क्या आपने कभी अपने हिंदू या मुस्लिम दोस्त के साथ दिवाली मनाई है?
क्या किसी दोस्त ने आपको अपने घर बुलाया, मिठाई खिलाई, दीप जलाने में शामिल किया या पटाखों और हँसी-खुशी के बीच कोई ऐसी याद दी, जो आज भी आपके दिल में ज़िंदा है?
क्या आपके परिवार में हिंदू-मुस्लिम दोस्त मिलकर त्योहार मनाते रहे हैं? क्या किसी पड़ोसी ने त्योहार पर मिठाई भेजकर, घर आकर या गले मिलकर आपको यह एहसास दिलाया कि रिश्ते मज़हब से बड़े होते हैं?
हम सुनना चाहते हैं आपकी कहानी, आपकी ज़ुबानी।
क़ौमी फ़रमान अपने नवंबर विशेषांक की कवर स्टोरी के साथ ऐसी सच्ची यादों को जगह देना चाहता है, जो बताती हैं कि हिंदू-मुस्लिम दोस्ती, अपनापन और भाईचारा हमारी ज़िंदगी का कितना ख़ूबसूरत हिस्सा रहे हैं।
आप अपनी यादें लिखकर या वॉइस मैसेज के ज़रिए भेज सकते हैं। साथ में अपनी एक तस्वीर या उस याद से जुड़ी कोई पुरानी तस्वीर भी साझा कर सकते हैं।
कहानी छोटी हो या बड़ी, बचपन की हो या आज की, बस सच्ची हो, दिल से निकली हो और आपके अपने अनुभव पर आधारित हो।
आइए, नफ़रत की आवाज़ों के बीच मुहब्बत की सच्ची कहानियाँ सुनाएँ।
आपकी याद किसी दूसरे के दिल में दोस्ती और भरोसे का एक नया दीया जला सकती है।
अपनी कहानी भेजें:
क़ौमी फ़रमान, सेकुलर भारत का आईना
qaumifarman@gmail.com
आपकी कहानी, आपकी ज़ुबानी, हमारे साझा हिंदुस्तान की निशानी।
9821111494
रईस खान, संपादक क़ौमी फ़रमान, मुंबई

