फिल्म जगत  “मैं वापस आऊंगा”, कुछ सवालों के साथ ‘क्या कमाल है’ 

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मैं वापस आऊंगा” फिल्म सिनेमा घरों में लगते ही इसका रिव्यू पढ़कर पता चल रहा था कि फिल्म बहुत अच्छी होगी। लेकिन मौजूदा सरकार ऐसी है कि हर अच्छी फिल्म के आने पर हर बार मन में ये सवाल उठता है कि ऐसे विषय वाली इतनी संवेदनशील फिल्म को इस सरकार ने रिलीज़ कैसे होने दिया, और हो भी गई तो संघी गिरोह इतना शांत कैसे बैठा है? इसका थोड़ा जवाब मनीष आज़ाद के रिव्यू को पढ़ कर मिला, बाकी फिल्म को देखने के बाद समझ में आया। जो साझा करना चाहती हूं।

फिल्म वाकई बहुत अच्छी है और उसकी तारीफ़ में लोगों ने जो लिखा है, उससे मैं सहमत हूं। ये बातें मैं इसलिए लिख रही हूं कि फिल्म को देखने के बाद फिल्म की अच्छाई में बहकर इस हिन्दुत्ववादी सांप्रदायिक सरकार के प्रति यह सकारात्मक भावना न बनाने पाए कि देखो यह सरकार इतनी लिबरल तो है, कि यह फिल्म रिलीज़ हुई । ये भी हो सकता है कि इम्तियाज़ अली ने सेंसर से बचने के लिए जानबूझ कर ऐसा किया हो, ताकि फिल्म सिनेमा हॉल तक पहुंच सके। जो भी हो फिल्म में हिंदुत्ववादियों के पक्ष में ये बातें हैं –

1- फिल्म की कहानी सिक्ख परिवार पर केंद्रित है, जिसे मुसलमानों के कारण पाकिस्तान की तरफ से भाग कर भारत आना पड़ा।

2- यह सिक्ख परिवार क्योंकि बॉर्डर के उस पार का, यानि पाकिस्तान का है इसलिए मुसलमानों की क्रूरता को अधिक दिखाया जा सकता था।

3- क्योंकि फिल्म एक सिक्ख परिवार पर केंद्रित है इसलिए इस परिवार की औरतों के साथ ही वो सब कुछ होना दिखाया गया, जो इस त्रासद बंटवारे में वास्तव में दोनों तरफ की औरतों के साथ हुआ था।

इस परिवार की बुजुर्ग सरदारनी द्वारा अपने घर की सभी बच्चियों का गला रेतने का दृश्य (ताकि वो उन्हें मुस्लिम दंगाइयों से बचा सके) हिला देता है।

हमारी पीढ़ी, जिसे बंटवारे से ज़्यादा 2002 में गुजरात का हत्याकांड अधिक याद है, यह दृश्य उसी की याद दिलाता है, जिसमें हिंदुओं ने मुसलमान औरतों के साथ क्रूरता की थी। यहां तक कि फिल्म के एक सीन में यह भी दिखा दिया गया कि मुस्लिम दंगाई एक गर्भवती महिला का पेट चीर रहे हैं, जो कि गुजरात के हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक हमले की शिकार कौसर बी की याद दिलाती है। यह समानता जाने-अनजाने यह स्थापित करती है कि अतीत में मुसलमान भी सिक्ख औरतों के साथ ऐसा कर चुके हैं।

4- एक साल पहले जब सांप्रदायिक सौहार्द पर बनी एक और शानदार फिल्म “इन गलियों में” आई थी तो उसे देखने के बाद यह सवाल मन में उठा था कि फिल्म में अगर पुरुष पात्र मुसलमान और महिला पात्र हिन्दू होती, तब क्या इस फिल्म को सेंसर की मंजूरी मिलती? क्योंकि तब तो यह “उनके” अनुसार “लव जिहाद” होती। “मैं वापस आऊंगा” में भी यही सवाल मन में आया, कि अगर कहानी में पुरुष पात्र मुस्लिम होता और महिला हिन्दू और दोनों के देश भी अदल-बदल दिए जाते, तो क्या फिल्म सेंसर बोर्ड की चौखट लाँघ पाती?

