मुंबई में इमामों और उलेमा की खास ट्रेनिंग, कानून की समझ और डिजिटल सुरक्षा पर ज़ोर
खुतबों में सामाजिक सुधार, कानूनी जागरूकता और मौजूदा मुद्दों को जगह देने की अपील
(रईस खान)
आज का दौर इंटरनेट और सोशल मीडिया का दौर है। मोबाइल फोन के ज़रिए दुनिया भर की खबरें, इल्म और जानकारी कुछ ही सेकंड में लोगों तक पहुंच जाती है। लेकिन इसी इंटरनेट पर झूठी खबरें, नफ़रत फैलाने वाले मैसेज और गुमराह करने वाला प्रचार भी मौजूद है। खास तौर पर कम उम्र के नौजवान कई बार ऐसे ऑनलाइन जाल में फंस जाते हैं, जहां से निकलना उनके लिए मुश्किल हो सकता है।
ऐसे हालात में नौजवानों को सही और गलत की पहचान कराने, उन्हें कानून की जानकारी देने और कट्टरपंथ की तरफ बढ़ने से रोकने में समाज के जिम्मेदार लोगों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। इसी सोच के साथ मुंबई में एक खास पहल की गई, जिसमें मस्जिदों के इमामों, मौलवियों और उलेमा को कानूनी जागरूकता और डिजिटल सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर ट्रेनिंग दी गई।
मुंबई के मशहूर इस्लाम जिमखाना में ग्लोबल केयर फाउंडेशन की ओर से आयोजित दो दिवसीय पैरा-लीगल ट्रेनिंग कार्यक्रम में 70 से ज्यादा इमामों, मौलवियों और धार्मिक विद्वानों ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम का मकसद धर्मगुरुओं को ऐसी जानकारी देना था, जिससे वे अपने समाज के नौजवानों, बच्चों और उनके परिवारों को बदलते दौर की चुनौतियों के प्रति जागरूक कर सकें।
मस्जिद के मिंबर से समाज तक पहुंचे सही पैगाम
मस्जिद सिर्फ इबादत की जगह नहीं होती, बल्कि बहुत से लोगों के लिए वह रहनुमाई और सामाजिक सुधार का भी अहम मरकज़ होती है। जुमे की नमाज़ के मौके पर इमाम का खुतबा बड़ी तादाद में लोगों तक पहुंचता है। ऐसे में अगर धार्मिक संदेशों के साथ समाजी जिम्मेदारियों, कानून की बुनियादी जानकारी और डिजिटल दुनिया के खतरों पर भी बात की जाए, तो उसका असर दूर तक पहुंच सकता है।

कार्यक्रम में धर्मगुरुओं को इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि वे जुमे के खुतबों में मौजूदा सामाजिक मुद्दों को भी जगह दें। नौजवानों की तालीम, परिवारों की जिम्मेदारी, कानून का एहतराम, झूठी खबरों से बचाव और समाज में अमन बनाए रखने जैसे विषय इस सिलसिले में अहम हो सकते हैं।
इसका मकसद धार्मिक शिक्षा की अहमियत को कम करना नहीं, बल्कि समाज की बदलती जरूरतों के साथ जागरूकता के दायरे को बढ़ाना है। जब सही जानकारी भरोसेमंद लोगों के जरिए आम लोगों तक पहुंचती है, तो गलतफहमियों और अफवाहों को रोकने में मदद मिल सकती है।
ऑनलाइन गुमराही और कट्टरपंथ एक गंभीर चुनौती
आज सोशल मीडिया पर कोई भी व्यक्ति कुछ ही मिनटों में वीडियो, मैसेज या पोस्ट के जरिए हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। इस सहूलियत का इस्तेमाल इल्म और अच्छे कामों के लिए भी होता है, लेकिन कुछ लोग इसी माध्यम से नफरत, झूठ और हिंसा को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं।
