मंसूर अब्बास की ‘राअम’ पार्टी कैसे बनी सियासत का अहम किरदार
–रईस खान
इज़रायल की राजनीति में अरब पार्टियों की भूमिका एक बार फिर चर्चा में है। 27 अक्टूबर 2026 को हुए संसदीय चुनाव के बाद किसी भी बड़े राजनीतिक खेमे को सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटें नहीं मिली हैं। ऐसे में अरब पार्टियों का समर्थन अगली सरकार के गठन में अहम हो गया है। चुनाव के नतीजों के मुताबिक, अरब नेतृत्व वाले दो प्रमुख गठबंधनों को मिलाकर 19 सीटें मिली हैं। इनमें मंसूर अब्बास की राअम पार्टी को 8 और जॉइंट लिस्ट को 11 सीटें मिली हैं।
यह तस्वीर बताती है कि इज़रायल की राजनीति में अरब नागरिकों की भागीदारी केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। कई बार उनके सांसद सरकार बनाने, कानूनों और सरकारी बजट से जुड़े फैसलों पर भी असर डाल सकते हैं।
क्या है राअम पार्टी?
राअम का पूरा नाम ‘यूनाइटेड अरब लिस्ट’ है। यह इज़रायल की अरब मुस्लिम आबादी से जुड़ी एक राजनीतिक पार्टी है, जिसकी स्थापना 1996 में हुई थी। पार्टी की जड़ें इस्लामिक मूवमेंट की दक्षिणी शाखा में हैं। इसके प्रमुख नेता मंसूर अब्बास हैं, जो पेशे से डेंटिस्ट रहे हैं और इज़रायल की संसद में अरब नागरिकों के मुद्दे उठाते रहे हैं।
राअम की राजनीति का एक अहम पहलू यह है कि वह इज़रायल की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के भीतर रहकर अरब समुदाय के लिए ठोस सुविधाएं और अधिकार हासिल करने पर जोर देती है। इसमें अरब इलाकों में अपराध पर रोक, बेहतर सड़कें, घरों की समस्या, शिक्षा, रोजगार, स्थानीय निकायों के लिए बजट और बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं।
हालांकि, पार्टी का सामाजिक नजरिया रूढ़िवादी और धार्मिक है। इसी वजह से वह कुछ मुद्दों पर दूसरी अरब पार्टियों से अलग दिखाई देती है।
2021 में बदला इज़रायल की राजनीति का समीकरण
राअम की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में वर्ष 2021 का घटनाक्रम शामिल है। उस साल पार्टी ने नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का हिस्सा बनकर इतिहास रचा। इज़रायल की किसी अरब पार्टी का पहली बार औपचारिक रूप से सरकार में शामिल होना एक बड़ा राजनीतिक बदलाव था।
मंसूर अब्बास का तर्क रहा है कि अरब नागरिकों के लिए केवल विरोध की राजनीति करना पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक, सरकार और संसद में बातचीत के जरिए भी अरब समुदाय के लिए बजट, सुरक्षा, शिक्षा और विकास से जुड़े काम कराए जा सकते हैं।
लेकिन इस रास्ते की आलोचना भी होती रही है। कुछ अरब नेताओं और समर्थकों का मानना है कि सरकार में भागीदारी के बावजूद फिलिस्तीन के सवाल, अरब नागरिकों के साथ भेदभाव और राष्ट्रीय पहचान जैसे बड़े मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इज़रायल में अरब नागरिकों की स्थिति
इज़रायल में अरब नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा फिलिस्तीनी मूल का है। वे इज़रायली नागरिक होने के नाते चुनाव में वोट डाल सकते हैं और संसद के लिए अपने प्रतिनिधि चुन सकते हैं। इसके बावजूद अरब समुदाय के सामने अपराध, आवास, स्थानीय विकास और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएं लंबे समय से चर्चा में रही हैं।
इज़रायल की संसद को हिब्रू में ‘कनेस्सेट’ कहा जाता है। इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सदस्यों का समर्थन जरूरी है। इसलिए कम सीटें रखने वाली पार्टियां भी उस समय काफी अहम हो जाती हैं, जब किसी बड़े दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता।
2026 के चुनाव के बाद यही स्थिति बनी है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का समर्थन करने वाले खेमे को 53 सीटें मिलीं, जबकि उनके विरोधी खेमे को 48 सीटें मिलीं। अरब नेतृत्व वाली पार्टियों की 19 सीटें इस राजनीतिक गणित में अहम हैं। हालांकि, इन पार्टियों के बीच भी राजनीतिक रणनीति और सरकार को समर्थन देने के सवाल पर मतभेद हो सकते हैं।
अरब पार्टियों का भविष्य क्या होगा?
2026 के चुनाव के बाद राअम और जॉइंट लिस्ट के सामने एक तरफ अरब समुदाय की समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ सरकार गठन के दौरान अपनी राजनीतिक शर्तें मनवाने का अवसर भी है।
राअम का अनुभव बताता है कि इज़रायल की संसदीय राजनीति में भागीदारी के जरिए अरब समुदाय के लिए सरकारी बजट और विकास योजनाओं पर बातचीत की जा सकती है। लेकिन यह रास्ता कितना कामयाब होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि राजनीतिक समझौते वास्तव में लोगों की जिंदगी में कितना बदलाव ला पाते हैं।
इज़रायल की अरब राजनीति को समझने के लिए केवल संसद में सीटों की संख्या देखना काफी नहीं है। इसके साथ अरब नागरिकों की सामाजिक स्थिति, फिलिस्तीन का सवाल, धार्मिक पहचान और बराबरी के अधिकारों की मांग को भी समझना जरूरी है। यही वे मुद्दे हैं जो आने वाले दिनों में इज़रायल की राजनीति में अरब पार्टियों की भूमिका तय करेंगे।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

