छोटे व्यापारियों और गरीबों को सूद के चंगुल से आजादी दिलाने का नया रास्ता दिखाया गया। इस कार्यक्रम में आसरा कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी के वाइस चेयरमैन सैय्यद ज़ाहिद अहमद ने “आसरा मॉडल” को विस्तार से समझाया।
अलहिरा इंग्लिश पब्लिक स्कूल, मालाड में आयोजित इस कार्यक्रम में शिब्ली रामपुरी, मौलाना शोएब कोटी, मुफ़्ती इनामुल्लाह खान, मौलाना असर और मौलाना ज़ैनुल आबदीन नदवी आदि शामिल हुए।
सैय्यद ज़ाहिद अहमद ने कहा कि आज देश के करोड़ों छोटे उद्यमी सूद के भारी बोझ और बाजार की तंगी से जूझ रहे हैं। पारंपरिक माइक्रोफाइनेंस उन्हें कर्ज़ देता है, लेकिन असली विकास नहीं लाता। आसरा मॉडल इस समस्या का समाधान है। इसमें पहले बिज़नेस को मजबूत बनाया जाता है, फिर बिना सूद के साझेदारी के आधार पर मदद की जाती है।
उन्होंने बताया कि आसरा का “फाइनेंशियल पंचतंत्र” पाँच मजबूत स्तंभों पर टिका है कानूनी दस्तावेज़ बनाना, डिजिटल हिसाब-किताब, पूरा बीमा कवर, बाज़ार से जोड़ना और अंत में नैतिक वित्तीय सहायता। इन चार तैयारियों के बाद ही पैसा लगाया जाता है, जिससे नुकसान का खतरा लगभग खत्म हो जाता है।
यह मॉडल प्राचीन वैदिक, इस्लामी और अन्य धार्मिक परंपराओं के नैतिक मूल्यों पर आधारित है, जो सूद को गलत मानते हैं। सैय्यद ज़ाहिद ने जोर देकर कहा कि आसरा कोई खास धर्म का मॉडल नहीं, बल्कि सार्वभौमिक नैतिक अर्थव्यवस्था का नमूना है।
इस मॉडल से छोटे उद्यमी कर्ज़ के चक्र से निकलकर स्थिर और सम्मानजनक कमाई कर सकेंगे। सरकार को टैक्स बढ़ने और सब्सिडी का बोझ कम होने का फायदा होगा, जबकि बीमा कंपनियाँ, बड़े निवेशक और सप्लायर भी इससे जुड़ सकेंगे।
कार्यक्रम में मौजूद उलेमा और लोगों ने इस मॉडल को आम आदमी के लिए बड़ी राहत बताया। उन्होंने उम्मीद जताई कि आसरा मॉडल पूरे देश में फैलेगा और 2030 तक सच्चा समावेशी विकास लाएगा।यह चर्चा सूद-मुक्त, नैतिक और टिकाऊ अर्थव्यवस्था की दिशा में एक अहम कदम साबित हुई।
क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

