(मार्कण्डेय काटजू)
बर्रे-सगीर के करोड़ों शिया घरानों में एक छोटा-सा इमामबाड़ा मौजूद होता है—एक मुक़द्दस जगह, जहाँ मजलिस, नौहा, मर्सिया और मातम के ज़रिये कर्बला की याद को ज़िन्दा रखा जाता है। मुहर्रम के पहले दस दिनों में ये सादा घरेलू इमामबाड़े याद-ए-हुसैन, फ़िक्र और इबादत के मरकज़ बन जाते हैं।
हिन्दुस्तान में शिया तहज़ीब के मरकज़ लखनऊ में अज़ादारी सिर्फ़ मुहर्रम तक महदूद नहीं रहती, बल्कि दो महीने और आठ दिनों तक जारी रहती है। यह वह मुद्दत है जो कर्बला से शुरू होने वाले ग़म और असीरान-ए-कर्बला की वापसी तक के सफ़र की याद ताज़ा करती है।
अवध के नवाबी दौर (१७२२–१८५६) में अज़ादारी को बे-मिसाल सरपरस्ती हासिल हुई। नवाबों ने शानदार इमामबाड़े तामीर कराए, मजलिसों की रिवायत को फ़रोग़ दिया और मर्सिया व नौहा की अज़ीम अदबी विरासत को परवान चढ़ाया। लेकिन अज़ादारी की रूह सिर्फ़ बड़े इमामबाड़ों में नहीं, बल्कि उन बेशुमार घरों में बसती है जहाँ एक चिराग़ रौशन होता है, आँखों से अश्क बहते हैं और इमाम हुसैन (अ.स.) का पैग़ाम नस्ल-दर-नस्ल मुन्तक़िल होता रहता है।
हुसैनियत है बातिल से बे-ख़ौफ़ मुक़ाबला,
हुसैनियत है दिल में चिराग़-ए-हक़ का उजाला।
छोटा-सा घरेलू इमामबाड़ा दरअस्ल उसी चिराग़-ए-हक़ की निशानी है, वह रौशनी जो सदियों से दिलों को मुनव्वर करती चली आ रही है।
( लेखक की फेसबुक वॉल से.. लेखक चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रह चुके हैं।)

