मानू और एनसीपीयूएल के राष्ट्रीय सेमिनार में प्रो. सैयद ऐनुल हसन
हैदराबाद, 23 सितंबर: “हर भाषा की अपनी अलग अहमियत है, लेकिन जब भाषा साहित्य का माध्यम बनती है तो उसकी अहमियत और प्रभाव और बढ़ जाता है। भाषाओं को खत्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि भाषा अपना रास्ता खुद बनाती है।” यह बात मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (मानू) के कुलपति प्रोफेसर सैयद ऐनुल हसन ने कही।
वह बुधवार को मआनो के स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज, लिंग्विस्टिक्स एंड इंडोलॉजी की ओर से राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। सेमिनार का विषय “उर्दू और दूसरी भारतीय भाषाएं : भाषाई, साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंध” था।
भाषा की अपनी ताकत
प्रो. ऐनुल हसन ने कहा कि किसी भाषा के विकास के लिए उसे किसी एक संस्कृति पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होती। भाषा समय और समाज के साथ अपना रास्ता बनाती है। उन्होंने कहा कि जो भाषा कभी घरों तक सीमित थी, वह आज घरों से निकलकर समाज के बड़े हिस्से तक पहुंच चुकी है। इसलिए भाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए गंभीर प्रयास जरूरी हैं।
उर्दू और भारतीय भाषाएं
एनसीपीयूएल के निदेशक डॉ. शम्स इकबाल ने कहा कि मआनो उर्दू भाषा के प्रचार और विकास के लिए लगातार काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि सेमिनार में उर्दू के साथ हिंदी, तेलुगु, कन्नड़ और दूसरी भारतीय भाषाओं को भी दक्षिण भारत के संदर्भ में चर्चा का हिस्सा बनाया गया है।
उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा के शब्द दूसरी भाषाओं के साथ उसके संबंधों को दिखाते हैं। उर्दू के विकास में अरबी और फारसी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, लेकिन उर्दू की जड़ें भारतीय समाज और यहां की भाषाओं व संस्कृतियों से भी गहराई से जुड़ी हैं।
भाषाओं के बीच रिश्ते
मआनो के रजिस्ट्रार प्रो. इश्तियाक अहमद ने कहा कि भारत में उर्दू और हिंदी के अलावा कई क्षेत्रीय भाषाएं बोली जाती हैं। उर्दू और हिंदी ने इन भाषाओं के साथ भाषाई और सांस्कृतिक रिश्ते कायम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सेमिनार में शोधकर्ता और शिक्षक इस विषय के विभिन्न पहलुओं पर उपयोगी विचार सामने रखेंगे।
सेमिनार में मुख्य वक्ता प्रो. मोहम्मद नसीमुद्दीन फरीस ने कहा कि उर्दू ने दूसरी भाषाओं के साथ गहरे संबंध बनाते हुए अपनी अलग पहचान कायम की है। दूसरी भारतीय भाषाओं के कई शब्द, मुहावरे और अभिव्यक्तियां उर्दू के जरिए हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनी हैं।
उन्होंने उर्दू के भाषाई, साहित्यिक और सांस्कृतिक रिश्तों पर विस्तार से चर्चा की और विभिन्न भारतीय भाषाओं के साथ उर्दू की समानताओं तथा आपसी प्रभावों के उदाहरण पेश किए।
शोध पत्र होंगे पेश
कार्यक्रम में स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज की डीन प्रो. गुलफिशां हबीब ने स्वागत भाषण दिया, जबकि एनसीपीयूएल की असिस्टेंट डायरेक्टर डॉ. शमा कौसर यज़दानी ने धन्यवाद दिया। संचालन प्रो. मोहम्मद अब्दुस्समी सिद्दीकी ने किया।
सेमिनार में मआनो के विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी शामिल हुए। दो दिनों के दौरान उर्दू और दूसरी भारतीय भाषाओं के भाषाई, साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंधों पर कई शोध पत्र पेश किए जाएंगे और विभिन्न पहलुओं पर चर्चा होगी।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

