रहने के बेहतर इंतज़ाम, शिक्षा और दीन की तरफ़ बढ़ता रुझान; लेकिन पड़ोस की नज़दीकी, उर्दू और बुनियादी सुविधाओं के सामने नई चुनौतियाँ
(जावेद जमालुद्दीन)
मुंबई के पुराने और घनी आबादी वाले मुस्लिम इलाकों में शामिल मदनपुरा की पहचान अब सिर्फ़ तंग गलियों, पुरानी चॉलों और कपड़े के कारोबार तक सीमित नहीं रह गई है। समय के साथ यहाँ रहने के तरीक़े, आर्थिक हालात, शिक्षा को लेकर सोच और सामाजिक रिश्तों में काफ़ी बदलाव आया है। एक समय था, जब बड़े-बड़े परिवार एक ही कमरे में रहते थे। साझा शौचालय इस्तेमाल करने पड़ते थे और पड़ोसियों के बीच गहरा मेलजोल होता था। लेकिन अब पुनर्विकास यानी री-डेवलपमेंट के कारण पुरानी चॉलों की जगह ऊँची इमारतें ले रही हैं। नई पीढ़ी शिक्षा और रोज़गार के बेहतर मौक़ों की तरफ़ बढ़ रही है। माता-पिता भी बच्चों के भविष्य को लेकर पहले से ज़्यादा जागरूक हुए हैं। इसके बावजूद शहर की बुनियादी सुविधाओं, उर्दू भाषा, साहित्य और पुराने पड़ोसी रिश्तों को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
मदनपुरा में आ रहे इन बदलावों को समझने के लिए तीन जानी-मानी हस्तियों के अनुभव अहम हैं। इनमें वरिष्ठ पत्रकार और उर्दू दैनिक ‘उर्दू टाइम्स’ के संपादक फ़ारूक़ अंसारी, महाराष्ट्र कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स, साइंस एंड कॉमर्स के पूर्व प्रिंसिपल और फ़िलहाल महाराष्ट्र कॉलेज एजुकेशन सोसाइटी के निदेशक सिराजुद्दीन चौगले तथा वरिष्ठ वकील और उर्दू भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए काम करने वाले उर्दू केंद्र के अध्यक्ष एडवोकेट ज़ुबैर आज़मी शामिल हैं। तीनों अपने अनुभवों के आधार पर मदनपुरा की बदलती तस्वीर के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखते हैं। उनकी बातों से पता चलता है कि यहाँ तरक़्क़ी और पुरानी परंपराओं के बीच एक नया सामाजिक माहौल बन रहा है।
चॉलों की जगह टावर, लेकिन पड़ोस की नज़दीकी कम

फ़ारूक़ अंसारी चार दशक से भी ज़्यादा समय से मदनपुरा में रह रहे हैं। पत्रकारिता से लंबे जुड़ाव और इलाके की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को करीब से देखने के कारण उन्होंने यहाँ के बदलावों को बहुत नज़दीक से महसूस किया है।
उनके मुताबिक़ मदनपुरा में सबसे बड़ा बदलाव रहने के तरीक़े और लोगों के आपसी रिश्तों में आया है। पहले पड़ोस का मतलब सिर्फ़ आसपास रहने वाले लोगों से नहीं था, बल्कि ऐसे रिश्तों से था जिनमें ख़ुशी और ग़म दोनों मिलकर बाँटे जाते थे। किसी घर में अच्छा खाना बनता तो उसका हिस्सा पड़ोसी के घर भी पहुँचता था। किसी परिवार पर मुसीबत आती तो आसपास के लोग मदद के लिए आगे आ जाते थे। एक-दूसरे के घर आना-जाना रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा था।
फ़ारूक़ अंसारी का मानना है कि टावर कल्चर ने इस बेझिझक मेलजोल को प्रभावित किया है। अब एक ही इमारत में रहने वाले कई लोग एक-दूसरे को ठीक से जानते तक नहीं। लोग बेहतर घर, निजी सुविधाओं और अपनी अलग ज़िंदगी को ज़्यादा अहमियत देने लगे हैं। इससे रहने का स्तर तो बेहतर हुआ है, लेकिन सामूहिक जीवन की भावना कमज़ोर पड़ी है।
उनके अनुसार तरक़्क़ी का अंदाज़ा सिर्फ़ इस बात से नहीं लगाया जाना चाहिए कि लोग कितने बड़े फ़्लैटों में रहने लगे हैं। यह देखना भी ज़रूरी है कि उनका अपने पड़ोसियों और इलाके के दूसरे लोगों से कितना जुड़ाव है।
