(-एम. बुरहानुद्दीन क़ासमी)
अमेरिका से सीखने की जरूरत
अमेरिका में सीनेट, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से लेकर राज्यों की विधानसभाओं तक कई मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है। अल्हम्दुलिल्लाह! 2026 के मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी को बड़ी कामयाबी मिली और ट्रंप की नफरत की राजनीति को भी बड़ा झटका लगा। सभी विजयी उम्मीदवारों और डेमोक्रेटिक नेताओं को मुबारकबाद।
लेकिन भारत, खासकर उत्तर प्रदेश के उन मुस्लिम नेताओं को इससे एक बड़ी सीख लेने की जरूरत है, जो अपने आपको मुस्लिम समाज का नेता बनाना चाहते हैं।
दिल जीतकर बनते हैं नेता
अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप में कामयाब होने वाले मुस्लिम नेताओं ने सिर्फ मुसलमानों के वोट से जीत हासिल नहीं की। उन्होंने जॉन, जॉर्ज, मार्टिन, गौतम, यादव, सिंह और मोहम्मद, यानी हर धर्म और समुदाय के लोगों का भरोसा जीता।
उनकी कामयाबी की वजह धार्मिक भावनाओं को भड़काना या समाज को बांटना नहीं थी। उन्होंने बेहतर सरकार, अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं, लोगों के रहन-सहन में सुधार और सबके बेहतर भविष्य की बात की। उन्होंने अलग-अलग समुदायों के बीच भरोसा पैदा किया और अपने काम से लोगों का दिल जीता।यही वजह है कि दूसरे धर्मों और समुदायों के लोगों ने भी उनका साथ दिया।
यूपी की राजनीति में उलटी राह
इसके उलट, भारत के उत्तर प्रदेश में कुछ मुस्लिम नेताओं की राजनीति का तरीका बिल्कुल अलग दिखाई देता है। वे समाज में नफरत बढ़ाने, लोगों को बांटने और एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने का काम कर रहे हैं।
ऐसे नेता अपने आपको मुसलमानों का रहनुमा बताते हैं, लेकिन उनकी राजनीति का नतीजा यह होता है कि गैर-मुस्लिम समुदायों में मुसलमानों के प्रति दूरी और शक बढ़ता है। इससे आपसी भाईचारे, भरोसे और सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचता है।
ऐसे नेताओं को पहचानना और उनकी राजनीति को समझना जरूरी है, क्योंकि उनका फायदा समाज को बांटकर ही होता है।
भारत और अमेरिका में फर्क
हमें यह भी समझना होगा कि आज का भारत, अमेरिका या यूरोप नहीं है। यहां चुनावी राजनीति का माहौल और मतदाताओं की सोच कई मामलों में अलग है।
भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में केवल अपने समुदाय के वोटों के सहारे राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी कामयाबी हासिल करना आसान नहीं है।
अगर भारत का कोई मुस्लिम नेता अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के कामयाब मुस्लिम नेताओं जैसा बनने का दावा करता है, तो उसे उनके काम करने के तरीके से सीखना चाहिए। उसे ऐसा भरोसा पैदा करना होगा कि शर्मा, गौतम, यादव, ठाकुर, सिंह और दूसरे समुदायों के लोग भी उसके साथ गर्व से खड़े हों।
यही असली नेतृत्व है। इसके उलट, ऊंची आवाज में भाषण देना, धार्मिक भावनाएं भड़काना और समाज में दुश्मनी पैदा करना किसी नेता को बड़ा नहीं बनाता। इससे समाज और आने वाली पीढ़ियां अंधेरे की तरफ जाती हैं।
सियासत का फिल्मी ड्रामा
हर काल्पनिक फिल्म में आमतौर पर दो मुख्य किरदार होते हैं, एक हीरो और दूसरा विलेन। दर्शकों का बड़ा हिस्सा हीरो की तारीफ करता है, जबकि कुछ लोग विलेन के अभिनय को भी पसंद करते हैं।
लेकिन फिल्म की कामयाबी में दोनों किरदारों की भूमिका होती है। दोनों एक ही निर्देशक की कहानी के मुताबिक काम करते हैं और आखिरकार फिल्म बनाने वाली कंपनी को फायदा पहुंचाते हैं।
कभी-कभी राजनीति में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है। कुछ नेता एक समुदाय के लिए हीरो बनते हैं, तो दूसरे समुदाय के लिए विलेन। जनता उनके भाषण सुनती है, तालियां बजाती है, गुस्सा होती है और भावनाओं में बह जाती है।
लेकिन समझदार जनता को यह पहचानना चाहिए कि पर्दे पर जो दिखाया जा रहा है, वह हमेशा पूरी सच्चाई नहीं होता। कई बार यह सिर्फ एक राजनीतिक प्रदर्शन भी हो सकता है।
हीरो या विलेन नहीं, काम देखिए
भारत की राजनीति में भी ऐसा राजनीतिक ड्रामा हो सकता है। कोई अब्दुल कुछ लोगों के लिए हीरो बनकर सामने आए और कुछ दूसरे लोगों के लिए विलेन।
आप उसका भाषण सुनिए, उसकी राजनीति को देखिए, लेकिन अपनी सोच और समझ उसके हवाले मत कीजिए। किसी भी नेता को यह मौका मत दीजिए कि वह आपके वर्तमान को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करे, समाज में जहर घोले और देश की आने वाली पीढ़ियों का भविष्य खराब करे।
राष्ट्रीय नेता वही, जो सबका भरोसा जीते
भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में वह नेता राष्ट्रीय नेता होने का दावा नहीं कर सकता, जो अपने ही समुदाय से बाहर के लोगों का दिल और भरोसा न जीत सके।
संसद में कानून बनाने और बदलने के लिए बहुमत की जरूरत होती है। ऐसे में अगर कोई नेता केवल अपने समुदाय के बीच लोकप्रिय है, लेकिन दूसरे समुदायों का भरोसा हासिल नहीं कर पाता, तो उसकी राजनीतिक ताकत सीमित रह जाती है।
समाज को बांटने वाली राजनीति किसी के लिए बेहतर भविष्य नहीं बना सकती। हो सकता है कि कोई नेता ‘आपका अपना रहनुमा’ बनकर राजनीतिक फायदा उठा ले, लेकिन जब संसद और कानून बनाने की बात आए तो वह अपने ही मतदाताओं के लिए कोई बड़ा और ठोस काम न कर पाए।
इसलिए भारतीय मुसलमानों को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो सिर्फ उनके वोटों के सहारे अपनी राजनीति न चमकाएं, बल्कि पूरे देश का भरोसा जीतें। जो मुसलमानों के अधिकारों की बात भी करें और देश के हर नागरिक के साथ मिलकर बेहतर भारत बनाने की क्षमता भी रखते हों।
याद रखिए, असली नेता वह नहीं जो अपने लोगों को दूसरों से लड़ना सिखाए, बल्कि वह है जो सबको साथ लेकर चलने का हुनर रखता हो।
-लेखक ईस्टर्न क्रिसेंट मैगजीन, मुंबई के संपादक हैं

