एसआईआर को लेकर उठे सवाल, दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बाद विपक्ष का विरोध तेज
(रविन्द्र नेगी)
देश में चुनाव और मतदाता सूची को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर को लेकर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए हैं। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उन्हें पद से हटाने की मांग कर रहे हैं। शुक्रवार को कई राज्यों में प्रदर्शन हुए और मामला अब संसद से लेकर अदालत तक पहुंच गया है।
इस विवाद की शुरुआत उस रिपोर्ट के बाद तेज हुई जिसमें इंडियन एक्सप्रेस ने दावा किया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और दोबारा जोड़ने, नए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 में बदलाव और मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल डाटाबेस के इस्तेमाल से था।
विवाद की असली वजह क्या है
एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण का मकसद मतदाता सूची की जांच और उसमें मौजूद गलतियों को दूर करना है। चुनाव आयोग ने इसे कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रक्रिया के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इतने लोगों को अंतिम रूप से मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। अंतिम सूची और दावे तथा आपत्तियों की प्रक्रिया अलग है।
विवाद इसलिए गहरा गया क्योंकि दो चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को लेकर अपनी आपत्ति रिकॉर्ड पर दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों ने नए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 में किए गए बदलाव और मतदाता सूची के डाटा तक पहुंच को अधिक केंद्रीकृत किए जाने को लेकर सवाल उठाए। कुछ मामलों में उन्होंने संबंधित फैसलों को अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना किए जाने की बात भी कही।
चुनाव आयोग का क्या कहना है
दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने इन खबरों से पैदा हुए विवाद को अलग तरीके से देखा है। आयोग से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि एसआईआर सहित सभी महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं। आयोग का कहना है कि आंतरिक चर्चा के दौरान अलग-अलग राय होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम फैसले आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए जाते हैं।
यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल बन गया है कि चुनाव आयोग के भीतर दर्ज की गई आपत्तियों का वास्तविक प्रशासनिक असर कितना था और क्या अंतिम फैसले वास्तव में सभी आयुक्तों की सामूहिक मंजूरी से लिए गए थे।
विपक्ष सड़कों पर
रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्ष ने सरकार और चुनाव आयोग पर हमला तेज कर दिया। कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को संसद में भी उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। रिपोर्टों के मुताबिक विपक्ष ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है।
शुक्रवार को कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जम्मू-कश्मीर, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, चंडीगढ़ और मणिपुर समेत कई जगहों पर प्रदर्शन किए। कई स्थानों पर प्रदर्शनकारी चुनाव आयोग के कार्यालयों की तरफ बढ़े।
कोलकाता में प्रदेश कांग्रेस ने कॉलेज स्ट्रीट से मार्च निकाला, जबकि चंडीगढ़ में पंजाब कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के कार्यालय की तरफ मार्च किया। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने ज्ञानेश कुमार को हटाने और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भी कांग्रेस विधायकों ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए नारे लगाए। विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें सदन की कार्यवाही के दौरान बैनर दिखाने से रोका और कहा कि चुनाव आयोग विधानसभा के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
युवाओं का अलग आंदोलन
इस विवाद में कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी नाम का एक युवा संगठन भी सामने आया है। संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके ने ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देने के लिए 48 घंटे का समय दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर इस्तीफा नहीं दिया गया तो 2 अक्टूबर, गांधी जयंती से मुंबई से देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। संगठन ने इसे जंतर-मंतर 2.0 का नाम दिया है।
मामला अदालत तक पहुंचा
इस विवाद का एक कानूनी पहलू भी सामने आया है। मुंबई हाईकोर्ट की कोल्हापुर पीठ में एक याचिका दायर कर चुनाव आयोग की उन 14 कार्रवाइयों को चुनौती दी गई है, जिन पर दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र किया गया है। याचिका में मतदाता सूची, मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने तथा एसआईआर से जुड़े फैसलों को चुनौती दी गई है।
सवाल सिर्फ एक अधिकारी का नहीं
पूरा विवाद अब ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से आगे बढ़कर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनावी संस्थाओं में जनता के भरोसे का सवाल बन गया है।
विपक्ष इन घटनाओं को चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जोड़ रहा है, जबकि चुनाव आयोग अपने फैसलों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिया गया बता रहा है। इसलिए इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि सामने आए आरोपों, चुनाव आयोग के जवाब और अदालतों में चल रही कानूनी प्रक्रिया से क्या तथ्य सामने आते हैं।
लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल नामों की एक सूची नहीं होती। यही सूची तय करती है कि कौन व्यक्ति मतदान कर सकता है और कौन नहीं। इसलिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और दोबारा शामिल करने की हर प्रक्रिया पारदर्शी, जांच योग्य और नागरिकों के भरोसे के मुताबिक होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

