कुछ लोग अपनी ज़िंदगी जीते हैं, और कुछ लोग अपनी ज़िंदगी से पूरी नस्लों को जीने का हौसला दे जाते हैं। ओमान की बेटी नादिरा अल हार्दी ऐसी ही एक शख्सियत थीं। उनका सफ़र सिर्फ़ पहाड़ों पर चढ़ने का नहीं था, बल्कि डर, मायूसी और नामुमकिन समझी जाने वाली दीवारों को पार करने का सफ़र था।
30 जुलाई 2026 को काराकोरम की ख़तरनाक ब्रॉड पीक पर चढ़ाई के दौरान नादिरा ने अपनी आख़िरी सांस ली। वह दुनिया से चली गईं, लेकिन अपने पीछे ऐसा पैग़ाम छोड़ गईं जिसे आने वाली पीढ़ियाँ कभी नहीं भूलेंगी।
एक साधारण लड़की, लेकिन असाधारण सपना
नवंबर 1978 में ओमान के एक साधारण अरब परिवार में जन्मी नादिरा को बचपन से ही भूगोल और पहाड़ों से मोहब्बत थी। जब दूसरे बच्चे खिलौनों से खेलते थे, तब वह नक्शों, चट्टानों और पहाड़ों की दुनिया में खो जाती थीं।
उन्होंने भूगोल में मास्टर्स किया, चार साल तक बच्चों को पढ़ाया और फिर ओमान की सिविल सर्विस में शामिल होकर स्काउट-गाइड संस्था की डायरेक्टर बन गईं। ज़िंदगी आराम से गुज़र सकती थी, लेकिन उनके दिल में एक और सपना पल रहा था।
नाकामी से नहीं टूटीं
2015 में किलिमंजारो पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हो सकीं। बहुत से लोग यहीं हार मान लेते हैं, मगर नादिरा ने हार को मंज़िल नहीं, बल्कि अगली तैयारी का पहला कदम बनाया।
फिर उनकी मुलाक़ात ओमान के मशहूर पर्वतारोही खालिद अल सियाबी से हुई। नादिरा ने उनसे सिर्फ़ एक सवाल किया,

“क्या मैं एवरेस्ट पर चढ़ सकती हूँ?”
खालिद ने मुस्कुराकर सिर्फ़ इतना कहा,
“हाँ… बिल्कुल चढ़ सकती हो।”
यही एक जुमला उनकी ज़िंदगी बदल गया।
उस्ताद चला गया, लेकिन हौसला नहीं टूटा
खालिद उनके कोच बने। दो साल तक उन्होंने कड़ी मेहनत की। कई बार चोट लगी, कई अभियान नाकाम रहे, मगर इरादा कमज़ोर नहीं पड़ा।
2019 में नादिरा एवरेस्ट बेस कैंप पहुँचीं। तभी उन्हें सबसे बड़ा सदमा मिला। उनके गुरु खालिद अल सियाबी का दिल का दौरा पड़ने से इंतिकाल हो गया।
सोचिए… जिस इंसान ने आपको सपना देखना सिखाया हो, वह मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही दुनिया छोड़ दे।
लेकिन नादिरा ने आँसू पोंछे और सफ़र जारी रखा।
जब एवरेस्ट ने एक बेटी का इस्तक़बाल किया
23 मई 2019 को नादिरा अल हार्दी ने दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट पर कदम रखा। वह ऐसा करने वाली ओमान की पहली महिला बनीं।
उनकी जेब में एक छोटा-सा कागज़ था, जिस पर सिर्फ़ एक नाम लिखा था, खालिद अल सियाबी।
उन्होंने वह कागज़ एवरेस्ट की चोटी पर छोड़ दिया।
यह सिर्फ़ कागज़ नहीं था, बल्कि अपने उस्ताद को पेश की गई सबसे ख़ूबसूरत श्रद्धांजलि थी।
हिजाब कभी रुकावट नहीं बना
नादिरा ने इसके बाद भी सफ़र नहीं रोका। 2021 में आमा डबलम, 2022 में के-2 और 2024 में नंगा पर्वत फतह किया। वह दुनिया को बताती रहीं कि किसी इंसान की पहचान उसके कपड़ों या लिंग से नहीं, बल्कि उसके इरादों से होती है।
उनका मशहूर जुमला आज भी लाखों लोगों को हिम्मत देता है,
> “मेरा हिजाब कभी मेरे रास्ते की रुकावट नहीं बना। असली रुकावट हमारे भीतर का डर और शक होता है। जब इंसान अपने डर पर जीत हासिल कर लेता है, तब कोई मंज़िल दूर नहीं रहती।”
आख़िरी सफ़र… लेकिन आख़िरी कहानी नहीं
ब्रॉड पीक पर चढ़ाई के दौरान 30 जुलाई 2026 को नादिरा हमेशा के लिए ख़ामोश हो गईं। मगर सच यह है कि पर्वतारोहियों की मौत पहाड़ों पर नहीं होती। वे उन चोटियों में हमेशा के लिए बस जाते हैं, जिन्हें उन्होंने अपने क़दमों से छुआ होता है।
आज ओमान की लाखों बेटियाँ नादिरा में अपना अक्स देखती हैं। उन्होंने साबित किया कि सपनों की कोई सरहद नहीं होती। न मुल्क, न ज़ुबान, न मर्द-औरत का फ़र्क, न हिजाब और न हालात, अगर इरादा बुलंद हो तो आसमान भी छोटा पड़ जाता है।
क़ौमी फ़रमान की बात
नादिरा अल हार्दी की कहानी सिर्फ़ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं, बल्कि उम्मीद, मेहनत और यक़ीन की कहानी है। उन्होंने हमें सिखाया कि कामयाबी का रास्ता आसान नहीं होता, लेकिन जो लोग गिरकर भी उठते रहते हैं, वही इतिहास लिखते हैं।
हो सकता है आने वाले दिनों में कोई पर्वतारोही दुनिया की किसी नई चोटी पर पहुँचकर वहाँ “नादिरा अल हार्दी” का नाम लिख दे। लेकिन सच तो यह है कि नादिरा का नाम पहले ही इंसानों के दिलों की सबसे ऊँची चोटी पर लिखा जा चुका है।
नादिरा अल हार्दी चली गईं, लेकिन उनका पैग़ाम हमेशा ज़िंदा रहेगा,
“ख़्वाब देखो… मेहनत करो… और दुनिया को बता दो कि नामुमकिन भी मुमकिन हो सकता है।”
सलाम नादिरा! आपकी उड़ान कभी ख़त्म नहीं होगी।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

