नज़रुल इस्लाम 22 साल के थे। वह बांग्लादेश के ब्राह्मणबाड़िया ज़िले के एक किसान के बेटे थे। उनके पिता ने परिवार को ग़रीबी से निकालने की उम्मीद में बेटे को सऊदी अरब भेजने के लिए सात लाख टका का क़र्ज़ लिया था। नवंबर 2022 में नज़रुल सऊदी अरब पहुंचे और मक्का की मस्जिद अल-हरम में सफ़ाईकर्मी की नौकरी करने लगे।
सात महीने बाद उन्हें एक युवती स्वीटी अख़्तर के साथ गिरफ़्तार कर लिया गया। दोनों पर मस्जिद के अंदर ‘अनैतिक काम’ करने का आरोप लगाया गया था।
14 अक्टूबर को, जेल में तीन साल तीन महीने बिताने के बाद, दोनों को मौत की सज़ा दे दी गई।
नज़रुल के परिवार को उनकी मौत की ख़बर समाचारों से मिली। ऐसा लगता है कि बांग्लादेश के वाणिज्य दूतावास को भी उनकी मौत की जानकारी इसी तरह मिली। परिवार का कहना है कि नज़रुल को अपना बचाव करने का मौक़ा तक नहीं दिया गया।
यह ख़बर सुनने के बाद उनकी एक रिश्तेदार की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। अब उनके पिता की बस एक ही ख़्वाहिश बची है, किसी तरह बेटे का शव वापस अपने वतन लाया जाए।
मुझे इस पूरी कहानी में दो अनैतिक काम दिखाई देते हैं।
पहला अनैतिक काम है मौत की सज़ा देना। एक सरकार ने दो नौजवानों की ज़िंदगी उस मामले में ख़त्म कर दी, जो दो लोगों के बीच का मामला था। उन्होंने चाहे जो भी किया हो, मेरी नज़र में वह उन्हें मार डालने को सही नहीं ठहराता।
दूसरा अनैतिक काम हमारी अपनी व्यवस्था का है।
तीन साल तीन महीने तक नज़रुल हर रविवार को जेल से अपने परिवार को फ़ोन करते थे। ब्राह्मणबाड़िया में रहने वाला एक ग़रीब किसान परिवार जानता था कि उसका बेटा कहां क़ैद है। फिर हमारे दूतावास को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी?
न कोई राजनयिक मुलाक़ात, न वकील की मदद, न सज़ा माफ़ कराने की अपील और न ही उनके हक़ में कोई आवाज़ उठाई गई।
और जब हमारी महिलाओं के साथ ज़ुल्म होता है, तब यह ग़ुस्सा कहां चला जाता है?
सऊदी अरब में काम करने वाली सैकड़ों महिलाएं यौन हिंसा और अपने मालिकों के ज़ुल्म की कहानियां लेकर अपने वतन लौट चुकी हैं। लेकिन उनके साथ ज़ुल्म करने वालों को मौत की सज़ा नहीं दी जाती। उन पर अक्सर मुक़दमा तक नहीं चलता।
ऐसा लगता है कि सऊदी अरब में नैतिकता के नियमों की सबसे सख़्त मार ग़रीबों और विदेश से रोज़ी कमाने आए लोगों पर पड़ती है, जबकि हमारी सरकार ख़ामोश बैठी रहती है।
जब हमारे प्रवासी मज़दूरों की कमाई देश पहुंचती है, तो हम उन्हें ‘रेमिटेंस हीरो’ यानी विदेश से पैसा भेजकर देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाले नायक कहते हैं। लेकिन जब उन्हें हमारी मदद की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, तब हम उन्हें भूल जाते हैं।
(शाहिदुल इस्लाम की वाल से)

