(रईस खान)
रमज़ान का मुबारक महीना शुरू हुए कुछ दिन हो चुके हैं, और पूरे हिंदुस्तान में मुसलमान भाई-बहन रोज़ा रखकर इबादत में लगे हैं। लेकिन सवाल ये है कि सेहरी के वक़्त सुबह-सुबह और इफ़्तार के समय शाम को, शहरों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और दूसरे पब्लिक प्लेस पर सिस्टम कैसे चल रहा है? मुसलमान और गैर-मुसलमान मिलकर कैसे इस महीने को मनाते हैं? हमने पूरे मुल्क का जायज़ा लिया। आइए देखते हैं कैसे ये महीना एकता और मदद का पैगाम दे रहा है।
सबसे पहले बात राजस्थान के शहर कोटा में सेहरी के वक़्त सुबह तड़के गलियों में ड्रम बजाने वाले ज़ाहरीदार लोगों को जगाते हैं। ये पुरानी रिवायत है, जो कई शहरों में चलती है। कोटा के मुसलमान कम्युनिटी ग्रुप्स, जैसे लोकल मस्जिद कमिटी और यूथ वॉलंटियर्स, सेहरी के लिए फल, खाने के पैकेट्स बांटते हैं। हॉस्पिटल्स में काम करने वाले डॉक्टर्स और नर्सेस, जो नाइट शिफ्ट में होते हैं, अपने साथी स्टाफ से मदद लेकर सेहरी करते हैं। रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से सफर करने वाले मुसलमान पैसेंजर्स को लोकल यूथ ग्रुप्स सेहरी के पैकेट्स देते हैं, जैसे चावल, फल और पैक्ड फूड। ये काम सुबह ३ से ५ बजे तक चलता रहता है, ताकि कोई भूखा न रहे। गैर-मुसलमान पैसेंजर्स भी इस मदद को सराहते हैं और कहते हैं कि ये इंसानियत की बेहतरीन मिसाल है।
अब चलते हैं बड़े शहरों की तरफ। दिल्ली में रमज़ान फूड वॉक्स बहुत पॉपुलर हैं, जैसे ‘इफ़्तार से सेहरी तक’ वॉक। दिल्ली बाय फुट एडवेंचर्स ग्रुप ये ऑर्गनाइज़ करता है, जहां मुसलमान और गैर-मुसलमान मिलकर जामा मस्जिद के आसपास घूमते हैं, इफ़्तार करते हैं और सेहरी तक की कहानियां शेयर करते हैं। यहां नॉन-मुस्लिम्स भी हिस्सा लेते हैं, ताकि कल्चर को समझें। मुंबई में भी ऐसे ही वॉक्स चलते हैं, जहां मोहम्मद अली रोड पर इफ़्तार स्टॉल्स लगते हैं। रेलवे स्टेशनों पर, जैसे मुंबई सेंट्रल या दिल्ली जंक्शन, वॉलंटियर्स ग्रुप्स सेहरी पैकेट्स बांटते हैं। अस्पतालों में, जैसे दिल्ली के एम्स या मुंबई के जेजे हॉस्पिटल, मैनेजमेंट फ्लेक्सिबल टाइमिंग देता है। रोज़ा रखने वाले स्टाफ को ब्रेक टाइम में सेहरी या इफ़्तार करने की इजाज़त होती है, और गैर-मुस्लिम को-वर्कर्स मदद करते हैं, जैसे पानी या फल रखकर।
हैदराबाद और लखनऊ जैसे शहरों में रमज़ान की रौनक अलग है। हैदराबाद में चारमीनार के पास इफ़्तार बाजार लगते हैं, जहां हलीम और बिरयानी के स्टॉल्स पर मुसलमान और गैर-मुसलमान साथ बैठकर इफ़्तार करते हैं। लोकल ग्रुप्स, जैसे हेरिटेज लवर्स कम्युनिटी, ४-दिन के स्पेशल टूर्स चलाते हैं। रेलवे स्टेशनों पर यूथ वॉलंटियर्स सेहरी के लिए पैकेट्स डिस्ट्रीब्यूट करते हैं। लखनऊ में कम्युनिटी इफ़्तार पार्टीज़ होती हैं, जहां हिंदू, सिख और दूसरे धर्म के लोग शामिल होते हैं। अस्पतालों में पेशेंट्स के लिए स्पेशल इफ़्तार अरेंजमेंट्स होते हैं, जैसे फ्री फ्रूट्स और कुक्ड मील्स।
ट्रांसपोर्ट सिस्टम में भी रमज़ान का असर दिखता है। इंडियन रेलवेज़ में कई स्टेशनों पर, जैसे कोलकाता, चेन्नई या रांची, वॉलंटियर्स ग्रुप्स पैसेंजर्स को सेहरी और इफ़्तार हेल्प देते हैं। एयरपोर्ट्स और बस स्टैंड्स पर भी ऐसे अरेंजमेंट्स हैं। पब्लिक प्लेस जैसे पार्क्स और मार्केट्स में इफ़्तार टेंट्स लगते हैं, जहां गरीबों को फ्री खाना मिलता है। मस्जिदों में डोनेशन से सपोर्टेड ये प्रोग्राम्स चलते हैं, और गैर-मुसलमान भी डोनेट करते हैं।
पूरे मुल्क में रमज़ान टाइमिंग्स अलग-अलग हैं। जैसे दिल्ली में सेहरी सुबह ५:३३ सुबह और इफ़्तार ६:१८ शाम, मुंबई में सेहरी ५:५० सुबह और इफ़्तार ६:४२ शाम। लोग लोकल टाइमिंग्स फॉलो करते हैं। ये महीना सिर्फ रोज़ा नहीं, बल्कि एकता, मदद और कल्चर का जश्न है। मुसलमान और गैर-मुसलमान मिलकर इसे मनाते हैं, जो हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब को दिखाता है। ईद-अल-फितर मार्च में आएगी, तब तक ये रौनक जारी रहेगी।

