गोवंडी से नागपाड़ा तक कला के ज़रिये समाज सुधारकों को सलाम
(रईस खान)
मुंबई की पहचान सिर्फ़ ऊँची इमारतों, लोकल ट्रेनों और समंदर से नहीं बनती। इस शहर की असली रूह उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब, समाजी जागरूकता और उन लोगों की याद में बसती है जिन्होंने इंसाफ़, तालीम और इंसानियत के लिए अपनी ज़िंदगी समर्पित कर दी।
इसी विरासत को नई नस्ल तक पहुँचाने का काम पिछले कुछ वर्षों में मुंबई के सार्वजनिक स्थलों पर बने कुछ ऐतिहासिक म्यूरलों ने किया है। इन म्यूरलों को व्यवहारिक और कलात्मक रूप देने में कलाकार तुषार शिंदे और दामोदर आवरे की अहम भूमिका रही है, जबकि इतिहास और सामाजिक संदर्भों को सामने लाने में लेखक-पत्रकार सईद हमीद का योगदान भी उल्लेखनीय माना जाता है।

गोवंडी का म्यूरल, तालीम, बराबरी और भाईचारे की दास्तान
गोवंडी में स्थापित महात्मा ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, उस्मान शेख और फातिमा शेख का म्यूरल सिर्फ़ चार शख्सियतों की तस्वीर नहीं है। यह उन्नीसवीं सदी के उस इंक़लाबी दौर की कहानी बयान करता है जब जात-पात, लैंगिक भेदभाव और सामाजिक बंदिशों के खिलाफ़ तालीम को हथियार बनाया गया।
इतिहास बताता है कि ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों की शिक्षा के लिए संघर्ष किया, जबकि उस्मान शेख और उनकी बहन फातिमा शेख ने उन्हें सहारा दिया। फातिमा शेख को भारत की शुरुआती महिला शिक्षिकाओं में गिना जाता है। गोवंडी का यह म्यूरल इसी साझी विरासत और हिंदू-मुस्लिम सहयोग की मिसाल को सामने लाता है।

इस ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व वाले प्रोजेक्ट को लेकर पूर्व विधायक और पूर्व विधान परिषद सदस्य कपिल पाटिल की ज्योतिबा फुले द्विशताब्दी जयंती समारोह समिति ने कलाकारों और सहयोगियों को सम्मानित किया। यह सम्मान केवल कला का नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और इतिहास को जनसाधारण तक पहुँचाने की कोशिश का भी सम्मान है।
नागपाड़ा, जहाँ दीवारों ने इतिहास बोलना शुरू किया
गोवंडी से पहले यही टीम नागपाड़ा जंक्शन पर दो महत्वपूर्ण म्यूरल प्रोजेक्ट्स पर काम कर चुकी थी।
पहला म्यूरल महान उर्दू शायर मिर्ज़ा ग़ालिब को समर्पित था। लगभग 42 फ़ीट लंबे इस म्यूरल में ग़ालिब की शायरी, मुशायरे और 1857 के दौर की झलक दिखाई गई। यह मुंबई में ग़ालिब को समर्पित सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक कला परियोजनाओं में गिना जाता है।
इसके बाद नागपाड़ा जंक्शन पर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का भव्य म्यूरल स्थापित किया गया। इस म्यूरल में मौलाना आज़ाद के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव, उनकी पत्रकारिता, शिक्षा के प्रति समर्पण और देशभक्ति को दर्शाया गया। कलाकार तुषार शिंदे और दामोदर आवरे ने इस कृति को आकार दिया, जबकि मौलाना आज़ाद के जीवन प्रसंगों के अध्ययन में सईद हमीद की भूमिका का भी उल्लेख सार्वजनिक रिपोर्टों में मिलता है।
सम्मान की परंपरा और उसका महत्व
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार कपिल पाटिल और उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहलें लंबे समय से महात्मा फुले, सावित्रीबाई फुले और सामाजिक न्याय की विरासत से जुड़े कार्यक्रम आयोजित करती रही हैं। वर्ष 2026 से देशभर में महात्मा ज्योतिबा फुले की 200वीं जयंती के राष्ट्रीय समारोह भी शुरू हुए हैं, जिससे ऐसे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक प्रोजेक्ट्स को और अधिक महत्व मिला है। यह समिति सामाजिक चेतना, शिक्षा, इतिहास और समाज सुधार की विरासत को आगे बढ़ाने वाले व्यक्तियों और समूहों को सम्मानित भी करती रही है।
कला जो सिर्फ़ सजावट नहीं
आज जब शहरों की दीवारें अक्सर विज्ञापनों और राजनीतिक नारों से भर जाती हैं, ऐसे में गोवंडी और नागपाड़ा के ये म्यूरल एक अलग संदेश देते हैं। ये हमें याद दिलाते हैं कि तालीम, इंसाफ़, भाईचारा और इंसानियत किसी एक मज़हब या समुदाय की जागीर नहीं, बल्कि हमारी साझा विरासत हैं।
सईद हमीद, तुषार शिंदे और दामोदर आवरे की टीम ने लगातार तीन महत्वपूर्ण सार्वजनिक कला परियोजनाओं के माध्यम से यह साबित किया है कि जब इतिहास, शोध और कला एक साथ आते हैं, तो दीवारें भी बोलने लगती हैं।
और शायद यही इन म्यूरलों की सबसे बड़ी कामयाबी है।

