों को अब सार्वजनिक स्थानों के नामों की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए?

क्या ऐसे नाम, जो किसी समुदाय को अलग पहचान देकर सामाजिक दूरी पैदा करते हैं, उन्हें बदलकर शिक्षा, स्वतंत्रता सेनानियों, महापुरुषों, स्थानीय इतिहास, प्रकृति या राष्ट्रीय एकता से जुड़े नाम दिए जाने चाहिए?

यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर विचार-विमर्श की जरूरत महसूस की जा रही है।

नाम बदलना नहीं, मानसिकता बदलने की शुरुआत”

फारूक अहमद का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन से ऐसी पहचान को समाप्त करना है, जो आज के संवैधानिक और बराबरी वाले समाज के अनुकूल नहीं है।

उनका मानना है कि संविधान सभी नागरिकों को समान सम्मान देता है। ऐसे में किसी व्यक्ति की पहचान उसके जन्म या जाति से जोड़कर सार्वजनिक स्थानों के नाम रखना समय के साथ बदले जाने की जरूरत है।

उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है कि 7 मई 2022 के शासनादेश का पूरे प्रदेश में प्रभावी और समयबद्ध पालन सुनिश्चित कराया जाए।

एक प्रदेश से उठी मांग, राष्ट्रीय विमर्श की जरूरत

बांगरमऊ के एक वार्ड से शुरू हुआ नाम परिवर्तन का मामला अब एक बड़े सामाजिक सवाल का रूप ले सकता है।

भारत तेजी से डिजिटल, आधुनिक और विकसित राष्ट्र बनने की तरफ बढ़ रहा है। ऐसे में शहरों और कस्बों की पहचान भी आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप होनी चाहिए।

जाति के आधार पर पहचान नहीं, नागरिकता के आधार पर सम्मान, यही नए भारत की जरूरत है।

अब देखना यह होगा कि उत्तर प्रदेश सरकार इस मांग पर क्या कदम उठाती है और क्या यह पहल भविष्य में देशभर के नगर निकायों में जातिसूचक नामों की समीक्षा के लिए एक नई राष्ट्रीय बहस का रास्ता तैयार करती है।

 

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