भारत में मुस्लिमों का राजनीतिक बहिष्कार, पड़ोसी देशों से सबक क्यों नहीं लेती मोदी सरकार

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(रईस खान)

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहां मुस्लिम आबादी करीब 20 करोड़ है, क्या यह कल्पना करना मुश्किल नहीं कि केंद्र सरकार में एक भी मुस्लिम मंत्री न हो? फिर भी, मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में यही हकीकत है। जहां बांग्लादेश जैसे छोटे पड़ोसी देश ने अपनी हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय को कैबिनेट में जगह देकर समावेशिता का उदाहरण पेश किया है, वहीं भारत में भाजपा सरकार मुस्लिमों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से दूर रखने की नीति पर चल रही है। यह एक जांच-पड़ताल है कि कैसे भारत की मौजूदा सरकार अल्पसंख्यकों के अधिकारों को नजरअंदाज कर रही है, जबकि दुनिया के कई देश इससे सबक ले चुके हैं। सरल शब्दों में कहें, तो यह दोहरी नीति का खेल है, बाहर अरब देशों से दोस्ती, अंदर मुस्लिमों से भेदभाव।

मोदी कैबिनेट में मुस्लिमों की अनुपस्थिति: एक ऐतिहासिक शर्म

मौजूदा दौर में मोदी सरकार के 72 मंत्रियों का मंत्रिमंडल है, लेकिन इसमें एक भी मुस्लिम चेहरा नहीं है। यह आजादी के बाद पहली बार हुआ है कि केंद्र सरकार में मुस्लिम प्रतिनिधित्व शून्य हो गया। पहले कैबिनेट्स में मुस्लिम मंत्री होते थे, जैसे 2014-2022 तक मुख्तार अब्बास नकवी अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री थे, लेकिन 2022 के बाद से यह जगह खाली है। लोकसभा में भी स्थिति दयनीय है, 2024 चुनावों में भाजपा के 240 सांसदों में एक भी मुस्लिम नहीं है। कुल 543 सीटों में मुस्लिम सांसदों की संख्या सिर्फ 24 है, जो 4% से भी कम है, जबकि मुस्लिम आबादी 14% है।

यह सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति लगती है। भाजपा के उदय के साथ मुस्लिम प्रतिनिधित्व घटता गया है। 1980 में मुस्लिम सांसदों की संख्या 9% तक पहुंची थी, लेकिन अब यह गिरकर 5% से नीचे आ गया है। आलोचक कहते हैं कि भाजपा की हिंदू राष्ट्रवाद वाली विचारधारा मुस्लिमों को बाहर रखने का आधार बन रही है। उदाहरण के लिए, नागरिकता संशोधन कानून में मुस्लिमों को बाहर रखा गया, जो पड़ोसी देशों से आने वाले शरणार्थियों को नागरिकता देता है लेकिन मुस्लिमों को नहीं। इससे मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा बढ़ी है।

बांग्लादेश और पाकिस्तान से तुलना: छोटे देश, बड़ा सबक

अब जरा पड़ोसी देशों पर नजर डालें। बांग्लादेश, जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, ने हाल ही में अपनी नई सरकार में हिंदू अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व दिया। प्रधानमंत्री तारिक रहमान के कैबिनेट में निताई रॉय चौधरी एकमात्र हिंदू मंत्री हैं, जिन्हें संस्कृति मंत्रालय सौंपा गया है। इसके अलावा, एक बौद्ध नेता दीपेन देवन को चटगांव हिल ट्रैक्ट्स मामलों का मंत्री बनाया गया। यह कदम अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकारों को मजबूत करने का संदेश देता है, खासकर 2024 के विरोध प्रदर्शनों के बाद जब हिंदू समुदाय पर हमले हुए थे। बांग्लादेश जैसे छोटे देश ने दिखाया कि बहुसंख्यकवाद के बीच अल्पसंख्यकों को जगह देकर समाज को मजबूत किया जा सकता है।

इसी तरह, पाकिस्तान में भी हिंदू राजनीतिज्ञों को जगह मिली है। 2017 में दर्शन लाल को कैबिनेट में शामिल किया गया, जो 20 सालों में पहले हिंदू मंत्री थे। पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में गैर-मुस्लिमों के लिए 10 आरक्षित सीटें हैं, जिनमें कई हिंदू सांसद हैं, जैसे केसू मल खील दास और डॉ. दर्शन। पूर्व मंत्री राणा चंद्र सिंह जैसे नेता संघीय स्तर पर काम कर चुके हैं। पाकिस्तान, जहां हिंदू सिर्फ 2% हैं, फिर भी उन्हें राजनीतिक स्पेस देता है। भारत, जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, यहां से क्या सीख रहा है?

दुनिया के अन्य देशों में भी अल्पसंख्यकों को प्रमुख पद मिलते हैं। अमेरिका में कमला हैरिस जैसे एशियन-अमेरिकन उपराष्ट्रपति बनीं, ब्रिटेन में ऋषि सुनक प्रधानमंत्री। लेकिन भारत में भाजपा सरकार आने के बाद मुस्लिमों के खिलाफ कथित भेदभाव बढ़ा है, गौ-रक्षा के नाम पर हमले, मस्जिदों पर विवाद, और राजनीतिक बहिष्कार।

दोहरी नीति, अरब देशों से गलबहियां, घर में भेदभाव

मोदी सरकार की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह मुस्लिमों के साथ भेदभाव करते हुए अरब देशों के शासकों से दोस्ती निभाती है। प्रधानमंत्री मोदी सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों में जाते हैं, वहां के मुस्लिम नेताओं से गले मिलते हैं, और भारत में उनके सम्मान का दिखावा करते हैं। लेकिन घरेलू स्तर पर मुस्लिम समुदाय को नजरअंदाज किया जाता है। क्या यह दोहरी नीति नहीं? एक तरफ खाड़ी देशों से निवेश और व्यापार, दूसरी तरफ भारत के मुस्लिमों को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखना। आलोचक कहते हैं कि इससे भारत की सेकुलर छवि को नुकसान पहुंच रहा है।

उदाहरण के तौर पर, 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद मुस्लिम-बहुल राज्य की स्वायत्तता खत्म हो गई। इसके अलावा, गौ-हत्या पर सख्त कानूनों के नाम पर मुस्लिमों पर हमले बढ़े हैं। ये कदम मुस्लिम समुदाय को नुकसान पहुंचाने वाले लगते हैं, जबकि सरकार दावा करती है कि यह सब विकास के लिए है। लेकिन सच्चाई यह है कि मुस्लिमों की राजनीतिक भागीदारी घट रही है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा है।

समावेशी भारत की जरूरत

भारत को अपनी विविधता पर गर्व है, लेकिन अगर अल्पसंख्यकों को राजनीतिक स्पेस नहीं मिलेगा, तो यह गर्व खोखला हो जाएगा। बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों से सीखते हुए मोदी सरकार को मुस्लिमों को कैबिनेट और संसद में जगह देनी चाहिए। यह न सिर्फ न्याय की बात है, बल्कि देश की एकता के लिए जरूरी है। अगर सरकार सच्चे लोकतंत्र की बात करती है, तो भेदभाव छोड़कर समावेशिता अपनानी होगी। अन्यथा, यह दोहरी नीति भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को और कमजोर करेगी। क्या समय आ गया है कि सरकार इस पर सोचे?

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