सरकारों की अनदेखी से हाशिए पर अति पिछड़ा ‘मुस्लिम जोगी’ समाज

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(फजलुर्रहमान की ​विशेष रिपोर्ट)

​बांगरमऊ, उन्नाव। देश के विभिन्न राज्यों में फैले अति पिछड़े ‘मुस्लिम जोगी’ समाज ने एक बार फिर सरकारों के खिलाफ अपनी उपेक्षा का मुद्दा उठाया है। समाज के प्रतिनिधियों का आरोप है कि दशकों से चली आ रही राजनीतिक अनदेखी के कारण यह समुदाय आज भी शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।

​ ​मुस्लिम जोगी समुदाय मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और हरियाणा आदि के तमाम हिस्सों में भारी तादाद में निवास करता है। ऐतिहासिक रूप से इस समाज का जुड़ाव सूफीवाद के संगम से रहा है। ये लोग पारंपरिक रूप से सारंगी बजाकर सूफियाना कलाम गाने और फेरी लगाकर जीवन यापन करने के लिए जाने जाते थे। हालांकि, समय के साथ इनकी पारंपरिक कला विलुप्त होती गई और आज यह समाज भीषण गरीबी के दौर से गुजर रहा है।

​समाज के नेता हबीबुल रहमान बाबूजी का कहना है कि मुस्लिम जोगी समाज की आबादी काफी होने के बावजूद किसी भी बड़ी राजनीतिक पार्टी ने उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया। उन्हें केवल ‘वोट बैंक’ की तरह इस्तेमाल किया गया। हालांकि कई राज्यों में यह समाज अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सूची में शामिल है, लेकिन ‘अति पिछड़ा’ श्रेणी में स्पष्ट वर्गीकरण न होने के कारण आरक्षण का असली लाभ संपन्न पिछड़ी जातियों को मिल जाता है। आर्थिक तंगी के कारण इस समाज के बच्चों में स्कूल छोड़ने (ड्रॉपआउट) की दर बहुत अधिक है। सरकारी योजनाओं का लाभ इन तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देता है।

आज भी इस समाज का एक बड़ा हिस्सा कच्ची बस्तियों में रहने को मजबूर है। भूमिहीन होने के कारण वे कृषि ऋण या अन्य सरकारी सहायता का लाभ नहीं उठा पाते। ​मुस्लिम जोगी समाज से जुड़े संगठनों ने सरकारों के सामने निम्नलिखित माँगें रखी हैं जो इस प्रकार हैं-​मुस्लिम जोगी समाज को ‘अति पिछड़ा वर्ग’ (MBC) की श्रेणी में अलग से कोटा प्रदान किया जाए। ​समुदाय के पारंपरिक संगीत और कला को पुनर्जीवित करने के लिए सांस्कृतिक अनुदान दिया जाए। ​समाज के लिए विशेष आवासीय योजनाओं और शिक्षा छात्रवृत्ति की घोषणा हो।

सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए ताकि मुस्लिम समुदायों के भीतर मौजूद इन वंचित समूहों का भला हो सके। ​जानकारों का मानना है कि जब तक सरकारों की नजर इन ‘अति पिछड़ी’ सूक्ष्म जातियों पर नहीं पड़ती, तब तक ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा इस समाज के लिए केवल एक सपना ही रहेगा। मुस्लिम जोगी समाज अब संगठित होकर अपनी आवाज बुलंद करने की तैयारी कर रहा है ताकि आगामी चुनावों में वे अपनी उपेक्षा का जवाब दे सकें।

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