(कय्यूम खान)
14 साल जेल में रहने के बाद नदीम अख्तर बने वकील, अब उन्हीं अदालतों में खड़े होकर दूसरों को इंसाफ दिलाने की कोशिश
मुंबई: जिंदगी कभी-कभी इंसान को ऐसे मोड़ पर ले आती है, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की होती। 22 साल की उम्र में गिरफ्तार होकर जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा एक नौजवान, 14 साल बाद उसी शहर की अदालत में काला गाउन पहनकर खड़ा है।
यह कहानी है नदीम अख्तर अशफाक शेख की, जो 13 जुलाई 2011 के मुंबई सीरियल बम धमाकों के मामले में आरोपी बनाए गए, वर्षों तक आर्थर रोड जेल में बंद रहे और अब जमानत पर बाहर आने के बाद क्रिमिनल लॉयर के रूप में अपनी नई जिंदगी शुरू कर चुके हैं।
लेकिन यह केवल एक शख्स के वकील बनने की कहानी नहीं है। यह कहानी है इंतजार, दर्द, पढ़ाई, हौसले और जिंदगी को दोबारा खड़ा करने की कोशिश की।
जब जिंदगी अचानक बदल गई
नदीम का जन्म बिहार के दरभंगा में हुआ। परिवार वर्ष 2002 में मुंबई आ गया और भायखला में रहने लगा। उस समय नदीम की जिंदगी आम नौजवानों जैसी थी। पढ़ाई के साथ कभी पिज्जा डिलीवरी का काम करते, तो कभी रिश्तेदार की सिम कार्ड की दुकान में मदद करते।
शायद उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन इसी सिम कार्ड की दुकान का संबंध उनकी जिंदगी की दिशा बदल देगा।
13 जुलाई 2011 को मुंबई के ओपेरा हाउस, जवेरी बाजार और दादर में सिलसिलेवार बम धमाके हुए। इस दर्दनाक घटना में 27 लोगों की मौत हुई और 127 लोग घायल हुए।
जांच के दौरान सामने आया कि कुछ आरोपियों ने नदीम के रिश्तेदार की दुकान से सिम कार्ड खरीदे थे। जनवरी 2012 में नदीम को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर मकोका समेत कई गंभीर धाराएं लगाई गईं।
उस वक्त नदीम की उम्र महज 22 साल थी।
जेल की चारदीवारी में किताबों का सहारा
आर्थर रोड जेल की जिंदगी आसान नहीं थी। बाहर की दुनिया से दूर, भविष्य अनिश्चित और मुकदमा लंबा।
लेकिन नदीम ने हार मानने के बजाय किताबों का हाथ पकड़ लिया।
उन्होंने जेल में रहते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी। वर्ष 2014 में ओपन यूनिवर्सिटी से बीए की डिग्री हासिल की। इसके बाद कानून की पढ़ाई करने का फैसला किया।
यह फैसला आसान नहीं था।
जेल में रहते हुए लॉ कॉलेज में दाखिला लेना, पढ़ाई करना और परीक्षाएं देना, हर कदम एक चुनौती था। वर्ष 2019 में उन्होंने स्टेट कॉमन एंट्रेंस टेस्ट पास किया और ठाणे के लॉ कॉलेज में दाखिला लिया।
जमीयत उलमा-ए-हिंद की मदद से उनकी पढ़ाई आगे बढ़ी। अदालत की अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था के तहत वे परीक्षाएं देने जाते रहे।
जिस इंसान की जिंदगी अदालत और जेल के बीच गुजर रही थी, उसने उन्हीं कानून की किताबों को अपना भविष्य बना लिया।
14 साल… और इंतजार खत्म नहीं हुआ
किसी भी इंसान के जीवन में 14 साल बहुत लंबा वक्त होता है।
इस दौरान दुनिया बदल जाती है। परिवार बदल जाता है। दोस्त आगे निकल जाते हैं। माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं।
नदीम के लिए यह समय जेल की दीवारों के बीच गुजरा।
मुकदमे में सैकड़ों गवाह थे, लेकिन सुनवाई की रफ्तार बेहद धीमी रही। दस साल में केवल सीमित गवाहों की गवाही पूरी हो सकी। मुकदमा जल्द खत्म होने की उम्मीद नजर नहीं आ रही थी।
इसी बीच नदीम के पिता का भी इंतकाल हो गया।
एक बेटे के लिए यह दर्द शायद सबसे गहरा होता है कि वह अपने पिता के आखिरी वक्त में उनके पास नहीं हो सके।
आखिरकार 10 फरवरी 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने नदीम को जमानत दे दी। अदालत ने मुकदमे की धीमी रफ्तार और निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होने की संभावना को लेकर टिप्पणी की।
14 साल बाद नदीम जेल से बाहर आए।
लेकिन बाहर की दुनिया वैसी नहीं थी, जैसी वे छोड़कर गए थे।
अब आरोपी नहीं, अदालत में वकील की पहचान
जुलाई 2026 में नदीम को महाराष्ट्र और गोवा बार काउंसिल से वकालत की सनद मिली।
वह दिन निश्चित रूप से उनकी जिंदगी के सबसे भावुक दिनों में से एक रहा होगा।
जिस अदालत में वे वर्षों तक आरोपी के तौर पर पेश होते रहे, आज उसी अदालत में काला गाउन पहनकर एक वकील के रूप में खड़े हो रहे हैं।
उन्होंने अपना पहला केस हत्या के एक आरोपी का लड़ा। अब तक वे कई मामले ले चुके हैं, जिनमें एक केस जरूरतमंद व्यक्ति के लिए मुफ्त में भी लड़ रहे हैं।
वकालत उनके लिए सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं है। शायद जेल में बिताए वर्षों ने उन्हें उन लोगों का दर्द समझाया है, जो कानूनी मामलों में फंसकर वर्षों तक अदालतों और जेलों के बीच जिंदगी गुजार देते हैं।
एक लड़ाई अभी बाकी है
नदीम की कहानी को किसी फिल्म की सुखद समाप्ति की तरह नहीं देखा जा सकता। उनकी अपनी कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। वे जमानत पर हैं और अपने मामले में खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश जारी रखे हुए हैं।
लेकिन एक बात जरूर है, उन्होंने 14 सालों को अपनी जिंदगी का अंत नहीं बनने दिया।
उन्होंने जेल में किताब खोली।
कानून पढ़ा।
डिग्री हासिल की।
और जब सलाखों से बाहर निकले तो हाथ में सिर्फ जमानत के कागज नहीं थे, बल्कि एक नया हुनर और नई पहचान भी थी।
यह कहानी हमें एक बड़ा सवाल भी देती है,
क्या इंसान को उसकी जिंदगी के सबसे बुरे दौर से हमेशा के लिए पहचानना चाहिए, या उसे बदलने, सीखने और नई शुरुआत करने का मौका देना चाहिए?
नदीम अख्तर की कहानी शायद इसी सवाल का जवाब तलाश रही है।
14 साल पहले एक नौजवान अदालत में आरोपी बनकर खड़ा था। आज वही शख्स काला गाउन पहनकर कानून की किताब हाथ में लिए खड़ा है।
लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है… लेकिन जिंदगी ने एक नया सफा जरूर खोल दिया है।