मोबाइल ने बढ़ाई सुविधा, लेकिन बातचीत हुई कम
नई पीढ़ी की आदतों में भी बदलाव आया है। मोबाइल फ़ोन और आधुनिक तकनीक ने लोगों के लिए कई काम आसान कर दिए हैं, लेकिन इनके ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल से परिवार के भीतर बातचीत और आपसी मेलजोल पर असर पड़ने की चिंता भी बढ़ी है।
फ़ारूक़ अंसारी के मुताबिक़ युवाओं का देर रात तक, कई बार रात दो या तीन बजे तक, मोबाइल फ़ोन में लगे रहना ध्यान देने वाली बात है। उनका मानना है कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल ज़रूरी है, लेकिन इसके साथ घर के बुज़ुर्गों के पास बैठना, परिवार के लोगों से बातचीत करना और सामाजिक रिश्तों को बनाए रखना भी उतना ही अहम है।
हालाँकि, फ़ारूक़ अंसारी मदनपुरा में हुए बदलावों को केवल सामाजिक दूरी के नज़रिये से नहीं देखते। उनके अनुसार नई इमारतों और बस्तियों के साथ मस्जिदों के निर्माण और पुरानी मस्जिदों के विस्तार से इबादत की सुविधाएँ बढ़ी हैं। रहमानी मस्जिद में भी विस्तार हुआ है।
उनके लिए मस्जिद केवल इबादत की जगह नहीं, बल्कि लोगों के मिलने और आपसी रिश्ते बनाए रखने का एक अहम ज़रिया भी है।
बच्चों की पढ़ाई पर बढ़ता ध्यान और लड़कियों के लिए शिक्षा के बेहतर मौक़े भी उन्हें सकारात्मक बदलाव लगते हैं। उनके अनुभव के मुताबिक़ लड़कियों की शिक्षा का अनुपात लगभग 50 प्रतिशत तक पहुँच चुका है। हालाँकि, इस आँकड़े की पुष्टि के लिए आधिकारिक या स्थानीय शिक्षा संबंधी आँकड़ों की ज़रूरत होगी।
मदरसों में अंग्रेज़ी और कंप्यूटर की पढ़ाई पर ध्यान दिया जाना भी इस बात का संकेत है कि अब पारंपरिक दीनी तालीम के साथ आधुनिक शिक्षा की अहमियत को भी समझा जा रहा है।
शिक्षा और मेरिट को लेकर बदली सोच
शिक्षा के क्षेत्र में आया बदलाव सिराजुद्दीन चौगले की बातचीत में ज़्यादा साफ़ दिखाई देता है। महाराष्ट्र कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल के रूप में उनका अनुभव मदनपुरा और आसपास के इलाकों के विद्यार्थियों, माता-पिता और शिक्षा से जुड़े रुझानों को समझने में मदद करता है।
उनके अनुसार पिछले दो से ढाई दशकों में शिक्षा को लेकर लोगों की सोच बदली है। पिछले दस वर्षों में यह बदलाव और ज़्यादा साफ़ नज़र आने लगा है।
चौगले बताते हैं कि पहले कुछ विद्यार्थी कॉलेज में दाख़िला पाने के लिए अलग-अलग मार्कशीट के आधार पर कोशिश करते थे। लेकिन अब मेरिट यानी अंकों और योग्यता के आधार पर दाख़िला पाने का रुझान बढ़ा है। इससे पता चलता है कि विद्यार्थी शिक्षा में मुकाबले की अहमियत समझने लगे हैं और माता-पिता भी बच्चों के भविष्य के लिए पढ़ाई को ज़रूरी मान रहे हैं।
उनके मुताबिक़ हिंदू, मुस्लिम और ईसाई परिवारों की लड़कियाँ शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। स्थानीय मुस्लिम विद्यार्थी भी मेरिट के आधार पर कॉलेजों में दाख़िला हासिल कर रहे हैं।
चौगले के अनुसार शिक्षा की अहमियत इसलिए भी बढ़ी है, क्योंकि अब इसका सीधा संबंध रोज़गार और आर्थिक मज़बूती से जुड़ गया है। जब किसी नौजवान को अच्छी शिक्षा के बाद बेहतर नौकरी मिलती है, तो उसकी कामयाबी दूसरे परिवारों के लिए भी प्रेरणा बनती है।
इस तरह एक विद्यार्थी की कामयाबी पूरे परिवार की सोच बदल सकती है और दूसरी पीढ़ी के लिए बेहतर भविष्य की उम्मीद पैदा करती है। लड़कियों की शिक्षा में आगे बढ़ना विशेष रूप से अहम है, क्योंकि इससे परिवारों में पढ़ाई का दायरा बढ़ता है और लड़कियों को अपनी काबिलियत दिखाने के ज़्यादा मौक़े मिलते हैं।
