इंटरनेशनल : ब्रिक्स में मुस्लिम दुनिया की आवाज़ –नई दिल्ली से बदलती दुनिया का पैगाम

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(परवेज अहमद)

नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर 2026 को हुआ 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन कई मायनों में अहम रहा। दुनिया जब जंग, आर्थिक पाबंदियों, व्यापारिक तनाव और बदलते वैश्विक रिश्तों के दौर से गुजर रही है, ऐसे समय में ब्रिक्स की मेज पर मुस्लिम दुनिया की मौजूदगी भी खास चर्चा का विषय बनी। ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और इंडोनेशिया ब्रिक्स के सदस्य हैं, जबकि सऊदी अरब को आमंत्रित देश के रूप में प्रतिनिधित्व मिला। सऊदी अरब की ओर से क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के प्रतिनिधि के तौर पर विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान नई दिल्ली पहुंचे।

इस बार मुस्लिम देशों की मौजूदगी केवल आर्थिक रिश्तों तक सीमित नहीं रही। पश्चिम एशिया में जारी जंग, एकपक्षीय पाबंदियां, राष्ट्रीय मुद्राओं में कारोबार, समुद्री सुरक्षा और दुनिया में बढ़ती बहुध्रुवीयता जैसे मुद्दों पर इन देशों की आवाज़ साफ सुनाई दी।

पेजेश्कियन का कड़ा संदेश

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन इस सम्मेलन में सबसे मुखर मुस्लिम नेताओं में रहे। नई दिल्ली पहुंचने के बाद उन्होंने अमेरिका और इजराइल के दबाव के बीच ईरान के रुख को साफ शब्दों में रखा। उन्होंने कहा, “हम जुल्म के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेंगे।” एक अन्य बयान में उन्होंने कहा कि ईरान को डराकर झुकाया नहीं जा सकता।

लेकिन पेजेश्कियन की बात केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं थी। ब्रिक्स बिजनेस फोरम में उन्होंने आर्थिक सुरक्षा को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए ब्रिक्स देशों से अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की अपील की। उनका कहना था कि मौजूदा वित्तीय व्यवस्था राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील है और ब्रिक्स को अपनी आर्थिक क्षमता को व्यावहारिक सहयोग में बदलना चाहिए।

पेजेश्कियन ने ब्रिक्स में एक स्थायी सचिवालय बनाने और एकतरफा पाबंदियों का मुकाबला करने की भी बात कही। उन्होंने विज्ञान, टेक्नोलॉजी, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। उनके मुताबिक फिलिस्तीन के लोगों के आत्मनिर्णय का अधिकार वैश्विक व्यवस्था की विश्वसनीयता की बड़ी परीक्षा है।

ईरान और यूएई आमने सामने नहीं, एक मेज पर

इस सम्मेलन की सबसे दिलचस्प तस्वीर ईरान और यूएई के बीच दिखाई दी। क्षेत्रीय तनावों के बावजूद ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात हुई। दोनों देशों ने ब्रिक्स के साझा बयान का समर्थन किया, जिसमें पश्चिम एशिया में अधिकतम संयम, नागरिकों की सुरक्षा, संप्रभुता के सम्मान और तनाव कम करने की बात कही गई।

यह मुलाकात इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण थी कि लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय तनाव के बीच दोनों देशों के बीच यह उच्चस्तरीय संपर्क नई दिल्ली में हुआ। ब्रिक्स की मेज ने कम से कम बातचीत का एक रास्ता खुला रखा।

यूएई की आवाज़

यूएई की तरफ से शेख खालिद बिन मोहम्मद की मौजूदगी ने खाड़ी देशों की बदलती भूमिका को भी सामने रखा। यूएई अब केवल तेल और गैस की अर्थव्यवस्था नहीं है। वह निवेश, व्यापार, टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स और अंतरराष्ट्रीय वित्त का बड़ा केंद्र बन चुका है।

भारत और यूएई के बीच बातचीत में भी रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों पर सहयोग की बात हुई।

