(रईस खान)
कुरान मजीद की सूरतुल शूरा की आयत नंबर 38 में अल्लाह तआला फरमाते हैं कि सच्चे मोमिन वे हैं जो अपने रब की पुकार पर तुरंत लब्बैक कहते हैं, नमाज की पाबंदी करते हैं, अपने काम आपस के मशवरे से तय करते हैं और अल्लाह की दी हुई रोजी में से दूसरों पर खर्च करते हैं। इस आयत में शूरा यानी मशवरा को मोमिन की खास पहचान बताया गया है।
व्यवसाय और संगठनों में टीम वर्क के रूप में शूरा आज भी सबसे अच्छा तरीका है। अफसोस कि कई जगहों पर व्यक्तिवाद, पार्टीबाजी या ताकत के बल पर फैसले होते हैं, जो इस आयत के खिलाफ है। अगर हम शूरा अपनाएं तो उम्मत की एकता मजबूत होगी, गलतियां घटेंगी और अल्लाह की मदद मिलेगी।
आज की दुनिया में यह आयत बहुत ज्यादा मायने रखती है। परिवार में शादी, शिक्षा या कारोबार के फैसले सब मिलकर करें तो झगड़े कम होंगे। मस्जिद, सोसायटी या संस्थाओं में मशवरे से काम चलाएं तो भरोसा बढ़ेगा। मुस्लिम देशों में पार्लियामेंट या शूरा काउंसिल के जरिए पारदर्शी फैसले हों तो तानाशाही से बचा जा सकता है।
शूरा का सरल मतलब
शूरा का अर्थ है आपस में सलाह-मशवरा करना। मतलब यह कि मुसलमान महत्वपूर्ण फैसले अकेले नहीं लेते। वे एक-दूसरे से चर्चा करते हैं, राय लेते हैं और फिर सबसे अच्छा रास्ता चुनते हैं। यह सिर्फ बातचीत नहीं, बल्कि ईमानदारी और समझदारी से भरा विचार-विमर्श है। इससे गलतियां कम होती हैं, भाईचारा बढ़ता है और फैसला ज्यादा मजबूत बनता है।
तफसीर में शूरा की व्याख्या
बड़े-बड़े मुफस्सिर जैसे इब्न कसीर रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं कि यह आयत उन मोमिनों की खूबियां बयान करती है जिन्हें आखिरत में अल्लाह की विशेष नेमतें मिलेंगी। वे अकेले फैसले नहीं करते। खासकर जंग, राज्य के काम या सामाजिक मुद्दों में मशवरा जरूरी है।
मौलाना मौदूदी ने अपनी तफसीर तफहीमुल कुरान में लिखते हैं कि शूरा इस्लामी समाज की बुनियाद है। मुसलमान तानाशाही या व्यक्तिवाद से दूर रहते हैं। पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खुद सहाबा से मशवरा करते थे, भले ही वे नबी थे। इससे साफ है कि कोई भी व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो, मशवरे की जरूरत होती है।
अन्य उलेमा जैसे इब्न अब्बास और जलालैन की तफसीर में भी यही आता है कि मोमिन जल्दबाजी नहीं करते। अच्छा लगने वाला काम भी पहले आपस में चर्चा करके तय करते हैं। शूरा का मकसद सच्चाई की तलाश और बेहतर फैसला करना है।
इस्लाम में शूरा का महत्व
इस्लाम में शूरा सिर्फ एक सलाह नहीं, बल्कि पूरा जीवन जीने का तरीका है। कुरान की दूसरी आयतों में भी पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मशवरा करने का हुक्म दिया गया है। हदीस में आता है कि मशवरा करने वाला शायद ही कभी नाकाम हो। यह सिद्धांत परिवार, समाज और राज्य हर जगह लागू होता है। इससे तानाशाही रुकती है और लोगों की भागीदारी बढ़ती है।
तारीख में शूरा का अमल
पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जमाने में हर बड़े मामले जैसे बद्र की जंग, उहुद की जंग या हुदैबिय्या की संधि में मशवरा होता था। खुलफाए राशिदीन के दौर में भी यही तरीका रहा। हजरत अबू बक्र रजि अल्लाहु अन्हु की ख़िलाफत मशवरे से तय हुई। हजरत उमर रजि अल्लाहु अन्हु ने अहले शूरा यानी सलाहकार समूह बनाया था। बाद के जमाने में कुछ हुक्मरानों ने इसे कम कर दिया, मगर उलेमा हमेशा इसकी अहमियत बताते रहे।
शूरा कोई छोटा नियम नहीं, बल्कि मोमिन की पूरी जीवन शैली का हिस्सा है। ईमान, नमाज और सदका के साथ मशवरा भी जरूरी है। अकेले मत चलो, मिलकर चलो, यही शूरा का मर्म है।

