धरोहर  –तहज़ीब और तालीम की अमानत

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बेगूसराय में मिली 350 साल पुरानी दुर्लभ पांडुलिपि

जब इतिहास ने खोला अपना एक और पन्ना

बिहार के बेगूसराय जिले से हाल ही में ऐसी खबर सामने आई है, जिसने इतिहास, तालीम और तहज़ीब से जुड़ी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। बरौनी के एक पुराने पुस्तकालय में लगभग 350 साल पुरानी अरबी हस्तलिखित पांडुलिपि की पहचान हुई है। यह पांडुलिपि हदीस की प्रसिद्ध किताब तिरमिज़ी शरीफ से संबंधित बताई जा रही है। इस खोज ने न केवल बेगूसराय बल्कि पूरे बिहार की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को नई पहचान दी है।

यह दुर्लभ पांडुलिपि बरौनी स्थित मौलाना इसहाक उर्दू लाइब्रेरी में संरक्षित थी और सैय्यद अख्तर हुसैन के निजी संग्रह का हिस्सा है। राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे ज्ञान भारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान के दौरान इसकी पहचान की गई। यह अभियान भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा देशभर में बिखरी हुई पुरानी पांडुलिपियों को खोजने, उनका दस्तावेजीकरण करने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए चलाया जा रहा है।

आज के डिजिटल दौर में जब किताबों से दूरी बढ़ रही है, तब ऐसी खोजें हमें याद दिलाती हैं कि हमारे पूर्वजों ने ज्ञान की कितनी बड़ी विरासत हमारे लिए छोड़ी है। सदियों पहले जब छपाई की सुविधाएं नहीं थीं, तब विद्वान अपने हाथों से पूरी किताबें लिखा करते थे। एक-एक पन्ना लिखने में महीनों और कभी-कभी वर्षों लग जाते थे। ऐसे में 350 साल पुरानी किसी हस्तलिखित पांडुलिपि का मिलना किसी खजाने की खोज से कम नहीं माना जाता।

बेगूसराय के जिला अधिकारी श्रीकांत शास्त्री ने स्वयं इस पांडुलिपि का अवलोकन किया और इसके ऐतिहासिक तथा शैक्षणिक महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ऐसी धरोहरें केवल किसी एक समुदाय या क्षेत्र की नहीं होतीं, बल्कि पूरे देश की साझा विरासत होती हैं। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इसके संरक्षण, दस्तावेजीकरण और डिजिटलीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के निर्देश भी दिए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत दुनिया की सबसे समृद्ध पांडुलिपि परंपराओं में से एक का मालिक है। संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू, हिंदी और अन्य भाषाओं में करोड़ों पांडुलिपियां आज भी देश के पुस्तकालयों, धार्मिक संस्थानों और निजी संग्रहों में सुरक्षित हैं। लेकिन समय, मौसम और उपेक्षा के कारण इनमें से कई धरोहरें नष्ट होने के खतरे में हैं। इसी वजह से ज्ञान भारतम मिशन शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य इन दुर्लभ दस्तावेजों को खोजकर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित करना है।

यह मिशन केवल कागज़ बचाने का अभियान नहीं है, बल्कि भारत की ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने की कोशिश भी है। इस अभियान के तहत देशभर में लाखों पांडुलिपियों का सर्वेक्षण किया जा रहा है और आधुनिक तकनीक तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से उनका डिजिटलीकरण भी किया जा रहा है। सरकार के अनुसार अब तक लाखों पांडुलिपियों का रिकॉर्ड तैयार किया जा चुका है और बड़ी संख्या में उन्हें डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जा रहा है।

बेगूसराय में मिली यह पांडुलिपि सिर्फ एक पुरानी किताब नहीं है। यह उस दौर की गवाही है जब इल्म को सबसे बड़ी दौलत माना जाता था। यह हमें बताती है कि हमारे पूर्वज ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए कितनी मेहनत करते थे। एक हस्तलिखित किताब के पन्नों में सिर्फ शब्द नहीं होते, बल्कि एक पूरी सभ्यता की सोच, संस्कृति और इतिहास छिपा होता है।

आज जरूरत इस बात की है कि लोग अपने घरों, पुराने पुस्तकालयों और निजी संग्रहों में रखी ऐसी धरोहरों की जानकारी सामने लाएं। हो सकता है किसी पुराने संदूक, अलमारी या पुस्तकालय में इतिहास का कोई और अनमोल पन्ना हमारा इंतजार कर रहा हो।

बेगूसराय की यह खोज एक उम्मीद भी है और एक संदेश भी। उम्मीद इस बात की कि हमारी विरासत अभी जिंदा है, और संदेश यह कि उसे पहचानना, संभालना और आने वाली नस्लों तक पहुंचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। क्योंकि जो कौमें अपने अतीत को सहेजकर रखती हैं, वही अपने भविष्य को मजबूत बना पाती हैं।

क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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