आईआईएमसी में उर्दू पत्रकारिता को लेकर उठे सवालों की असली कहानी
(रईस खान)
नई दिल्ली के भारतीय जन संचार संस्थान आईआईएमसी का नाम देश में पत्रकारिता की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में लिया जाता है। यहां से निकले हजारों पत्रकार आज देश और दुनिया के बड़े मीडिया संस्थानों में अपनी पहचान बना चुके हैं। लेकिन इन दिनों आईआईएमसी का उर्दू पत्रकारिता विभाग एक नई बहस के केंद्र में है। सोशल मीडिया पर कई दिनों से यह दावा किया जा रहा है कि उर्दू पत्रकारिता का कोर्स बंद कर दिया गया है। किसी ने लिखा कि विभाग पर ताला लग गया है तो किसी ने कहा कि अब यहां उर्दू पत्रकार नहीं तैयार होंगे। इन खबरों ने छात्रों और उर्दू पत्रकारिता से जुड़े लोगों के बीच चिंता बढ़ा दी।
लेकिन जब इस पूरे मामले की तह तक पहुंचा गया तो तस्वीर कुछ अलग निकली।
सच्चाई यह है कि आईआईएमसी का उर्दू पत्रकारिता का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स अभी भी जारी है। वर्ष 2026 और 2027 के सत्र के लिए भी प्रवेश प्रक्रिया पूरी की गई और संस्थान की आधिकारिक वेबसाइट पर इसकी जानकारी उपलब्ध रही। यानी यह कहना कि कोर्स पूरी तरह बंद हो गया है, सही नहीं है।
फिर सवाल यह है कि इतना बड़ा विवाद आखिर क्यों खड़ा हुआ।
असल कहानी वर्ष 2026 के प्रवेश से शुरू होती है। पहले जारी किए गए प्रवेश नोटिस में साफ लिखा गया था कि छात्र उर्दू या देवनागरी दोनों लिपियों में परीक्षा दे सकते हैं। लेकिन कुछ समय बाद संस्थान ने संशोधित नोटिस जारी कर दिया। नए नियम के अनुसार परीक्षा केवल उर्दू नस्तालीक लिपि में ही देने की बात कही गई। संस्थान ने पहले नोटिस को विभागीय गलती बताया।
यहीं से विवाद शुरू हो गया। ऐसे कई छात्र जो उर्दू भाषा जानते थे लेकिन देवनागरी लिपि में पढ़ते और लिखते थे, अचानक प्रवेश प्रक्रिया से बाहर हो गए। कुछ छात्रों ने इसे अन्याय बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने शुरुआती सुनवाई में याचिकाकर्ताओं को परीक्षा में बैठने की अनुमति दी और मामले की सुनवाई आगे बढ़ी। दूसरी ओर आईआईएमसी ने अदालत में कहा कि प्रवेश के नियम तय करना संस्थान का अधिकार है और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए उर्दू लिपि का ज्ञान जरूरी है।
यहीं से एक पुरानी बहस फिर सामने आ गई। क्या उर्दू केवल एक लिपि का नाम है या एक भाषा का। क्या देवनागरी में उर्दू पढ़ने वाले छात्रों को भी अवसर मिलना चाहिए। क्या भाषा और लिपि को अलग-अलग देखा जा सकता है। इन सवालों पर शिक्षाविदों, पत्रकारों और भाषा विशेषज्ञों की अलग-अलग राय सामने आने लगी।
आईआईएमसी में उर्दू पत्रकारिता की शुरुआत वर्ष 2013 में हुई थी। उस समय यह केवल पांच महीने का डिप्लोमा कोर्स था। उद्देश्य था कि उर्दू मीडिया को आधुनिक पत्रकारिता से जोड़ा जाए और नई पीढ़ी को बेहतर प्रशिक्षण मिले। शुरुआत सिर्फ आठ छात्रों से हुई थी। धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता बढ़ी और वर्ष 2017 में इसे एक वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा में बदल दिया गया। तब से यहां प्रिंट मीडिया, डिजिटल मीडिया, टेलीविजन पत्रकारिता और नई तकनीक की ट्रेनिंग भी दी जाने लगी।
लेकिन एक और सच्चाई भी सामने आती है। पिछले कुछ वर्षों से इस कोर्स में आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। कई बार तीस सीटों में से काफी सीटें खाली रह जाती हैं। इसके पीछे कई वजहें बताई जाती हैं। उर्दू लिपि जानने वाले छात्रों की संख्या कम होना, उर्दू मीडिया में सीमित रोजगार के अवसर और नई पीढ़ी का दूसरी भाषाओं की ओर बढ़ता रुझान इनमें प्रमुख हैं।
यही कारण है कि सोशल मीडिया पर यह चर्चा तेज हो गई कि अगर छात्र ही नहीं आएंगे तो भविष्य में विभाग पर संकट आ सकता है। हालांकि अभी तक आईआईएमसी की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है कि कोर्स बंद किया जा रहा है।
दरअसल यह सिर्फ एक संस्थान का मामला नहीं है। यह भारतीय भाषाओं और खास तौर पर उर्दू पत्रकारिता के भविष्य का सवाल भी है। उर्दू अखबारों, डिजिटल पोर्टलों और समाचार वेबसाइटों को आज प्रशिक्षित पत्रकारों की जरूरत है। ऐसे में अगर प्रशिक्षण संस्थान कमजोर होंगे तो इसका असर पूरी उर्दू पत्रकारिता पर पड़ेगा।
आज जरूरत इस बात की है कि विवाद से आगे बढ़कर समाधान तलाशा जाए। भाषा की गुणवत्ता भी बनी रहे और ज्यादा से ज्यादा योग्य छात्रों को अवसर भी मिले। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जरूरत हो तो प्रवेश के बाद अलग से उर्दू लिपि की दक्षता जांची जा सकती है या विशेष प्रशिक्षण दिया जा सकता है। इससे भाषा का स्तर भी बना रहेगा और नए छात्रों के लिए रास्ते भी खुलेंगे।
उर्दू केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की साझा तहजीब, साहित्य और पत्रकारिता की मजबूत विरासत है। इस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए संस्थानों, मीडिया उद्योग और समाज तीनों को मिलकर काम करना होगा।
आईआईएमसी का उर्दू पत्रकारिता विभाग आज बंद होने की कहानी नहीं, बल्कि बदलाव, चुनौतियों और नए रास्ते तलाशने की कहानी बन गया है। अब देखना यह है कि आने वाले वर्षों में यह बहस उर्दू पत्रकारिता को कमजोर करती है या उसे पहले से ज्यादा मजबूत बनाने का रास्ता तैयार करती है।

