21 जून जन्मदिन पर विशेष _ कलम से किसानों और गरीबों का दर्द बयां करने वाले वरिष्ठ कवि धर्मेंद्र कटियार

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(फजलुर्रहमान)

बांगरमऊ, उन्नाव की साहित्यिक उर्वरा भूमि जनपद उन्नाव ने देश को एक से बढ़कर एक साहित्यकार, कवि और लेखक दिए हैं। इसी गौरवमयी परंपरा की एक मजबूत कड़ी रहे हैं वरिष्ठ कवि व साहित्यकार धर्मेंद्र कटियार जी। 21 जून को उनके जन्मदिवस के इस विशेष अवसर पर, आइए हम उनके प्रेरक जीवन-सफर, उनकी प्रशासनिक सेवाओं और उनकी संवेदनशील साहित्यिक यात्रा पर एक नजर डालते हैं।

​धर्मेंद्र कटियार जी का जन्म 21 जून 1950 को जनपद उन्नाव की तहसील बांगरमऊ के अंतर्गत आने वाले ग्राम नसिरापुर में हुआ था। ग्रामीण परिवेश और खेतों की सोंधी महक के बीच उनका बचपन बीता। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन का यथार्थ और सादगी रची-बसी नजर आती है।

​उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला से ही शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने बांगरमऊ के सुप्रसिद्ध सुभाष इंटर कॉलेज से माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। अपनी आगे की पढ़ाई के लिए वह जिला मुख्यालय उन्नाव आए और यहाँ से अपनी उच्च शिक्षा की नींव रखी। ​

धर्मेंद्र जी का झुकाव विज्ञान और कृषि की ओर भी रहा। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित पंतनगर विश्वविद्यालय से बीएससी और एमएससी की उच्च डिग्रियां हासिल कीं।​ अपनी योग्यता के बल पर वे उत्तर प्रदेश बीज एवं तराई विकास निगम में महाप्रबंधक के उच्च पद पर कार्यरत रहे। इस पद पर रहते हुए उन्होंने कृषि विकास और किसानों की बुनियादी समस्याओं को बेहद करीब से देखा और महसूस किया। धर्मेंद्र कटियार जी केवल एक कुशल प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं रहे, बल्कि उनके भीतर का संवेदनशील कवि हमेशा जागृत रहा।

उन्होंने अपनी सरकारी व्यस्तताओं के बीच भी कलम की धार को कभी कुंद नहीं होने दिया। देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी तमाम रचनाएं समय-समय पर प्रकाशित होकर पाठकों को उद्वेलित करती रही हैं।

​ ​धर्मेंद्र कटियार जी ने ग़ज़ल विधा में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। उनके द्वारा रचित प्रमुख ग़ज़ल संग्रह निम्नलिखित हैं जैसे
​”शहर के वास्ते” इस संग्रह में शहरी जीवन की विसंगतियों, अकेलेपन और मानवीय मूल्यों के क्षरण को बहुत ही बारीकी से उकेरा गया है। “मुल्क का मौसम”, समसामयिक राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर तीखा कटाक्ष करते हुए उन्होंने देश के मौजूदा हालातों को अपनी ग़ज़लों के माध्यम से सामने रखा है। “चेहरा रोशनी का” यह संग्रह आशावाद, मानवीय प्रेम और संघर्षों के बीच भी उम्मीद का दीया जलाए रखने का संदेश देता है।

“जिसकी रगों में देश के अन्नदाता का दर्द बहता हो, उसकी कलम कभी खामोश नहीं रह सकती।”

​धर्मेंद्र कटियार जी के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कभी भी महलों या काल्पनिक सौंदर्य के गीत नहीं लिखे। उनकी कविताएं और ग़ज़लें जमीन से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने देश के किसानों और गरीबों के दर्द को अपनी रचनाओं में पिरोने का अप्रतिम कार्य किया है। मौसम की मार, कर्ज का बोझ और मंडियों में होने वाले शोषण के दर्द को उन्होंने बेहद सजीवता से अपनी पंक्तियों में ढाला है। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की रोजमर्रा की जद्दोजहद, रोटी की चिंता और बुनियादी अधिकारों से महरूम रहने की पीड़ा उनकी कविताओं में साफ दिखाई देती है। ​उनकी भाषा अत्यंत सरल, सहज और आम जनमानस के करीब है, जिससे पाठक सीधे जुड़ाव महसूस करता है। धर्मेंद्र कटियार जी 4 दिसंबर 2024 को हम सभी लोगों का साथ छोड़कर देवलोक सिधार गए। उनका जाना हिंदी साहित्य जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। किंतु उनकी रचनाएं उन्हें चिरस्मरणीय बनाए रखेंगी।

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