रावण के पुतले बनाते मुस्लिम कारीगर, रामलीला सजाते साझा विरासत के रंग
जयपुर में मुस्लिम परिवार 68 साल से बना रहा रावण: डेढ़ महीने तक मंदिर में रहते हैं, मथुरा से आती है कारीगरों की पूरी टीम
(अनवर करीम)
दशहरा आते ही देश के कई शहरों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले तैयार होने लगते हैं। रामलीला के मंच सजते हैं, कलाकार अपने किरदारों की तैयारी करते हैं और मेले की रौनक बढ़ने लगती है। लेकिन इस पूरे आयोजन के पीछे ऐसे बहुत से कारीगर भी होते हैं, जिनका ज़िक्र अक्सर मंच से नहीं होता।
इनमें मुस्लिम परिवारों के कारीगर भी शामिल हैं, जो पीढ़ियों से रावण के पुतले बनाने, उन्हें सजाने और रामलीला के आयोजनों के लिए दूसरी तैयारियों में अपना हुनर लगाते आए हैं।
यह केवल रोज़गार की कहानी नहीं है। यह उस सामाजिक रिश्ते की कहानी भी है, जिसमें अलग-अलग मज़हब के लोग एक-दूसरे के त्योहारों, कला और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में सहयोग करते हैं।
क़ौमी फ़रमान की इस ख़ास रिपोर्ट में हम उन मिसालों को सामने ला रहे हैं, जिनकी पुष्टि समाचार रिपोर्टों और सांस्कृतिक दस्तावेज़ों से होती है।
मुंबई में यूपी के मुस्लिम कारीगरों की चार दशक पुरानी मेहनत
मुंबई में दशहरे के लिए रावण के पुतले तैयार करने वाले मुस्लिम कारीगरों की मौजूदगी की ताज़ा मिसाल इसी साल सामने आई है।
उत्तर प्रदेश के नोएडा और दादरी से मुस्लिम कारीगरों की एक टीम हर साल मुंबई आती है। यह टीम सायन में पुतले तैयार करती है। इसके बाद पुतले सायन-कोलीवाड़ा, गिरगांव चौपाटी, आज़ाद मैदान, मालाड और चेंबूर समेत अलग-अलग इलाकों के आयोजनों तक पहुंचाए जाते हैं।
इस टीम का नेतृत्व हाफ़िज़ुद्दीन अहमद करते हैं, जिन्हें पुतले बनाने का 40 साल से ज़्यादा का तजुर्बा है। उनके बेटे शहज़ाद अहमद भी इस काम में शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के दशहरा आयोजन के लिए उनकी टीम आठ पुतले तैयार कर रही थी। टीम में कुल 15 कलाकार हैं।
कारीगरों के लिए यह काम पूरे साल का रोज़गार नहीं, बल्कि एक खास मौसम में मिलने वाला काम है। कई लोग बाकी महीनों में दूसरे काम या छोटे कारोबार करते हैं। दशहरे के आसपास वे अपनी पुरानी कला को इस्तेमाल करते हुए मुंबई के उत्सव का अहम हिस्सा बन जाते हैं।

यह मिसाल बताती है कि किसी त्योहार की रौनक के पीछे हुनर, मेहनत और रोज़गार का भी एक पूरा संसार होता है।
काशी में तीन पीढ़ियों से रावण के पुतले बना रहा मुस्लिम परिवार
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में शमशाद ख़ान का परिवार दशहरे के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाने की परंपरा तीन पीढ़ियों से आगे बढ़ा रहा है।
इस परिवार में पुतले बनाने का काम शमशाद ख़ान के नाना ने शुरू किया था। बाद की पीढ़ियों ने इस हुनर को संभाला। इस काम में शमशाद की पत्नी, उनके बेटे, बेटी और परिवार के दूसरे सदस्य भी सहयोग करते हैं।
इस साल बनारस रेल इंजन कारखाना की रामलीला के लिए परिवार 75 फुट ऊंचा रावण, 65 फुट ऊंचा कुंभकर्ण और 55 फुट ऊंचा मेघनाद का पुतला तैयार कर रहा था। रिपोर्ट में बताया गया कि परिवार ने 1 सितंबर से काम शुरू किया था और 18 अक्टूबर तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा था।