जैसा कि पहले कहा गया है कि हो सकता है फिल्म की कहानी में यह सब जानबूझ कर रखा गया हो, क्योंकि इम्तियाज़ अली की मंशा पर शक नहीं किया जा सकता। वे भरसक इसे बैलेंस करने की कोशिश करते दिखते हैं, जैसे पाकिस्तान की तरफ के ही मुसलमान परिवार द्वारा इस सिक्ख परिवार की औरतों को बचाने की कोशिश और भारत से पाकिस्तान की ओर आती ट्रेन में नकाबपोश सिक्खों द्वारा किया गया कत्लेआम का दृश्य भी बेहद भयानक है, जिसमें मुसलमान मर्दो और औरतों को बकरे की तरह कसाई के लट्ठे पर गर्दन रखकर काटा जा रहा है। लेकिन इस दृश्य में क्योंकि कहानी का केंद्रीय पात्र सिक्ख युवक कीनू, जिससे दर्शकों की सहानुभूति है, बच जाता है, इसलिए यह दृश्य उतनी बेचैनी पैदा नहीं करता, और इसलिए भी कि यह दृश्य फिल्म में मुसलमानों द्वारा की गई क्रूरता के बाद आता है।

कुल मिलाकर यह फिल्म क्रूर बंटवारे की कहानी का एक भारतीय वर्ज़न है।

इसे देखने के बाद मैं सोच रही थी कि अगर इस फिल्म को पाकिस्तान का डायरेक्टर बनाता तो कैसे प्रस्तुत करता इस कहानी को। और आज ही पढ़ा कि पाकिस्तान के फिल्म निर्माता उमर नासिर अली ने “मैं वापस आऊंगा” की तारीफ करते हुए इम्तियाज़ अली और उनकी पूरी टीम को बधाई दी है। साथ ही उन्होंने कहा है कि वे भी बंटवारे पर एक ऐसी ही फिल्म बना रहे हैं। यह उत्साहवर्धक है। इसी थीम पर पाकिस्तान की तरफ से बनाई गई यह फिल्म देखना रोचक होगा कि वे इस कहानी को कैसे बयां करते हैं। फिर दोनों को मिलाकर ही इस कहानी का मुकम्मल वर्ज़न सामने आएगा।

इससे अलग एक और बात फिल्म को देखने के बाद दिमाग में आई जो बंटवारे की त्रासदी और भारत पाकिस्तान के अपने अपने वर्ज़न से अलग है।

फिल्म का नायक कीनू दोबारा जब पाकिस्तान जाता है तो उसे पता चलता कि उसकी महबूबा की शादी हो गई है, यह भी पता चलता है कि यह शादी इस विभीषिका की मजबूरी में की गई शादी है और उसे यह भी पता चलता है कि उसकी प्रेमिका जिया उसका इंतज़ार कर रही है, और यहां तक कि उसने अपने पति से भी उसके बारे में बताकर कहा है कि वो वापस आएगा। ये बात जिया के पति ने ही कीनू को बताई, जब वह उसे जिया से मिलवाने के लिए घर बुलाता है। लेकिन जब वो जिया के घर में बैठा है और वो उससे मिलने आ ही रही होती है, कीनू उसके घर से बिना उससे मिले वापस निकल जाता है। साथ ही यहीं वह अपने छोटे भाई से कहता है ‘अब पीछे मुड़कर कभी नहीं देखना है।’

