Anjuman-I-Islam के अध्यक्ष और शिक्षाविद डॉ. ज़हीर इशहाक काज़ी से विशेष बातचीत
(जावेद जमालुद्दीन)
महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि पूरे देश में यदि किसी मुस्लिम शैक्षणिक संस्था का नाम सम्मान और विश्वास के साथ लिया जाता है तो वह है Anjuman-I-Islam, फोर्ट, मुंबई। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा, व्यावसायिक पाठ्यक्रम, आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम और हज़ारों छात्रों का मार्गदर्शन—यह सब इस संस्था की पहचान है। पिछले एक दशक में हुई उल्लेखनीय प्रगति का श्रेय इसकी सक्रिय नेतृत्व टीम, विशेषकर अध्यक्ष डॉ. ज़हीर इशहाक काज़ी को जाता है।
रमज़ान के अवसर पर विस्तृत बातचीत में डॉ. काज़ी ने रमज़ान की व्यस्तताओं, संस्था की शैक्षिक सेवाओं, समुदाय की चुनौतियों और भविष्य की योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने कहा कि आम धारणा है कि रमज़ान में काम की गति कम हो जाती है, लेकिन उनका अनुभव इसके विपरीत है।
“रमज़ान में काम कम नहीं होता, बल्कि ऊर्जा बढ़ जाती है। खाने-पीने में लगने वाला समय बच जाता है, जिससे काम में व्यवस्थितता और बरकत महसूस होती है।
उन्होंने बताया कि संस्था ज़कात संग्रह पर विशेष ध्यान देती है, खासकर कोविड के बाद आर्थिक रूप से प्रभावित परिवारों की सहायता के लिए। ज़रूरतमंद छात्रों को फीस में रियायत और परिवारों को सम्मानजनक सहायता दी जाती है।
बचपन की यादों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि एक बुज़ुर्ग सहरी के समय नात पढ़ते हुए लोगों को जगाते थे। “हम उनका इंतज़ार करते थे। वे हमारी सहरी का अलार्म थे।” उन्होंने अफसोस जताया कि अब ऐसी परंपराएँ लगभग समाप्त हो चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि पिछले 25–30 वर्षों में मुस्लिम शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। गरीब तबके के बच्चों में आगे बढ़ने की तीव्र इच्छा होती है, बस उन्हें अवसर चाहिए।
भविष्य की योजनाओं में मेडिकल कॉलेज की स्थापना उनकी प्राथमिकता है। “हम चाहते हैं कि ऐसे डॉक्टर तैयार हों जो सेवा भावना से प्रेरित हों।”
उन्होंने “होलिस्टिक अप्रोच” पर ज़ोर देते हुए बताया कि शिक्षक छात्रों के घर जाकर उनके पारिवारिक हालात समझते हैं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर संस्था सहायता कर सके।
डॉ. काज़ी ने कहा कि क़ौम की तरक्की का एकमात्र रास्ता गुणवत्तापूर्ण और चरित्र-निर्माण करने वाली शिक्षा है। उन्होंने अभिभावकों को चेतावनी दी कि बेटियों की शिक्षा में प्रगति हुई है, लेकिन बेटों पर समान ध्यान देना आवश्यक है।
उनका संदेश स्पष्ट है:
“शिक्षा को पहली प्राथमिकता बनाइए। बच्चों की परवरिश पर ध्यान दीजिए। रमज़ान की रूह को पूरे साल ज़िंदा रखिए। याद रखिए, क़ौमों की तक़दीर स्कूलों और कॉलेजों में लिखी जाती है।
डॉ. ज़हीर काज़ी एक ऐसे नेता के रूप में सामने आते हैं जो परंपरा और आधुनिकता दोनों को साथ लेकर चल रहे हैं। उनकी रमज़ान की बातचीत हमें यह सिखाती है कि संकल्प और ईमानदारी के साथ शैक्षणिक संस्थाएँ क़ौम की तामीर का साधन बन सकती हैं।