यहां एक अहम बात समझने की है। परिवार के लिए यह काम केवल आमदनी का ज़रिया नहीं, बल्कि बुज़ुर्गों से मिले हुनर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का भी माध्यम है।
दशहरे के दिन जब लोग पुतलों को देखते हैं, तो उनके पीछे लगी कई हफ्तों की मेहनत और परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही कला अक्सर नज़र नहीं आती।
कानपुर में भी मुस्लिम परिवार निभा रहा है पुरानी परंपरा
कानपुर से भी इसी तरह की मिसाल सामने आई है। सलीम के नेतृत्व में लगभग 20 कारीगरों की टीम दशहरे के आयोजनों के लिए रावण के पुतले तैयार करती है। रिपोर्ट में इस परिवार की परंपरा को करीब 100 साल पुराना बताया गया है। इस साल टीम ने 120 फुट लंबी लंका का ढांचा भी तैयार किया था।
मुस्लिम कलाकार केवल पुतले ही नहीं बनाते, रामलीला में किरदार भी निभाते हैं
दशहरा और रामलीला में मुस्लिम समाज की भूमिका सिर्फ कारीगरी तक सीमित नहीं रही है। उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में मुस्लिम कलाकार रामलीला के किरदार निभाते रहे हैं और कुछ जगहों पर मुस्लिम समुदाय के लोग आयोजन समितियों से भी जुड़े रहे हैं। एक रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के कई उदाहरण दर्ज किए गए हैं।
* मुज़फ्फरनगर का बुढ़ाना: रिपोर्ट के अनुसार, यहां मुस्लिम समुदाय के लोग रामलीला के आयोजन में अहम भूमिका निभाते थे। स्थानीय रामलीला रामायण समिति के अध्यक्ष अली ने बताया था कि उनके बुज़ुर्गों ने लगभग 50 साल पहले यह आयोजन शुरू किया था।
* बख्शी का तालाब, लखनऊ: यहां 1972 में शुरू हुई रामलीला में हिंदू और मुस्लिम कलाकार अलग-अलग किरदार निभाते रहे। रिपोर्ट में सलमान ख़ान और अरबाज़ ख़ान नाम के दो भाइयों का ज़िक्र था, जो राम और लक्ष्मण की भूमिका निभाते थे।
* मुज़फ्फरनगर और लखनऊ के दूसरे आयोजन: रिपोर्ट में मुस्लिम कलाकारों द्वारा रावण, अंगद, हनुमान और कुंभकर्ण जैसे किरदार निभाने के उदाहरण भी दर्ज थे।
इन उदाहरणों से पता चलता है कि रामलीला के कुछ स्थानीय आयोजनों में धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर कला और सामुदायिक भागीदारी को जगह मिली है। यह कहना सही नहीं होगा कि देश की हर रामलीला में ऐसा होता है, लेकिन इन दर्ज मिसालों को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता।
रामलीला सिर्फ धार्मिक मंचन नहीं, एक साझा सांस्कृतिक परंपरा भी है
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी भारतीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की वेबसाइट पर रामलीला को रामायण की पारंपरिक नाट्य प्रस्तुति के रूप में दर्ज किया गया है। इसमें बताया गया है कि रामलीला के आयोजन में कलाकारों के अलावा मुखौटे, पोशाकें, श्रृंगार, पुतले और रोशनी तैयार करने वाले लोग भी हिस्सा लेते हैं। गांवों और कस्बों में यह परंपरा अलग-अलग समुदायों के लोगों को एक साथ काम करने का अवसर देती है।
रामलीला की अहमियत इस बात में भी है कि इसमें केवल मंच पर दिखाई देने वाले कलाकार ही नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले कारीगर, संगीतकार, दर्ज़ी, रंगकर्मी और तकनीकी काम करने वाले लोग भी शामिल होते हैं।
मुस्लिम कारीगरों की भागीदारी को इसी व्यापक सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ में देखना चाहिए।
