मिल्लत की फ़िक़्र में इक़बाल मेमन ऑफिसर की मसरूफ ज़िंदगी

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(जावेद जमालुद्दीन )

आल इंडिया मेमन जमात फेडरेशन के सदर इक़बाल मेमन ऑफिसर एक सरगर्म और जिम्मेदार समाजी रहनुमा के तौर पर जाने जाते हैं। यह तंजीम मुल्क और बाहर मुल्क की 507 मेमन जमातों की नुमाइंदगी करती है। वे तालीम, समाजी भलाई और इस्लाह-ए-मुआशरा के कामों में बरसों से लगे हुए हैं। रमज़ान के मौके पर हुई बातचीत में उन्होंने अपनी दिनचर्या, समाज के मसाइल और तालीम की अहमियत पर खुलकर बात की।

मेमन बिरादरी की पहचान

इक़बाल मेमन ऑफिसर बताते हैं कि मेमन बिरादरी पुरानी तिजारती कौम रही है। इसका ताल्लुक सिंध, कच्छ और गुजरात से माना जाता है। तिजारत, ईमानदारी और तंजीमी सोच इसकी पहचान है। तक़सीम-ए-हिंद के बाद बहुत से मेमन मुंबई, सूरत, राजकोट जैसे शहरों में आ बसे। वे कहते हैं कि हमारी बिरादरी ने कारोबार के साथ तालीम और खिदमत-ए-ख़ल्क़ को भी बराबर अहमियत दी। मुल्क भर में जमातों के तहत स्कूल, कॉलेज,स्कॉलरशिप, मैरिज हॉल और डिस्पेंसरी चल रही हैं। उनका कहना है, “हमारी असली ताकत इत्तेहाद और अनुशासन है। अगर हम संगठित रहें तो हर मैदान में कामयाब हो सकते हैं।

रमज़ान सुधार और अनुशासन का महीना

उनका दिन रमज़ान में सुबह साढ़े चार बजे सहरी से शुरू होता है। सहरी सादा होती है, दूध-खिचड़ी, दही-खिचड़ी या दूध में बनी सेवइयाँ। वे मुस्कराकर कहते हैं, “सादगी में ही बरकत है।”

सहरी के बाद तहज्जुद और फिर फ़ज्र की नमाज़ घरवालों के साथ अदा करते हैं। उनका पोता हाफ़िज़-ए-क़ुरआन है और घर में साल भर नमाज़ का माहौल रहता है। फ़ज्र के बाद क़ुरआन की तिलावत, इशराक की नमाज़ और आधा घंटा योग उनकी रोज़मर्रा की आदत है। वे कहते हैं, “क़ुरआन को समझकर पढ़ना चाहिए। यह सिर्फ सवाब के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी को बेहतर बनाने का पैग़ाम है।”

ज़कात में अमानत और पारदर्शिता

रमज़ान में उनकी बड़ी जिम्मेदारी ज़कात जमा करना और सही हक़दार तक पहुँचाना होती है। रोज़ कई दरख़्वास्तें आती हैं। वे खुद उनकी जांच करते हैं। स्कॉलरशिप, बेवाओं की मदद और बीमारों के इलाज के लिए मदद दी जाती है। उनका कहना है,“ज़कात अमानत है। इसे ईमानदारी से सही लोगों तक पहुँचाना हमारा फर्ज़ है।”

इफ़्तार और पानी की सेवा

दक्षिण मुंबई के बेग मोहम्मद पार्क में रोज़ लगभग एक हज़ार ख़वातीन के लिए इफ़्तार का इंतज़ाम किया जाता है। ठंडा फ़िल्टर किया हुआ पानी और इफ़्तार बॉक्स बाँटे जाते हैं। वे खुद इस काम में शरीक होते हैं।यह सेवा सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि हर जरूरतमंद इंसान के लिए है। आज़ाद मैदान में लगाए गए प्याऊ में भी सबके लिए पानी का इंतज़ाम है।

तालीम ही असली ताकत

वे बताते हैं कि 1992 के बाद मुस्लिम समाज में तालीम के प्रति जागरूकता बढ़ी है।आज नौजवान डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड अकाउंटेंट और दूसरे पेशों में आगे बढ़ रहे हैं। कई बच्चे कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और अमेरिका में भी पढ़ाई कर रहे हैं।खास तौर पर लड़कियों की तालीम पर वे ज़ोर देते हैं।“अगर बेटी पढ़ी-लिखी और हुनरमंद होगी तो पूरा घर और समाज मजबूत होगा।” मौजूदा हालात और उनका पैग़ाम वे समाज में बढ़ती नफ़रत पर चिंता जताते हैं। उनका कहना है कि ऐसे वक्त में सब्र, समझदारी और अच्छा अख़लाक़ जरूरी है।साफ-सफाई, सेहत और मोबाइल के सही इस्तेमाल पर भी वे जोर देते हैं।

आख़िर में उनका साफ संदेश है, “हमारी ताकत मोहब्बत, बर्दाश्त और अच्छे चरित्र में है। तालीम हासिल करें, सेहत का ध्यान रखें और नई नस्ल को काबिल और नेक बनाएं।

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