असम के गोलपारा में 73 घरों पर बुलडोज़र, 24 घंटे के नोटिस पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल

Date:

गोलपारा, असम | 10 सितंबर 2026 :असम के गोलपारा ज़िले के कृष्णई इलाके में 6 सितंबर को 73 घरों पर बुलडोज़र चलाए जाने का मामला अब गुवाहाटी हाईकोर्ट पहुंच गया है। मटिया रेवेन्यू सर्कल के पांच गांवों में हुई इस कार्रवाई में जेसीबी और दूसरी भारी मशीनों का इस्तेमाल किया गया। प्रशासन का कहना है कि ये घर ऐसी ज़मीन पर बनाए गए थे जो रिकॉर्ड में खेती के लिए दर्ज है और उसे रिहायशी इस्तेमाल के लिए बदलने की मंज़ूरी नहीं ली गई थी। प्रशासन ने यह भी कहा कि कुछ निर्माण से पानी के प्राकृतिक रास्ते और खेती पर असर पड़ रहा था।

लेकिन जिन परिवारों के घर टूटे, उनकी कहानी कुछ और है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके पास ज़मीन के काग़ज़ हैं और उन्होंने ज़मीन खरीदी थी। उनका कहना है कि उन्हें घर खाली करने के लिए सिर्फ़ 24 घंटे का नोटिस दिया गया। इतने कम समय में घर का सामान निकालना और परिवार को दूसरी जगह ले जाना उनके लिए लगभग नामुमकिन था।

सोचिए, जिस घर को बनाने में किसी परिवार ने अपनी ज़िंदगी की जमा पूंजी लगा दी हो, वहां अचानक बुलडोज़र पहुंच जाए तो उस परिवार पर क्या गुज़रती होगी। किसी के घर में बच्चों की किताबें थीं, किसी के पास रोज़गार का सामान, तो किसी के पास सालों की जमा यादें। मशीनें कुछ घंटों में दीवारें गिरा सकती हैं, लेकिन एक परिवार के लिए घर सिर्फ़ ईंट और सीमेंट नहीं होता।

अब अदालत में उठा बड़ा सवाल

इस मामले में 21 प्रभावित लोगों ने गुवाहाटी हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। जस्टिस देवाशीष बरुआ की अदालत ने 24 घंटे के नोटिस के बाद इतनी जल्दी घर गिराए जाने पर सवाल उठाया। अदालत ने पूछा कि ऐसी कौन-सी फौरी मुसीबत थी जिसके कारण लोगों को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिए बिना कार्रवाई करनी पड़ी। अदालत ने पहली नज़र में कार्रवाई को गैरकानूनी और कुदरती इंसाफ़ के उसूलों के खिलाफ़ बताया और फिलहाल आगे की कार्रवाई पर रोक लगाई है। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होनी है।

यहां एक अहम बात समझना ज़रूरी है। अगर किसी ज़मीन का इस्तेमाल कानून के खिलाफ़ हुआ है तो प्रशासन कार्रवाई कर सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रभावित परिवारों को अपना पक्ष रखने, दस्तावेज़ दिखाने और उचित समय पाने का पूरा मौका मिला था? यही सवाल अब अदालत के सामने है।

ज़मीन के काग़ज़ और घर का सवाल

इस मामले में प्रशासन का कहना है कि ज़मीन का मालिक होना और उस पर रिहायशी मकान बनाने की इजाज़त होना दो अलग बातें हैं। वहीं प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्होंने ज़मीन खरीदी और उनके पास उसके काग़ज़ मौजूद हैं।

इसलिए असली सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि घर खेती की ज़मीन पर बने थे या नहीं। असली सवाल यह भी है कि प्रशासन ने हर परिवार के काग़ज़ और उसकी स्थिति को किस तरह जांचा, उसे कितना समय दिया गया और कार्रवाई से पहले उसे अपनी बात रखने का पूरा मौका मिला या नहीं।

गोलपारा की यह घटना एक बड़े सवाल को सामने लाती है: कानून लागू करना ज़रूरी है, लेकिन क्या कानून का इस्तेमाल इंसानी तकलीफ़ को समझते हुए और पूरी कानूनी प्रक्रिया के साथ किया गया?

इसका अंतिम जवाब अब अदालत की सुनवाई और सामने आने वाले सरकारी रिकॉर्ड से ही साफ़ होगा।

क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_img

पॉपुलर

और देखे
और देखे

दौरा –क्या सहारनपुर कलेक्ट्रेट की मस्जिद गिराना साम्प्रदायिक तनाव की साज़िश थी?

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सेक्रेटरी मौलाना...

शेख हसीना की बेटी साइमा वाजेद ने डब्ल्यूएचओ के क्षेत्रीय प्रमुख पद से इस्तीफ़ा दिया

नई दिल्ली, 10 सितंबर 2026। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री...

क़ुरआन का पैगाम –हर बात दर्ज हो रही है

सूरह क़ाफ़ की आयत 17 और 18 और आज...

जद्दोजहद — जेल की सलाखों से अदालत के काले गाउन तक…

(कय्यूम खान) 14 साल जेल में रहने के बाद नदीम...