यह किसी एक धर्म की परंपरा पर दूसरे धर्म का दावा नहीं है। यह उन लोगों के काम और योगदान को पहचानना है, जो अपने हुनर के ज़रिए एक सांस्कृतिक आयोजन को पूरा करने में मदद करते हैं।
दशहरा, रोज़गार और आपसी सहयोग का रिश्ता
इन उदाहरणों का एक आर्थिक पहलू भी है। पुतले बनाने के काम में बांस, कागज़, रस्सी, रंग, सजावटी सामग्री और कुशल मज़दूरी की ज़रूरत होती है। बड़े पुतलों के लिए अलग-अलग कारीगरों के बीच तालमेल, समय पर काम पूरा करना और सुरक्षित ढुलाई भी ज़रूरी होती है।
मुंबई की टीम और वाराणसी के परिवार की रिपोर्टें दिखाती हैं कि यह हुनर कुछ परिवारों के लिए मौसमी आमदनी का ज़रिया है। उनके लिए त्योहार का मौसम काम, मेहनत और पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाने का अवसर बनता है।
ऐसी कारीगरी को बचाए रखने के लिए आयोजकों, स्थानीय प्रशासन और समाज की ओर से कुछ व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं:
* पारंपरिक कारीगरों और उनके परिवारों का दस्तावेज़ीकरण किया जाए।
* बच्चों और युवाओं को यह हुनर सिखाने के अवसर दिए जाएं।
* कारीगरों को समय पर भुगतान, सुरक्षित कार्यस्थल और उचित मेहनताना मिले।
* पुतलों के निर्माण और दहन में अग्नि-सुरक्षा तथा पर्यावरण संबंधी नियमों का पालन हो।
* आयोजन समितियां कारीगरों के योगदान को सार्वजनिक रूप से सम्मान दें।
इससे सांस्कृतिक परंपरा को बचाने के साथ-साथ हुनरमंद लोगों की आजीविका को भी सहारा मिल सकता है।
गंगा-जमुनी तहज़ीब का मतलब क्या है?
गंगा-जमुनी तहज़ीब का मतलब केवल एक-दूसरे के त्योहारों की बधाई देना नहीं है। इसका एक व्यावहारिक रूप तब भी सामने आता है, जब लोग अपने अलग-अलग मज़हब और मान्यताओं को कायम रखते हुए मिलकर काम करते हैं, एक-दूसरे की कला का सम्मान करते हैं और समाज के साझा जीवन में योगदान देते हैं।
दशहरे के लिए पुतले बनाने वाले मुस्लिम परिवारों और रामलीला में किरदार निभाने वाले मुस्लिम कलाकारों की मिसालें इसी रिश्ते के कुछ ठोस उदाहरण हैं।
इन कहानियों को पेश करते हुए यह भी याद रखना चाहिए कि किसी समुदाय के योगदान को पहचानने के लिए उसे दूसरे समुदाय के मुकाबले खड़ा करना ज़रूरी नहीं है। हिंदू कलाकारों, मुस्लिम कारीगरों और दूसरे समुदायों के सहयोग से चलने वाले आयोजनों की अहमियत उनके साझा श्रम और आपसी सम्मान में है।
दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देने वाला त्योहार है। इस संदेश को सामाजिक जीवन से जोड़कर देखें, तो ईमानदारी, इंसाफ़, मेहनत और एक-दूसरे के प्रति सम्मान भी उतने ही ज़रूरी मूल्य हैं।
मुंबई में हाफ़िज़ुद्दीन अहमद और शहज़ाद अहमद की टीम, वाराणसी में शमशाद ख़ान का परिवार और उत्तर प्रदेश की रामलीलाओं में भाग लेने वाले मुस्लिम कलाकार हमें याद दिलाते हैं कि भारत की सांस्कृतिक दुनिया में कई ऐसे रिश्ते हैं, जो रोज़मर्रा के काम, हुनर और सहयोग से बनते हैं।
इन कारीगरों को केवल दशहरे के आसपास याद करना काफी नहीं है। उनकी कला, मेहनत और आजीविका को सम्मान मिलना चाहिए। उनकी कहानियों को दर्ज किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि समाज की साझा विरासत को आगे बढ़ाने में कितने लोगों का योगदान रहा है।
त्योहार किसी एक समुदाय की आस्था का उत्सव हो सकता है, लेकिन उसे सफल बनाने में जुटे लोगों की मेहनत और कला पूरे समाज की साझा धरोहर बन सकती है।
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

