मिसाल–इंसाफ का तराजू और सऊदी अरब का जस्टिस सिस्टम

Date:

सऊदी अरब के कानून और वहां की न्याय व्यवस्था को लेकर दुनिया भर में हमेशा से तीखी बहसें होती रही हैं। कुछ लोग इसे बेहद सख्त और क्रूर मानते हैं, तो वहीं एक बड़ा वर्ग इसे अपराध मुक्त समाज की स्थापना के लिए एक आदर्श मिसाल के तौर पर देखता है। हालिया दिनों में कुछ विदेशी नागरिकों या विशेषकर एशियाई मुल्कों के नागरिकों पर हुई सख्त अदालती कार्रवाइयों के बाद यह बहस एक बार फिर सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया में गर्मा गई है। लेकिन क्या सऊदी अरब का कानून वाकई पक्षपाती है, या फिर यह ‘कानून के सामने सब बराबर’ के सिद्धांत पर काम करता है? आइए इतिहास और वर्तमान के झरोखे से इसे समझने की कोशिश करते हैं।

जब शाही खून की भी परवाह नहीं की गई

सऊदी न्याय व्यवस्था की सख्ती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कानून की जद में आने पर शाही घराने के रसूखदार शहजादे और शहजादियों को भी माफी नहीं मिली।

शहज़ादी मशाइल बिन्त फ़हद का मामला, 1977

सत्तर की दहाई का यह वाकया आज भी इतिहास में दर्ज है। 19 वर्षीय शहजादी मशाइल को जब लेबनान में तैनात सऊदी राजदूत के भतीजे खालिद अल-शअर से मोहब्बत हुई, तो शाही खानदान की बंदिशों के बावजूद उनका मेल-जोल जारी रहा। जेद्दा एयरपोर्ट से भेष बदलकर भागने की कोशिश के दौरान दोनों पकड़े गए। अदालत में जुर्म कबूल होने के बाद, 15 जुलाई 1977 को जेद्दा के एक पार्क के करीब दोनों को सरेआम सजा-ए-मौत दे दी गई।

शहज़ादा तुर्की बिन सऊद का किस्सा, 2016

दिसंबर 2012 में रियाद के रेगिस्तानी इलाके ‘अल-थमामा’ के एक कैंप में दोस्तों के बीच झगड़ा हुआ। गुस्से में आकर शहज़ादे तुर्की बिन सऊद ने फायरिंग कर दी, जिसमें उनके अपने ही दोस्त आदिल अल-मुहैमीद की मौत हो गई। आदिल एक आम मध्यमवर्गीय परिवार से थे। शाही खानदान ने परिवार को मुंह-मांगी ‘दियत’ यानी खून का बदला या मुआवजा देने की पेशकश की, खुद देश के शीर्ष नेतृत्व ने सिफारिश की, लेकिन पीड़ित परिवार ‘किसास’ यानी खून के बदले खून की मांग पर अड़ा रहा। नतीजा यह हुआ कि 18 अक्टूबर 2016 को कानून की संप्रभुता कायम रखते हुए शहजादे को सरेआम मौत की सजा दी गई।

हुरमतों की पामाली और हुदूद-ए-हरम का सम्मान

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक बंगाली जोड़े से जुड़ा विवाद सामने आया, जिसे लेकर उदारवादी तबके और अन्य विचारधारावों के बीच तीखी बहस छिड़ गई। इस मामले को कुछ हलकों में ‘हनीमून पर गए मासूम जोड़े’ की कहानी की तरह पेश करने की कोशिश की गई, लेकिन प्रामाणिक जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।
सऊदी अरब के सख्त कानूनी तंत्र के मुताबिक, अपराध की गंभीरता इस बात से भी तय होती है कि वह किस स्थान पर किया गया है। मक्का, हुदूद-ए-हरम और मस्जिद-अल-हराम जैसी पवित्र जगहों के अंदर किसी भी तरह की गैर-कानूनी, अनैतिक या आपराधिक गतिविधि को बेहद संगीन माना जाता है। जब कोई मुजरिम एक साथ मक्का की हुरमत, हरम की गरिमा और मस्जिद की पवित्रता को ठेस पहुंचाता है, तो वहां की अदालतें बिना किसी देश, राष्ट्रीयता या लिंग के भेदभाव के ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाती हैं। ऐसे मामलों में सख्त सजा का मकसद दूसरों के लिए एक सबक पैदा करना होता है।

सामूहिक सजाएं और वैश्विक दृष्टिकोण

अक्सर वैश्विक मानवाधिकार संगठन सऊदी अरब में दी जाने वाली सामूहिक सजाओं पर सवाल उठाते हैं। उदाहरण के लिए, साल 2019 में एक साथ 37 नागरिकों और साल 2022 में रिकॉर्ड 81 लोगों के सिर कलम किए जाने की घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बटोरी थीं।

लेकिन इस आलोचना के पीछे एक दूसरा पहलू भी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। वैश्विक आंकड़ों को देखें तो मृत्युदंड के कार्यान्वयन के मामले में चीन दुनिया में पहले और ईरान दूसरे पायदान पर आते हैं। अकेले साल 2025 में ही ईरान में रिकॉर्ड संख्या में लोगों को फांसी के घाट उतारा गया। इसके बावजूद, वैश्विक और कुछ देसी विचारकों की इस भयावह आंकड़े पर मुकम्मल खामोशी उनके चश्मे के दोहरे मापदंड को उजागर करती है। आलोचकों का मानना है कि इस चुनिंदा विरोध का कारण मानवाधिकारों के प्रति प्रेम नहीं, बल्कि एक विशेष व्यवस्था के प्रति उनका पूर्वाग्रह है।

सख्त कानून, सुरक्षित समाज

सऊदी अरब का न्याय निज़ाम जज्बात, सोशल मीडिया अभियानों या किसी के रसूख से नहीं, बल्कि अपनी तयशुदा अदालती छलनी और सख्त इस्लामी कानूनों के तहत काम करता है। चाहे वह अपने ही देश का शहजादा हो या कोई विदेशी नागरिक, यदि हुदूद का उल्लंघन होता है, तो वहां की अदालतें ‘यल्ला मुदीर, मा फी मुश्किला’ कहकर आंखें नहीं मूंदतीं। यह सख्त कानूनी ढांचा ही है जो इस मुल्क को दुनिया के सबसे सुरक्षित देशों की फेहरिस्त में बनाए रखता है।

-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_img

पॉपुलर

और देखे
और देखे

गुनाह के नाम पर मौत, इंसाफ़ के नाम पर ख़ामोशी!

नज़रुल इस्लाम 22 साल के थे। वह बांग्लादेश के...

ख़ास फ़ीचर — दशहरा महोत्सव 2026

रावण के पुतले बनाते मुस्लिम कारीगर, रामलीला सजाते साझा...

तहज़ीब— रामलीला के मंच से गंगा-जमुनी तहज़ीब का पैग़ाम, वरिष्ठ अधिवक्ता फारूक अहमद सम्मानित

बांगरमऊ में रामलीला समिति ने समाजसेवियों और पत्रकारों को...

ज्ञान विज्ञान — डॉ. नजला अल-रदादी: खजूर से नैनो टेक्नोलॉजी तक

मदीना की वैज्ञानिक ने अजवा और बरनी खजूर के...