एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स यानी एपीसीआर ने छह मई 2026 को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में अपनी नई वेबसाइट apcrhct .org लॉन्च की। यह वेबसाइट भारत में धर्म के आधार पर होने वाले नफरती अपराधों और नफरती भाषणों को ट्रैक करने के लिए बनाई गई है। कार्यक्रम में कानूनी विशेषज्ञों, एक्टिविस्टों और विपक्षी नेताओं ने हिस्सा लिया। माहौल गंभीर रहा और नफरत को रोकने की मांग जोर-शोर से की गई।
कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्य के तहत लोगों को आसानी से ऑनलाइन फॉर्म भरकर नफरती अपराधों की रिपोर्ट करने की सुविधा दी गई है। एपीसीआर संयुक्त राष्ट्र के राबात प्लान ऑफ एक्शन का इस्तेमाल करेगी। यह प्लान गैरकानूनी नफरती भाषण और आजादी के अधिकार में फर्क साफ करता है और इसमें छह सूत्रीय टेस्ट का इस्तेमाल होता है।
लॉन्च के दौरान एपीसीआर ने आंकड़े भी पेश किए। दो हजार चौदह से अब तक तीन हज़ार पांच सौ सतहत्तर से ज्यादा धर्म आधारित नफरती घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें शारीरिक हमले, संपत्ति पर हमले और दूसरे किस्म के मामले शामिल हैं। हाल के सालों में एक हज़ार एक सौ तिरेपन नफरती अपराध और सात सौ इकसठ नफरती भाषण रिकॉर्ड किए गए।
ज्यादातर मामले मुसलमानों के खिलाफ बताए गए। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में इनकी संख्या सबसे ज्यादा है। वेबसाइट पर रियल टाइम डेटा, राज्यवार जानकारी और एफआईआर की स्थिति भी देखी जा सकेगी। आम लोग खुद घटनाएं रिपोर्ट कर सकेंगे।
मीटिंग में विपक्षी नेताओं ने कहा कि नफरत अब राजनीति का हिस्सा बन चुकी है। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि संसद में सरकार नफरती अपराधों को दंगे बता देती है जबकि असल संख्या बहुत ज्यादा है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के भाषणों से नफरती अपराध बढ़ते हैं। उन्होंने कपड़ों से पहचान करने वाली बात का भी जिक्र किया।
राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने कहा कि चुनाव जीतने के चक्कर में देश को खो रहे हैं। उन्होंने मजाक में कहा कि आपकी इस हेट ट्रैकर वेबसाइट की क्षमता बढ़ानी पड़ेगी।
समापन में यह संदेश दिया गया कि डेटा इकट्ठा करना, रिपोर्ट करना और कानूनी व सार्वजनिक दबाव बनाना बहुत जरूरी है। बिना दस्तावेजीकरण के न्याय मिलना मुश्किल है। एपीसीआर ने अपील की कि लोग घटनाओं की रिपोर्ट करें। एपीसीआर के फवाज शाहीन ने पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दिया।
यह कार्यक्रम शांतिपूर्ण, जानकारी से भरा और एक्शन उन्मुख रहा। विपक्षी नेताओं के तेज बोलने से चर्चा गरमाई जरूर लेकिन फोकस नफरती अपराध रोकने पर ही रहा।
अंततः एपीसीआर का यह कदम नफरत के खिलाफ बड़ा हथियार साबित हो सकता है। अब देखना है कि सरकार और समाज इस डेटा को कैसे लेते हैं। अगर नफरत जारी रही तो वेबसाइट की क्षमता सचमुच बढ़ानी पड़ेगी।
– क़ौमी फरमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