दीनी रुझान के साथ सही जानकारी की ज़रूरत
शिक्षा के साथ दीन की तरफ़ बढ़ते रुझान का ज़िक्र करते हुए चौगले कहते हैं कि नौजवानों में दीनी तालीम हासिल करने और नमाज़ की तरफ़ ध्यान देने का रुझान भी दिखाई देता है। उनके अनुभव में यह रुझान अलग-अलग मसलकों से जुड़े लोगों में मौजूद है।
हालाँकि, सोशल मीडिया के ज़रिए धार्मिक जानकारी और दूसरी तरह की सूचनाएँ आसानी से मिल जाती हैं, लेकिन हर जानकारी को सही मान लेना उचित नहीं है।
उनका कहना है कि नौजवानों को किसी भी जानकारी पर भरोसा करने या उसे आगे साझा करने से पहले उसकी जाँच करनी चाहिए। आधुनिक तकनीक से फ़ायदा उठाने के साथ सही और ग़लत में फ़र्क़ करने की समझ भी ज़रूरी है।
कपड़े के कारोबार से नए पेशों तक
मदनपुरा में शिक्षा, आर्थिक हालात और रहने के तरीक़ों में आए बदलावों को समझने के लिए एडवोकेट ज़ुबैर आज़मी के अनुभव भी अहम हैं। वरिष्ठ वकील होने के साथ उर्दू केंद्र के अध्यक्ष के रूप में उनका जुड़ाव इलाके की सामाजिक और सांस्कृतिक ज़िंदगी से भी है।
उनके मुताबिक़ मदनपुरा कभी पावरलूम और कपड़े के कारोबार के लिए मशहूर था। इसी वजह से इसे ‘मुंबई का मैनचेस्टर’ भी कहा जाता था। उस दौर में कई परिवारों का गुज़ारा एक व्यक्ति की कमाई से हो जाता था। आर्थिक साधन सीमित थे, लेकिन चॉलों में रहने वाले लोगों के बीच सहयोग और अपनापन था।
समय के साथ परिवार बड़े हुए। नई पीढ़ी ने शिक्षा हासिल की और रोज़गार के नए रास्ते तलाशे। आज़मी के अनुसार अंसारी बिरादरी और बुनकर समुदाय के कई नौजवानों ने शिक्षा और उपलब्ध मौक़ों से फ़ायदा उठाया। पिछड़े वर्गों के लिए उपलब्ध कुछ अवसरों ने भी लोगों को आगे बढ़ने में मदद की।
आज मदनपुरा और आसपास के इलाकों से डॉक्टर, इंजीनियर और दूसरे पेशेवर लोग सामने आए हैं। कुछ लोगों को विदेशों में भी रोज़गार मिला है। इन बदलावों ने परिवारों की आर्थिक स्थिति, घरों की ज़रूरतों और नई पीढ़ी की उम्मीदों को प्रभावित किया है।
छोटे कमरों से निजी फ़्लैटों तक का सफ़र
री-डेवलपमेंट ने मदनपुरा की बदलती तस्वीर को सबसे ज़्यादा साफ़ किया है।
पुरानी चॉलों में छोटे-छोटे कमरों में बड़े परिवार रहते थे। साझा शौचालय इस्तेमाल करने पड़ते थे और सुबह के समय लोगों को अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता था। लेकिन जैसे-जैसे परिवार बड़े हुए, बच्चों की शादियाँ हुईं और नई पीढ़ी के अलग परिवार बनने लगे, वैसे-वैसे उन्हीं कमरों में सभी का रहना मुश्किल होता गया।
आज़मी के मुताबिक़ ऐसे हालात में कुछ परिवारों को अपने पुराने मकान बेचकर मीरा रोड या दूसरे इलाकों में जाना पड़ा।
नई इमारतों में अलग शौचालय, निजी सुविधाओं वाले फ़्लैट और रहने के बेहतर इंतज़ाम उपलब्ध होने से लोगों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है। अब परिवार पहले के मुक़ाबले ज़्यादा आराम से रह सकते हैं।
लेकिन इस बदलाव का फ़ायदा हर परिवार को एक जैसा नहीं मिला। कुछ लोगों के लिए नई इमारतें बेहतर जीवन का ज़रिया बनीं, जबकि कुछ परिवारों को अपना पुराना इलाका छोड़ना पड़ा।
इस तरह री-डेवलपमेंट केवल पुरानी इमारतों की जगह नई इमारतें खड़ी करने का नाम नहीं है। इसने स्थानीय आबादी के रहने के तरीक़े और सामाजिक रिश्तों को भी प्रभावित किया है।
ऊँची इमारतें बढ़ीं, लेकिन सड़कें और पार्किंग कहाँ?