धर्म, देश, बंटवारे की त्रासदी का भुक्तभोगी होने के बावजूद यह इस पुरुष पात्र का पितृसत्तात्मक अहम था, जिसके अनुसार शादी के बाद अब वह “उसकी” नहीं रही, किसी और की ‘संपत्ति’ हो चुकी है, जिससे मिलने का भी कोई फायदा नहीं। जबकि यही नायक शादी से पहले नायिका की बेचैनी दूर करने के लिए रात में उसके घर में घुस जाता है, लेकिन शादी के बाद इतना नज़दीक होकर भी उसे बेचैन छोड़कर, बिना मिले वापस आ जाता है। क्या होता अगर ये नायक इस पितृसत्तात्मक सोच से मुक्त होता? दोनों की मुलाकात होती, जिया क्योंकि काफी बोल्ड है, इसलिए हो सकता है दोनों अब से साथ रहने का फैसला कर लेते, फिर कहानी ही कुछ अलग होती। “कीनू आयेगा” यह कहते-कहते जिया मर जाती है। बुढ़ापे में जब कीनू सभी सीखी हुई सामाजिक रूढ़ियों से, जिसमें पितृसत्ता भी शामिल है, से ऊपर उठ जाता है, तब उसमें अपने उस प्यार से मिलने की इच्छा उभरती है। यह बात यह भी समझाती है कि पितृसत्ता, धार्मिक, जातीय और किसी भी तरह के अलगाव से मुक्ति इंसान को कितना हल्का कर देती है। लगभग 10 साल की उम्र से इंसान इसका बोझा लगभग जीवन भर ढोता रहता है। वास्तव में ये प्रेम कहानी सिर्फ बंटवारे की नहीं, अनकहे ही, बिना इरादे से ही, लेकिन पितृसत्ता की त्रासदी की कहानी भी कहती है।

इन बातों को ध्यान में रखकर “मैं वापस आऊँगा” ज़रूर देखी जाने वाली फिल्म है, या फिल्म देखने के बाद इन बातों पर ज़रूर सोचा जाना चाहिए़।

फिल्म में इस सिक्ख परिवार की आखिरी पीढ़ी नीवी का किरदार भी जिसे दिलजीत दोसांझ ने अदा किया है, महत्वपूर्ण है और उसे अच्छे से गढ़ा गया है, वह नौजवान “कॉकरोच” पीढ़ी का है जो परेशान है और उसे लगता है कि सबकुछ ठीक नहीं है, लेकिन उसे पता नहीं है कि करना क्या है। पहले वह बेकार के कंटेंट पर कॉमेडी करता है, अपने दादा जी की बीमारी की बातों को समझने के दौरान वह दुनिया को नई नज़र से देखता है और राजनीतिक कंटेंट वाली कॉमेडी करता है, जिसे लोग पसंद भी करते हैं। हां, यह कंटेंट आज के समय का नहीं 1947 का है, जिसमें मज़ाक अंग्रेजो का ही उड़ाया गया है। यह भी शायद फिल्म को विवादों से बचाने के लिए है।

फिल्म का आखिरी गाना और उसका फिल्मांकन लाजवाब है,जिसकी तारीफ करना बहुत ज़रूरी है। इसमें वे गाजा सहित दुनिया भर के रिफ्यूजियों के दर्द को सामने रखते लाते हैं, (शायद इसमें रोहिंग्या शरणार्थियों के कैंप भी हों, मैं अलग से पहचान नहीं सकी।) सच कहें तो इस गाने और इसके फिल्मांकन के कारण ही मुझे इम्तियाज अली पर यह भरोसा बना कि उन्होंने फिल्म में एकतरफा बातें नहीं कही हैं, जो है वो सेंसर का रास्ता पार करने के लिए है। इस गाने ने दुनिया भर के रिफ्यूजी कैंप दिखाकर जो सवाल किया है, “सब यहां खुशहाल है, न कोई दुख, न सवाल है! क्या कमाल है!” वह बेहद स्तब्ध और बेचैन करता है और यह बेचैनी दिल दिमाग पर छा जाने वाली है। सचमुच जिस दुनिया के कई हिस्सों में लोग इतनी यातनाओं में हों, उसी दुनिया में लोग इससे निरपेक्ष कैसे रह सकते हैं। वे आराम के कैसे जी सकते हैं और आराम से कैसे मर सकते हैं क्या कमाल है? एक प्रेम कहानी जो ऐसे ढेरों सवाल उठती है – मैं वापस आऊँगा।

सीमा आजाद

– फेसबुक पेज से साभार

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