केरल मुस्लिम सियासत–क्या यह पैटर्न मुस्लिम वोटरों और उम्मीदवारों के लिए बेहतर है !

Date:

(रईस खान)

केरल में इस बार मुस्लिम वोटरों और उम्मीदवारों ने शानदार कामयाबी हासिल की। भारतीय यूनियन मुस्लिम लीग ने सत्ताईस सीटों में से बाईस सीटें जीतीं जो पंद्रह साल का सबसे अच्छा नतीजा है। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की बड़ी जीत में मुस्लिम वोटों ने अहम भूमिका निभाई खासकर मलप्पुरम और वायनाड जैसे इलाकों में जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है। मुस्लिम लीग की सफलता दर पचासी प्रतिशत से ऊपर रही। पहली बार मुस्लिम लीग की महिला उम्मीदवार फातिमा ताहिलिया ने पेराम्ब्रा से जीत दर्ज की। कुल मिलाकर मुस्लिम वोटरों ने मजबूत एकजुटता दिखाई जिससे वामपंथी मोर्चे को हार मिली। केरल विधानसभा में कुल पैंतीस मुस्लिम विधायक चुने गए।

असम में मुस्लिम वोटरों का प्रदर्शन कांग्रेस के लिए खास रहा लेकिन ध्रुवीकरण भी साफ नजर आया। कांग्रेस ने उन्नीस सीटें जीतीं जिनमें अठारह मुस्लिम विधायक हैं। पार्टी ने बीस मुस्लिम उम्मीदवार उतारे जिनमें से अठारह जीते जबकि गैर मुस्लिम उम्मीदवारों में सिर्फ एक कामयाब हुआ। अखिल भारतीय यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का प्रदर्शन कमजोर रहा सिर्फ दो सीटें मिलीं। नई विधानसभा में कुल बाईस मुस्लिम विधायक होंगे वह भी ज्यादातर कांग्रेस से। मुस्लिम वोटरों ने कांग्रेस को मजबूत समर्थन दिया लेकिन हिंदू वोटरों से अलगाव की तस्वीर भी उभरी। भाजपा गठबंधन ने फिर सरकार बनाने और मजबूत स्थिति बनाए रखी।

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटरों के वोट बंट गए जिससे तृणमूल कांग्रेस को नुकसान हुआ और भाजपा को फायदा मिला। मुस्लिम वोट पहले तृणमूल के साथ मजबूत था लेकिन इस बार वोट बंटने से खासकर मुरशिदाबाद, मालदा जैसे इलाकों में तृणमूल कमजोर हुई। भाजपा ने मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी सीटें बढ़ाईं। वोटर सूची संशोधन में भी हजारों नाम कटने का मुद्दा रहा जो ज्यादातर मुस्लिम इलाकों में था। तृणमूल ने सैंतालीस मुस्लिम उम्मीदवार दिए लेकिन मुस्लिम बेल्ट में कमजोर प्रदर्शन रहा। कांग्रेस के दोनों विजेता मुस्लिम थे।

तमिलनाडु में मुस्लिम आबादी छह प्रतिशत के आसपास है इसलिए प्रतिनिधित्व कम रहा। विधानसभा में कुल नौ मुस्लिम विधायक चुने गए जो पिछले चुनाव से थोड़ा ज्यादा है। तमिलागा वेट्री कनगम ने तीन डीएमके ने दो तीन कांग्रेस ने एक जीता। मुख्य द्रविड़ पार्टियों ने खुद कम मुस्लिम उम्मीदवार दिए और सहयोगी दलों ने कुछ सपोर्ट किया। मुस्लिम वोटर द्रविड़ पार्टियों और टीवीके के बीच बंटे लेकिन कुल मिलाकर अल्पसंख्यक वोट स्थानीय मुद्दों पर रहा।

इस तरह से देखा जाए तो केरल में मुस्लिम वोटरों और मुस्लिम लीग का मजबूत एकजुट प्रदर्शन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की जीत का बड़ा कारण बना। असम में कांग्रेस मुस्लिम केंद्रित हो गई और ध्रुवीकरण दिखा। बंगाल में वोट बंटने से तृणमूल को नुकसान और भाजपा को लाभ हुआ। तमिलनाडु में कम आबादी के बावजूद थोड़ी बढ़ोतरी हुई लेकिन द्रविड़ पार्टियों में प्रतिनिधित्व घटने का सिलसिला जारी रहा। मुस्लिम वोटर अक्सर रणनीतिक वोटिंग करते हैं कभी विरोधी को हराने के लिए कभी स्थानीय जीतने वाले को चुनकर कभी विकास के मुद्दे पर। इन चुनावों ने दिखाया कि ब्लॉक वोटिंग हर जगह काम नहीं करती वोट बंटना भी खेल बदल सकता है। ये रुझान भविष्य की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_img

पॉपुलर

और देखे
और देखे

मटियामऊ कांड – एक मासूम की मौत और हमारी सोच

 (रईस खान) हरदोई के मल्लावां इलाके के मटियामऊ गांव...

स्टेट्समैन अवॉर्ड्स: खिल उठे अवार्ड पाकर ख़ुशी से चेहरे

विभिन्न क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों को...

युवाओं का पॉलिटिक्स में आना वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है:सहर शेख़

मुंबई(शिब्ली रामपुरी) मुंब्रा से एमआईएम की पार्षद सहर शेख...

पूर्व गृह मंत्री व विकास पुरुष स्वर्गीय पंडित गोपीनाथ दीक्षित की प्रतिमा लगाने की उठी मांग

 (फजलुर्रहमान) ​बांगरमऊ, उन्नाव.उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व गृह मंत्री और...