आज़मी के अनुसार मदनपुरा की तरक़्क़ी का अंदाज़ा केवल ऊँची इमारतों की संख्या से नहीं लगाया जा सकता। इलाके की तंग गलियाँ, बढ़ती गाड़ियों और पार्किंग की कमी जैसी समस्याएँ अब शहरी ज़िंदगी के बड़े सवाल बन गई हैं।
नई इमारतों के साथ कारों और दोपहिया वाहनों की संख्या बढ़ी है, लेकिन सड़कों और पार्किंग की जगह में उसी हिसाब से बढ़ोतरी नहीं हुई। कई जगह ट्रैफ़िक की भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि एम्बुलेंस या दूसरी आपातकालीन गाड़ियों को निकलने में भी परेशानी हो सकती है।
उनका कहना है कि नए निर्माण की योजना बनाते समय पार्किंग, रास्तों और आपातकालीन सेवाओं के लिए जगह का इंतज़ाम करना बेहद ज़रूरी है।
सफ़ाई, सड़कों की हालत और दूसरी बुनियादी सुविधाओं पर भी लगातार ध्यान देने की ज़रूरत है। केवल नई इमारतें बन जाने से विकास पूरा नहीं हो जाता। इसके साथ बेहतर सड़कें, ट्रैफ़िक व्यवस्था और आपातकालीन सेवाओं तक आसान पहुँच भी होनी चाहिए।
बढ़ती आबादी और घरों की ज़रूरतों को देखते हुए री-डेवलपमेंट कई जगह ज़रूरी हो सकता है। लेकिन इसे इस तरह आगे बढ़ाया जाना चाहिए कि वहाँ रहने वाले लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी और मुश्किल न हो।
धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान आज भी कायम
आर्थिक और आवासीय बदलावों के बावजूद मदनपुरा की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान आज भी बनी हुई है।
आज़मी के मुताबिक़ ईद मिलादुन्नबी ﷺ के जुलूस, मुहर्रम की मजलिसें और दूसरी धार्मिक व सामाजिक गतिविधियाँ इलाके की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। ऊँची इमारतों और आधुनिक रहन-सहन के बावजूद ये पारंपरिक आयोजन जारी हैं।
इससे पता चलता है कि रहने के तरीक़े बदलने का मतलब अपनी सांस्कृतिक पहचान को छोड़ देना नहीं है। ज़रूरत इस बात की है कि नई पीढ़ी को अपने इतिहास, परंपराओं और सामाजिक विरासत से जोड़े रखने की कोशिश की जाए।
उर्दू के साइनबोर्ड कम हुए, पढ़ने का माहौल भी प्रभावित
मदनपुरा में उर्दू भाषा और पढ़ने-लिखने के माहौल को लेकर फ़ारूक़ अंसारी की चिंता भी अहम है।
उनके अनुसार बाज़ारों, दुकानों और संस्थानों में पहले के मुक़ाबले उर्दू के साइनबोर्ड कम दिखाई देने लगे हैं। उर्दू बोलने और समझने वाले लोग आज भी मौजूद हैं, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर लिखी हुई उर्दू की मौजूदगी घट रही है।
इलाके में पहले पुस्तकालय और पढ़ाई-लिखाई से जुड़े कुछ संस्थान भी थे, लेकिन समय के साथ उनमें से कुछ बंद हो गए। उनके विचार में यह बदलाव केवल भाषा के कम इस्तेमाल होने का मामला नहीं है। उर्दू के साथ किताबों, साहित्य, शायरी और इतिहास की एक पूरी परंपरा जुड़ी हुई है।
ऐसे में उर्दू केंद्र जैसे संस्थानों की अहमियत और बढ़ जाती है। उर्दू को बढ़ावा देने की कोशिश तभी असरदार हो सकती है, जब भाषा को रोज़मर्रा की ज़िंदगी, शिक्षा, पढ़ने की आदत और नई पीढ़ी की ज़रूरतों से जोड़ा जाए।
आधुनिक शिक्षा, अंग्रेज़ी और कंप्यूटर का ज्ञान आज की ज़रूरत है। लेकिन इसके साथ अपनी भाषा और साहित्य से रिश्ता बनाए रखना भी उतना ही अहम है। दोनों को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय साथ लेकर चलना ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा।
मदनपुरा की तरक़्क़ी का असली मतलब क्या है?