ब्रिक्स के साझा रुख में भी यही सोच दिखाई दी कि क्षेत्रीय संकटों का रास्ता जंग से नहीं बल्कि बातचीत और कूटनीति से निकाला जाना चाहिए।

सऊदी अरब की अहम मौजूदगी

सऊदी अरब की भागीदारी ने इस तस्वीर को और बड़ा बना दिया। हालांकि सऊदी अरब अभी ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य नहीं है, लेकिन उसे पहले सदस्यता के लिए आमंत्रित किया जा चुका है और 2026 के सम्मेलन में उसने अपने विदेश मंत्री के जरिए प्रतिनिधित्व किया।

रियाद की आर्थिक ताकत, तेल और ऊर्जा बाजार में भूमिका, विशाल निवेश क्षमता और अरब दुनिया में प्रभाव उसे ब्रिक्स के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बनाते हैं। अगर भविष्य में सऊदी अरब पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल होता है तो ब्रिक्स की ऊर्जा, निवेश और पश्चिम एशिया में आर्थिक पहुंच और मजबूत हो सकती है।

मीरवाइज का शांति संदेश

इसी सम्मेलन के दौरान ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने भारतीय धार्मिक नेताओं, बुद्धिजीवियों और कारोबारी प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की। इस बातचीत में कश्मीर के मीरवाइज उमर फारूक़ भी मौजूद थे। ईरानी दूतावास की ओर से आयोजित इस मुलाकात के बाद मीरवाइज ने कहा, “अमन तभी कायम हो सकता है जब इंसाफ हो।” उन्होंने दुनिया में शांति, बातचीत और इंसाफ की जरूरत पर जोर दिया।

उनकी मौजूदगी ने ब्रिक्स सम्मेलन के आर्थिक और राजनीतिक विमर्श के बीच एक मानवीय आवाज़ भी जोड़ दी।

मुस्लिम दुनिया के लिए बड़ा सवाल

ब्रिक्स में मुस्लिम देशों की बढ़ती मौजूदगी का सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका फायदा आम लोगों तक कैसे पहुंचेगा। स्थानीय मुद्राओं में कारोबार, सुरक्षित भुगतान व्यवस्था, निवेश, टेक्नोलॉजी, ऊर्जा और नए बाजार अगर वास्तव में मजबूत होते हैं तो इसका असर रोजगार और कारोबार पर भी पड़ सकता है।

इंडोनेशिया जैसे बड़े मुस्लिम देश के लिए यह बाजार और व्यापार का सवाल है। ईरान के लिए आर्थिक पाबंदियों के बीच नए रास्तों का सवाल है। यूएई के लिए निवेश और वैश्विक कारोबार का सवाल है। सऊदी अरब के लिए ऊर्जा और पूंजी की ताकत को नई वैश्विक आर्थिक व्यवस्था से जोड़ने का सवाल है।

यही वजह है कि ब्रिक्स अब केवल पांच पुराने देशों का समूह नहीं रह गया है। इसकी नई तस्वीर में एशिया, अफ्रीका, अरब दुनिया और ग्लोबल साउथ की आवाज़ ज्यादा मजबूत दिखाई दे रही है।

नई दिल्ली घोषणा में एकपक्षीय पाबंदियों और व्यापारिक दबावों पर चिंता जताई गई तथा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा पार भुगतान, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और टेक्नोलॉजी सहयोग को आगे बढ़ाने की बात सामने आई।

मुस्लिम दुनिया के लिए ब्रिक्स की असली अहमियत शायद यहीं है। यह केवल राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी जगह मजबूत करने का एक नया रास्ता भी बन सकता है।

नई दिल्ली से निकला संदेश साफ है। दुनिया अब एक ही ताकत के इर्दगिर्द नहीं घूम रही। नई ताकतें उभर रही हैं, नए आर्थिक रिश्ते बन रहे हैं और मुस्लिम दुनिया भी इस बदलती तस्वीर में अपनी नई जगह तलाश रही है।

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