महाराष्ट्र में प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर वकीलों, समाजी कार्यकर्ताओं और मज़हबी व सियासी प्रतिनिधियों ने की गहन चर्चा
मुंबई। महाराष्ट्र में प्रस्तावित यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर बहस तेज़ होने के बीच फेडरेशन ऑफ महाराष्ट्र मुस्लिम्स (FMM) की ओर से एक अहम मशावरती बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में वकीलों, समाजी कार्यकर्ताओं, इंसानी हुकूक के जहदकारों तथा मज़हबी और सियासी प्रतिनिधियों ने शिरकत की और UCC के साथ-साथ तब्दीली-ए-मज़हब मुख़ालिफ़ कानून से जुड़े मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर खुलकर अपनी राय रखी।
बैठक में UCC को लेकर शरीक लोगों के बीच राय का इख्तिलाफ भी सामने आया, लेकिन चर्चा के दौरान एक बात पर खास तौर पर जोर रहा कि किसी भी बड़े कानून को लागू करने से पहले उसके असर और समाज के मुख़्तलिफ़ तबकों की चिंताओं को समझना जरूरी है। कई वक्ताओं ने सरकार की नीयत और कानून बनाने के तरीके पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर किसी कानून के जरिए किसी खास मज़हबी या समाजी तबके को निशाना बनाए जाने का एहसास पैदा होता है तो यह दस्तूर की बुनियादी रूह के लिए चिंता का विषय है।
बैठक की सदारत करते हुए जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के मरकज़ी क़ायद मलिक मोअतसिम ने कहा कि मुसलमानों के अंदर इस्लाह और तब्दीली की जरूरत को महसूस किया जाता है। हमें अपने अमल का जायज़ा लेना और अपना एहतेसाब करना चाहिए, लेकिन कुरआन और हदीस में दिए गए अल्लाह के अहकाम मुसलमानों के लिए महज़ समाजी रस्में नहीं, बल्कि उनके ईमान का हिस्सा हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे बुनियादी मज़हबी अहकाम में इंसानी कानून के जरिए तब्दीली नहीं की जा सकती।
बैठक में यह बात भी सामने आई कि UCC की बहस को केवल हिंदू-मुस्लिम या मज़हबी मसले के तौर पर देखने के बजाय इसे भारतीय दस्तूर, इंसाफ और नागरिक अधिकारों के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। एक समाजी कार्यकर्ता ने कहा, “हम बराबरी के खिलाफ नहीं हैं, हम इंसाफ के साथ हैं और दस्तूर के साथ हैं।” उन्होंने कहा कि मुल्क में कोई भी बड़ा कानून बनाने से पहले अक़लियतों, दलितों और बहुजन तबके की आवाज़ सुनी जानी चाहिए।
बैठक का एक अहम मकसद यह भी था कि प्रस्तावित कानूनों के बारे में सिर्फ एतराज़ दर्ज कराने के बजाय एक मुकम्मल और दस्तूरी नजरिया तैयार किया जाए। इसी सिलसिले में UCC पर राय-आमरा तैयार करने, सरकार के सामने एतराज़ और तजवीज़ात रखने तथा आम लोगों तक सही जानकारी पहुंचाने के तरीके पर भी चर्चा हुई।
15 से 20 लोगों की कमेटी बनेगी
बैठक में तय किया गया कि UCC के मामले पर लगातार काम करने के लिए करीब 15 से 20 लोगों पर मुश्तमिल एक कमेटी बनाई जाएगी। यह कमेटी खास तौर पर UCC पर अपनी तवज्जो मरकूज़ करेगी और कानून के मुख़्तलिफ़ पहलुओं का जायज़ा लेने के बाद सरकार को अपनी तजवीज़ात पेश करेगी। कमेटी सरकार को उन फैसलों के संभावित असर से भी आगाह करेगी जिन्हें बैठक में शरीक लोगों ने गलत या दस्तूर की रूह के खिलाफ समझा है।
कमेटी की तशकील और उसके सदस्यों की तफसीलात बाद में तमाम शरीक लोगों को भेजी जाएंगी। इस कमेटी का मकसद किसी एक तबके तक बहस को महदूद रखना नहीं, बल्कि दस्तूरी और इंसाफ के नजरिए से UCC पर एक संगठित राय सामने लाना बताया गया।
दस सफहों का ड्राफ्ट वकीलों के सामने
बैठक में UCC से संबंधित दस सफहों पर मुश्तमिल एक ड्राफ्ट भी शरीक लोगों, खास तौर पर वकीलों के सामने रखा गया। ड्राफ्ट पर मौजूद लोगों से राय और मशवरा लिया जाएगा और जरूरत के मुताबिक इसमें हज़्फ़ व इज़ाफा किया जाएगा।
बैठक में तय हुआ कि मशावरत के बाद तैयार होने वाले इस दस्तावेज़ को महाराष्ट्र की UCC कमेटी की सदर रिटायर्ड जस्टिस रंजना देसाई के सामने पेश किया जाएगा, ताकि इस मामले में संबंधित कमेटी के सामने भी अपना नजरिया और तजवीज़ात दर्ज कराई जा सकें।
मज़हबी आज़ादी और दस्तूरी हुकूक पर जोर
पूरी बैठक के दौरान यह सवाल प्रमुखता से सामने रहा कि यूनिफॉर्म कानून के नाम पर अगर अलग-अलग मज़हबों के निजी और मज़हबी मामलों में मौजूद फर्क को खत्म करने की कोशिश की जाती है तो उसका असर नागरिकों के मज़हबी हुकूक पर किस तरह पड़ेगा। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारत जैसे मुख़्तलिफ़ मज़हबों और समाजी रिवायतों वाले मुल्क में कानून बनाते समय बराबरी के साथ-साथ इंसाफ और मज़हबी आज़ादी के दस्तूरी उसूलों को भी सामने रखना होगा।
बैठक में तब्दीली-ए-मज़हब मुख़ालिफ़ कानून को लेकर भी चिंता जाहिर की गई और कहा गया कि किसी भी कानून का इस्तेमाल लोगों की निजी आज़ादी और अपनी पसंद से जिंदगी के फैसले लेने के हक को प्रभावित करने के लिए नहीं होना चाहिए।
मुख़्तलिफ़ तबकों की नुमाइंदगी
मशावरती बैठक में सीनियर एडवोकेट यूसुफ हातिम मछाला, अब्दुलमजीद शेख, अब्दुल हसीब भाटकर, मौलाना औसाफ फलाही, मुफ्ती हुज़ैफा, डॉ. मुनीरा कुरैशी, मौलाना निज़ामुद्दीन फखरुद्दीन, एडवोकेट हूरिया पटेल, एडवोकेट एलिन, सरदार सुखविंदर सिंह, चीनिका शाह, सरफराज़ आरज़ू, डॉल्फी डिसूज़ा, मुन्सा बुशरा, इरफान इंजीनियर, मौलाना महमूद दरियाबादी, एडवोकेट कोरडे समेत दर्जनों समाजी कार्यकर्ताओं, इंसानी हुकूक के जहदकारों और मज़हबी प्रतिनिधियों ने शिरकत की।
बैठक का कुल मिलाकर संदेश यह रहा कि UCC जैसे अहम और दूरगामी असर रखने वाले कानून पर बहस सिर्फ सियासी बयानबाजी तक महदूद न रहे, बल्कि दस्तूर, इंसाफ, बराबरी, मज़हबी आज़ादी और समाज के हर तबके के हुकूक को सामने रखते हुए एक गंभीर और मुकम्मल मशावरती प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़े।
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