मदनपुरा की पूरी सामाजिक तस्वीर में ये सभी पहलू एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
फ़ारूक़ अंसारी के अनुभव बताते हैं कि बेहतर घरों में रहने के बावजूद पड़ोसियों के बीच पुराना अपनापन कम हो सकता है। सिराजुद्दीन चौगले की बातें शिक्षा, मेरिट और लड़कियों की बढ़ती भागीदारी के ज़रिए नई पीढ़ी की बदलती सोच को सामने लाती हैं। वहीं एडवोकेट ज़ुबैर आज़मी के अनुभव बताते हैं कि आवासीय विकास के साथ बेहतर शहरी व्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना भी ज़रूरी है।
इन तीनों नज़रियों को साथ रखकर देखें तो मदनपुरा की कहानी न तो पूरी तरह अतीत से दूर होने की है और न ही केवल विकास की कामयाबी की। यहाँ बेहतर घरों, शिक्षा के बढ़ते मौक़ों और आर्थिक तरक़्क़ी की संभावनाएँ मौजूद हैं। लेकिन इनके साथ नागरिक सुविधाओं, उर्दू भाषा, साहित्य और सामाजिक रिश्तों को बचाए रखने की ज़िम्मेदारी भी बढ़ गई है।
असली ज़रूरत यह है कि मदनपुरा के विकास में केवल इमारतों को नहीं, बल्कि वहाँ रहने वाले इंसानों को भी अहमियत दी जाए। शिक्षण संस्थान नौजवानों को बेहतर भविष्य की तरफ़ ले जाएँ। मस्जिदें और सामाजिक संगठन लोगों के बीच मेलजोल बढ़ाने का ज़रिया बनें। उर्दू के साहित्यिक और शैक्षणिक ख़ज़ाने को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। साथ ही, री-डेवलपमेंट की योजनाओं में सड़क, पार्किंग, सफ़ाई और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता मिले।
अगर इन सभी पहलुओं के बीच संतुलन बनाया जा सके तो मदनपुरा अपनी बदलती पहचान के बावजूद उस सामाजिक अपनापन और सांस्कृतिक रंग को बचा सकता है, जो लंबे समय से उसकी पहचान रहे हैं।
आख़िरकार मदनपुरा का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि उसके लोग कितनी ऊँची इमारतों में रहने लगे हैं। इससे ज़्यादा अहम यह है कि उन्हें बेहतर शिक्षा, सम्मानजनक जीवन, अच्छी नागरिक सुविधाएँ और आपसी रिश्ते निभाने के कितने अवसर मिलते हैं।
चॉलों का पुराना दौर शायद वापस न आए, लेकिन वहाँ मौजूद आपसी सहयोग, पड़ोस की मोहब्बत और सामूहिक ज़िम्मेदारी को नई शहरी ज़िंदगी का हिस्सा ज़रूर बनाया जा सकता है।
यही वह रास्ता है, जिस पर चलकर मदनपुरा आधुनिक विकास और अपनी सांस्कृतिक पहचान, दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ सकता है।
–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