कई बार नौजवानों को उनकी परेशानियों, गुस्से, अकेलेपन या समाज से शिकायतों के आधार पर निशाना बनाया जाता है। उन्हें भड़काऊ सामग्री दिखाई जाती है, आधी-अधूरी जानकारी दी जाती है और धीरे-धीरे ऐसे विचारों की तरफ धकेला जाता है, जो उन्हें अपने परिवार और समाज से दूर कर सकते हैं।
इसलिए डिजिटल सुरक्षा का मतलब सिर्फ मोबाइल चलाना सीखना नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि नौजवान किसी मैसेज पर फौरन यकीन न करें, खबर की सच्चाई जांचें, नफरत फैलाने वाले प्रचार को पहचानें और किसी संदिग्ध गतिविधि या हिंसा के लिए उकसाने वाली सामग्री के मामले में जिम्मेदारी से कदम उठाएं।
युवाओं को यह समझाना भी जरूरी है कि किसी विचार से असहमति रखना और हिंसा का रास्ता अपनाना दो अलग बातें हैं। कानून के दायरे में रहकर सवाल पूछना, अपनी राय रखना और इंसाफ की मांग करना नागरिकों का हक है। लेकिन हिंसा के लिए उकसाना या गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होना गंभीर नतीजों का कारण बन सकता है।
एडवोकेट मोबीन सोलकर की अहम अपील
कार्यक्रम में शामिल वरिष्ठ वकील एडवोकेट मोबीन सोलकर ने इमामों और मौलवियों से अपील की कि वे इंटरनेट पर फैलने वाली भ्रामक खबरों और नुकसानदेह डिजिटल प्रचार के प्रति समाज को सतर्क करें।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों और नौजवानों के साथ-साथ उनके माता-पिता की काउंसलिंग भी जरूरी है। घरों में बच्चों के ऑनलाइन इस्तेमाल को लेकर खुलकर बातचीत होनी चाहिए, ताकि वे किसी परेशानी, दबाव या गलत ऑनलाइन संपर्क के बारे में अपने परिवार से बात करने में हिचकिचाएं नहीं।
माता-पिता की जिम्मेदारी केवल बच्चों के मोबाइल पर नजर रखने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें बच्चों की बात सुननी चाहिए, उनकी परेशानियों को समझना चाहिए और उन्हें सही-गलत के बीच फर्क करने की सलाह देनी चाहिए।
इसी तरह इमाम और उलेमा अपने धार्मिक और सामाजिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए नौजवानों में इंसानियत, आपसी सम्मान, कानून की पाबंदी और अमन का पैगाम मजबूत कर सकते हैं।
कानून की जानकारी से बढ़ेगी जागरूकता
इस दो दिवसीय कार्यक्रम में देश के कानूनों, खासकर आतंकवाद से जुड़े कानूनों की बुनियादी जानकारी देने पर भी ध्यान दिया गया। इस तरह की ट्रेनिंग का एक अहम फायदा यह हो सकता है कि समाज के जिम्मेदार लोग अफवाहों, गलत कानूनी जानकारियों और बेवजह के डर को दूर करने में मदद कर सकें।
कानून की सही जानकारी हर नागरिक के लिए जरूरी है। किसी भी कानूनी मामले में केवल सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले दावों के आधार पर राय कायम करने के बजाय भरोसेमंद स्रोतों और कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेना बेहतर है।
धर्मगुरुओं के लिए यह समझना भी जरूरी है कि किसी व्यक्ति की पहचान, पहनावे, धार्मिक विचार या ऑनलाइन मौजूदगी मात्र से उसे कट्टरपंथी नहीं माना जा सकता। किसी गंभीर मामले का आकलन तथ्यों और सबूतों के आधार पर होना चाहिए। जागरूकता का मकसद किसी समुदाय को शक के घेरे में लाना नहीं, बल्कि हर नौजवान को गुमराही और हिंसा से सुरक्षित रखना होना चाहिए।
