(रईस खान)
रमज़ान का मुकद्दस महीना इबादत, रोज़ा और रूहानी माहौल के साथ जारी है। लेकिन इस बार देश की कुछ यूनिवर्सिटीज़ में सेहरी और इफ्तार की सहूलियतों को लेकर बहस और विवाद सामने आए हैं। पंजाब से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक स्टूडेंट्स और मैनेजमेंट के बीच तनातनी की खबरें सुर्खियों में हैं।
सबसे ज़्यादा चर्चा लुधियाना की सीटी यूनिवर्सिटी में हुए मामले की रही। 24 फरवरी 2026 को कश्मीरी मुस्लिम स्टूडेंट्स ने मेस टाइमिंग में सेहरी और इफ्तार के लिए बदलाव की मांग की। स्टूडेंट्स का कहना था कि वे कैंटीन के लिए नियमित फीस भरते हैं, इसलिए रमज़ान में खास इंतज़ाम होना चाहिए।
आरोप है कि वाइस चांसलर ने सख्त लहजे में बात की और एडमिशन रद्द करने तक की धमकी दी। एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिससे मामला गरमा गया।
इस पर जम्मू एंड कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिशन ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से दखल देने की मांग की। पीडीपी लीडर इल्तिज़ा मुफ्ती ने भी सोशल मीडिया पर स्टूडेंट्स के समर्थन में पोस्ट किया।
प्रशासन और जिला अधिकारियों की मध्यस्थता के बाद मामला शांत हुआ और यूनिवर्सिटी ने संबंधित वाइस चांसलर को पद से हटा दिया। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी जांच की बात कही।
लखनऊ यूनिर्वासिटी में मुस्लिम स्टूडेंट्स ने कैंपस की लाल बारादरी मस्जिद बंद किए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया। प्रशासन ने मरम्मत और सुरक्षा कारण बताए, लेकिन स्टूडेंट्स ने इसे रमज़ान के दौरान धार्मिक गतिविधियों में रुकावट बताया।
मामला एफआईआर तक पहुंचा और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई कि क्या धार्मिक जरूरतों के लिए यूनिवर्सिटी को खास इंतज़ाम करने चाहिए।
दिल्ली के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में स्टूडेंट्स ने आरोप लगाया कि इफ्तार कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी गई, जबकि दूसरे धार्मिक त्योहार कैंपस में मनाए गए।
इसी तरह आई आई टी बांबे में पिछले साल सेहरी के इंतज़ाम को लेकर बहस हुई थी। प्रशासन ने इसे स्टूडेंट-लेवल पहल बताया, न कि आधिकारिक नीति। इस साल फिर से इन मुद्दों का जिक्र हो रहा है।
राजस्थान की जेलों में रमज़ान के दौरान इफ्तार-सेहरी सप्लाई को लेकर नई गाइडलाइन जारी हुई, जिसमें बाहर से सीधे खाना मंगाने पर रोक लगाई गई। हालांकि यह शैक्षणिक संस्थान का मामला नहीं है, लेकिन धार्मिक अधिकारों की बहस को और तेज़ कर गया। मुद्दा क्या है? पूरे देश में यह सवाल उठ रहा है कि क्या शैक्षणिक संस्थानों को धार्मिक जरूरतों के मुताबिक लचीलापन दिखाना चाहिए?
उलेमा और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि रमज़ान में सेहरी और इफ्तार की सहूलियत देना बेसिक जरूरत है, जो संविधान में दी गई धार्मिक आज़ादी के खिलाफ नहीं है। वहीं कुछ लोग इसे संस्थानों पर अतिरिक्त दबाव बताते हैं।
रमज़ान जैसे पवित्र महीने में ऐसे विवाद सामाजिक संवेदनशीलता की परीक्षा लेते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि संवाद और समझदारी से हल निकाला जा सकता है, ताकि पढ़ाई और इबादत साथ-साथ चल सके।
फिलहाल यह मुद्दा देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है और आने वाले दिनों में कई संस्थानों की नीतियों पर असर डाल सकता है।

