सूरह क़ाफ़ की आयत 17 और 18 और आज की डिजिटल दुनिया
(रईस खान)
सूरह क़ाफ़ की आयत 17 और 18 इंसान को उसके हर बोल और अमल की जिम्मेदारी का एहसास दिलाती हैं। आयत में बताया गया है कि इंसान के दाएं और बाएं दो निगरान फरिश्ते मौजूद हैं और इंसान की कोई बात ऐसी नहीं निकलती जिसके लिए निगरानी करने वाला मौजूद न हो।
हर लफ़्ज़ का हिसाब
मुफस्सिरीन ने इन आयतों की तफ़्सीर में बताया है कि इंसान के अमल लिखने वाले फरिश्ते उसके साथ रहते हैं। उसकी अच्छी और बुरी बातों और उसके आमाल का रिकॉर्ड तैयार होता है। यह रिकॉर्ड क़यामत के दिन इंसान के लिए हुज्जत और गवाही का हिस्सा होगा।
यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। अल्लाह तआला को इंसान के किसी अमल का रिकॉर्ड जानने के लिए किसी फरिश्ते या लिखित दस्तावेज की जरूरत नहीं। वह हर चीज़ को पहले से जानता है। फरिश्तों का लिखना इंसान पर हुज्जत पूरी करने और क़यामत के दिन उसके आमाल का हिसाब सामने रखने की हिकमत से जुड़ा है।
आज की दुनिया
आज इंसान ने ऐसी तकनीक बना ली है जो हमारी जिंदगी के बहुत से हिस्सों को रिकॉर्ड करती रहती है। मोबाइल में कॉल और मैसेज का रिकॉर्ड रहता है। सीसीटीवी कैमरे हमारी आवाजाही को कैद करते हैं। इंटरनेट पर हमारी गतिविधियों का डिजिटल फुटप्रिंट बनता है। स्मार्ट डिवाइस हमारी रोजमर्रा की कई जानकारियां दर्ज करते हैं।
यह सब देखकर सूरह क़ाफ़ की इन आयतों का एक पहलू आज की जिंदगी में आसानी से समझ में आता है कि इंसान का कोई काम पूरी तरह बेनतीजा और बे-हिसाब नहीं है।
AI और रिकॉर्डिंग
आज AI आवाज़ को लिखित शब्दों में बदल सकता है। तस्वीरों और वीडियो को पहचान सकता है और बड़ी मात्रा में डेटा को तेजी से जांच सकता है। इंसान की बनाई हुई तकनीक जब इतनी जानकारी जमा और विश्लेषण कर सकती है तो यह बात इंसान को उस इलाही निज़ाम की तरफ ध्यान दिलाती है जिसका जिक्र क़ुरआन करता है।
लेकिन दोनों को एक जैसा समझना सही नहीं होगा। AI और डिजिटल सिस्टम इंसानी तकनीक हैं। उनमें गलती, खराबी, डेटा खोने और गलत पहचान की संभावना रहती है। फरिश्तों का अमल लिखना ईमान और ग़ैब से जुड़ा मामला है, जिसे हम क़ुरआन और हदीस की रोशनी में मानते हैं।
इंटरनेट नहीं भूलता
आज अक्सर कहा जाता है कि इंटरनेट पर डाली गई चीज पूरी तरह मिटाना मुश्किल होती है। कोई तस्वीर, वीडियो या पोस्ट कई जगह कॉपी हो सकती है और वर्षों बाद भी सामने आ सकती है।
मगर क़ुरआन का बयान इससे कहीं ज्यादा गहरा है। डिजिटल रिकॉर्ड इंसान की बनाई हुई व्यवस्था है, जबकि अमल का रिकॉर्ड आखिरत के हिसाब से जुड़ा हुआ है। इसलिए तकनीक को आयत की वैज्ञानिक पुष्टि कहना सही नहीं होगा। इसे सिर्फ एक मिसाल के तौर पर समझा जा सकता है।
ज़बान की हिफाज़त
इन आयतों का सबसे अहम पैगाम हमारी रोजमर्रा की जिंदगी के लिए है। हम जो बोलते हैं, लिखते हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं, उसके असर और जिम्मेदारी को समझना चाहिए।
आज एक लफ्ज़ सिर्फ सामने बैठे इंसान तक नहीं रहता। वह व्हाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम या किसी दूसरे प्लेटफॉर्म के जरिए हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए डिजिटल दौर में ज़बान की हिफाज़त पहले से ज्यादा जरूरी हो गई है।
एक बड़ी सीख
सूरह क़ाफ़ की ये आयतें हमें डराने के साथ साथ अपने अमल को बेहतर बनाने का रास्ता भी दिखाती हैं। अगर हर बात और हर अमल का हिसाब होना है तो इंसान को बोलने से पहले सोचना चाहिए, किसी पर इल्जाम लगाने से पहले तहकीक करनी चाहिए और किसी की इज्जत को नुकसान पहुंचाने वाली बात से बचना चाहिए।
आज की तकनीक हमें रिकॉर्ड होने की हकीकत दिखाती है, लेकिन क़ुरआन हमें इससे कहीं बड़ी हकीकत की तरफ ले जाता है। इंसान की जिंदगी बे-मकसद नहीं है और उसका कोई अमल अल्लाह के इल्म से बाहर नहीं।
यही इन आयतों का असल पैगाम है कि इंसान अपनी ज़बान, अपने किरदार और अपने हर अमल को जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करे।