ग्लोबल केयर फाउंडेशन की पहल का संदेश
ग्लोबल केयर फाउंडेशन के अध्यक्ष आबिद अहमद कुंदलम ने कार्यक्रम में 70 से ज्यादा धार्मिक विद्वानों की भागीदारी को अहम बताया। इस ट्रेनिंग में इमामों और उलेमा की दिलचस्पी इस बात की तरफ इशारा करती है कि धार्मिक रहनुमा भी आज के सामाजिक, कानूनी और डिजिटल मसलों को समझने की जरूरत महसूस कर रहे हैं।
इस तरह की पहल की असल कामयाबी केवल दो दिन की ट्रेनिंग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जरूरी है कि इससे हासिल जानकारी मस्जिदों, मदरसों, घरों और मोहल्लों तक पहुंचे। नौजवानों के लिए जागरूकता बैठकें हों, माता-पिता को डिजिटल सुरक्षा के बारे में बताया जाए और जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह देने के लिए भरोसेमंद लोगों की मदद ली जाए।
अगर इस पहल को लगातार आगे बढ़ाया जाता है, तो धार्मिक रहनुमाई और आधुनिक जानकारी के बीच एक बेहतर तालमेल कायम हो सकता है।
मदरसा और आधुनिक जानकारी के बीच बेहतर तालमेल
मदरसों और धार्मिक संस्थानों की अपनी अहमियत है। यहां धार्मिक तालीम के साथ अगर डिजिटल साक्षरता, संविधान की बुनियादी समझ, नागरिक अधिकारों और जिम्मेदारियों जैसे विषयों पर भी जानकारी दी जाए, तो छात्रों को समाज की मौजूदा चुनौतियों को समझने में मदद मिल सकती है।
इसी तरह आधुनिक शिक्षण संस्थानों में भी धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान को बढ़ावा देना जरूरी है। समाज में भरोसा तभी मजबूत होता है, जब अलग-अलग तबकों के लोग एक-दूसरे को समझने की कोशिश करते हैं।
इसलिए ऐसी ट्रेनिंग को किसी एक समुदाय तक सीमित देखने के बजाय एक व्यापक सामाजिक प्रयास के रूप में भी समझा जा सकता है। हर धर्म और समुदाय के जिम्मेदार लोग अपने नौजवानों को नफरत, हिंसा, अफवाहों और ऑनलाइन धोखाधड़ी से बचाने में अहम किरदार निभा सकते हैं।
असल कामयाबी नौजवानों का भरोसा जीतने में है
आज के नौजवानों को केवल नसीहत देने से काम नहीं चलेगा। उन्हें सुनना, उनके सवालों का जवाब देना और उनकी परेशानियों को समझना भी जरूरी है। जब कोई युवा अपने सवाल परिवार, शिक्षक या इमाम के सामने बेझिझक रख सकेगा, तभी उसे गलत जानकारी और भड़काऊ प्रचार से बचाने की कोशिश ज्यादा असरदार हो सकेगी।
इंटरनेट पर फैलने वाली हर गलत बात का जवाब पाबंदी या डर से नहीं दिया जा सकता। इसके लिए सही जानकारी, समझदारी, बातचीत और भरोसे का माहौल जरूरी है।
मुंबई में आयोजित यह ट्रेनिंग इसी दिशा में एक सकारात्मक पहल है। अब जरूरत इस बात की है कि कानूनी जागरूकता और डिजिटल सुरक्षा का यह पैगाम ज्यादा से ज्यादा नौजवानों तक पहुंचे और समाज के जिम्मेदार लोग इस काम को लगातार आगे बढ़ाएं।
क्योंकि नौजवानों का सुरक्षित भविष्य केवल परिवार या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। सही रहनुमाई, कानून की समझ और इंसानियत का पैगाम ही उन्हें गुमराही से बचाकर एक बेहतर और अमनपसंद समाज की तरफ ले जा सकता है।
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

