परिसीमन — क्या मुसलमानों की आवाज़ दब जाएगी?

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(रईस खान)

नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब की सभागार में गूंजती हुई आवाज़ें सिर्फ़ भाषण नहीं थीं, वे एक चिंता की थीं। ‘हम भारत के लोग’ संगठन और ‘इंडिया अगेंस्ट अनफेयर डिलिमिटेशन’ के बैनर तले इकट्ठा हुए लोग परिसीमन की उस आगामी प्रक्रिया पर चर्चा कर रहे थे, जो दो हज़ार छब्बीस में देश की राजनीतिक तस्वीर बदल सकती है।

सम्मेलन का माहौल गंभीर था, लेकिन उम्मीद भी थी। सेक्युलर नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और आम मुसलमान वहाँ जमा थे। सबकी एक ही फिक्र, कहीं जनसंख्या के नाम पर कुछ समुदायों की राजनीतिक भागीदारी तो नहीं छीन ली जाएगी?

पुरानी चिंताएँ, नई लड़ाई

साल दो हज़ार छह की सच्चर कमेटी ने जो बात कही थी, वो आज भी गूंज रही है। कई सीटों पर मुस्लिम आबादी चालीस प्रतिशत से ज़्यादा है, लेकिन वे दलित आरक्षण वाली सीटें बन जाती हैं। नतीजा? मुसलमान उम्मीदवार खड़े ही नहीं हो पाते। रंगनाथ मिश्रा कमेटी ने भी यही कहा, ऐसे इलाकों में आरक्षण का फॉर्मूला फिर से सोचना चाहिए।

सम्मेलन में पारित सात प्रस्ताव इन्हीं पुरानी सिफारिशों को नई ताकत देते नजर आए:

– जहां मुस्लिम आबादी ज़्यादा हो और दलित कम, वहाँ अनुसूचित जाति आरक्षण न लगे।

– दलित बहुल इलाकों को सामान्य श्रेणी में न रखा जाए।

– दक्षिण भारत को जनसंख्या नियंत्रण का ‘पुरस्कार’ न मिले, यानी सीटें कम न हों।

– सीमांचल और बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों को अलग केंद्रशासित राज्य बनाने की कोशिश रोकी जाए।

– सेक्युलर पार्टियाँ मुस्लिम बहुल सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारें।

– सुप्रीम कोर्ट दो हज़ार चौबीस के अपने फैसले पर अमल करे।

“लोकतंत्र सबका है, या सिर्फ़ कुछ लोगों का?”

एक वक्ता ने भावुक होकर कहा, “परिसीमन सिर्फ़ लाइनों का खेल नहीं, बल्कि लोगों की आवाज़ का सवाल है।” दूसरे ने जोड़ा, “दक्षिण के राज्य बच्चों की संख्या कम करके शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान देते हैं, तो क्या उन्हें सजा मिलेगी?”

सम्मेलन में सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने इस चर्चा को और वजन दिया। आयोजकों ने साफ़ कहा, यह कोई सांप्रदायिक मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता का सवाल है।

नया अभियान शुरू

सम्मेलन के खत्म होते-होते एक नया हथियार तैयार हो गया, ‘इंडिया अगेंस्ट अनफेयर डिलिमिटेशन’। अब यह अभियान पूरे देश में जाएगा। जागरूकता रैलियाँ, चर्चाएँ और दबाव बनाने की कोशिशें होंगी। मकसद एक ही, दो हज़ार छब्बीस का परिसीमन निष्पक्ष हो, किसी समुदाय की आवाज़ न दबे।

देश की राजनीति में अभी हलचल मची हुई है। लोकसभा सीटें बढ़ने वाली हैं, लेकिन सवाल यह है कि नई सीटों का बंटवारा कैसे होगा? क्या पुरानी गलतियाँ दोहराई जाएंगी? या संविधान की मूल भावना, समानता और न्याय, को मजबूती मिलेगी?

‘हम भारत के लोग’ का यह सम्मेलन सिर्फ़ एक बैठक नहीं था। यह एक चेतावनी थी और साथ ही एक उम्मीद भी, कि लोकतंत्र में हर भारतीय की आवाज़ बराबर सुनी जाए।

अब देखना यह है कि यह आवाज़ कितनी दूर तक जाती है।

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