आखिरी सफ़र –ख़ामनेई की तद्फ़ीन: दुनिया भर से आए डेलिगेट्स के बीच ईरान ने इतनी बड़ी तक़रीब कैसे कराई?

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(रईस खान)
आयतुल्लाह अली ख़ामनेई की तद्फ़ीन आज सिर्फ़ एक मज़हबी रस्म नहीं थी, बल्कि यह ईरान के लिए एक बड़ा सियासी, कूटनीतिक और सुरक्षा के लिहाज़ से बेहद अहम इवेंट भी साबित हुई। दुनिया के कई मुल्कों से सरकारी और गैर-सरकारी वफ़्द इस मौके पर ईरान पहुंचे। सबसे ज़्यादा चर्चा इस बात की रही कि जब ईरान हाल के महीनों में लगातार सुरक्षा चुनौतियों और दुश्मन देशों की धमकियों का सामना कर रहा था, तब इतनी बड़ी तक़रीब आखिर बिना किसी बड़े सुरक्षा हादसे के कैसे मुकम्मल हुई।

सबसे पहले सवाल यह उठा कि तद्फ़ीन में कई महीनों की देरी क्यों हुई। ईरानी अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक़ इसकी सबसे बड़ी वजह सुरक्षा थी। हुकूमत को आशंका थी कि जनाज़े या तद्फ़ीन के दौरान किसी तरह का ड्रोन हमला, मिसाइल हमला या तोड़फोड़ की कार्रवाई हो सकती है। इसी वजह से जल्दबाज़ी करने के बजाय हालात का जायज़ा लिया गया और तब तक इंतज़ार किया गया जब तक सुरक्षा एजेंसियों को यक़ीन नहीं हो गया कि बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किया जा सकता है।

दूसरी अहम वजह यह थी कि ईरान को अंदाज़ा था कि लाखों नहीं बल्कि करोड़ों लोग आख़िरी दीदार के लिए उमड़ सकते हैं। इससे पहले भी ईरान में बड़े नेताओं के जनाज़ों के दौरान भारी भीड़ की वजह से भगदड़ और जान-माल का नुक़सान हो चुका है। सरकार इस बार ऐसी किसी घटना को दोहराना नहीं चाहती थी। इसलिए पूरे कार्यक्रम को कई चरणों में बाँटा गया ताकि भीड़ एक ही जगह इकट्ठा न हो और लोगों की आवाजाही बेहतर ढंग से हो सके।

ईरान ने इस तद्फ़ीन को एक साधारण अंतिम संस्कार की बजाय स्टेट फ़्यूनरल का दर्जा दिया। इसका मक़सद सिर्फ़ अपने नेता को विदाई देना नहीं था, बल्कि दुनिया को यह संदेश देना भी था कि ईरान अब भी अपने सहयोगी देशों के साथ मज़बूती से खड़ा है। यही वजह रही कि कई देशों के सरकारी प्रतिनिधिमंडलों, धार्मिक नेताओं और विदेशी मेहमानों को इस कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता दिया गया। विश्लेषकों का मानना है कि ईरान इस आयोजन के ज़रिये यह दिखाना चाहता था कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और क्षेत्रीय तनाव के बावजूद उसका कूटनीतिक प्रभाव बरकरार है।

इतने बड़े कार्यक्रम की सुरक्षा ईरान के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। इसके लिए देश की सुरक्षा एजेंसियों ने कई स्तरों पर इंतज़ाम किए। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स , पुलिस और बसीज फ़ोर्स को बड़े पैमाने पर तैनात किया गया। कार्यक्रम स्थल और पूरे रूट पर ड्रोन निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस और ख़ुफ़िया एजेंसियों की लगातार नज़र बनी रही। विदेशी डेलिगेट्स के लिए अलग सुरक्षा कॉरिडोर बनाए गए ताकि आम भीड़ और वीआईपी मूवमेंट एक-दूसरे से प्रभावित न हों। कई इलाक़ों में हवाई क्षेत्र पर भी विशेष निगरानी रखी गई और हर आने-जाने वाले व्यक्ति की कई स्तरों पर जाँच की गई।

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान ने इस पूरे आयोजन की तैयारी कई महीने पहले से शुरू कर दी थी। ख़ुफ़िया एजेंसियों ने संभावित ख़तरों की पहचान कर पहले ही कई एहतियाती कदम उठा लिए थे। भीड़ को अलग-अलग हिस्सों में बाँटने, कार्यक्रम को चरणबद्ध तरीके से आयोजित करने और लगातार निगरानी रखने की वजह से कोई बड़ा सुरक्षा हादसा सामने नहीं आया।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ यह तद्फ़ीन सिर्फ़ एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि ईरान की ताक़त, उसके प्रशासनिक नियंत्रण और उसके अंतरराष्ट्रीय रिश्तों का प्रदर्शन भी थी। इस आयोजन के ज़रिये ईरानी नेतृत्व ने अपने नागरिकों और दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश की कि नेतृत्व में बदलाव के बावजूद राज्य की संस्थाएँ मज़बूत हैं, सुरक्षा व्यवस्था सक्रिय है और देश अपने सहयोगी देशों के साथ पहले की तरह खड़ा हुआ है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस आयोजन की सफलता के बावजूद ईरान के सामने क्षेत्रीय तनाव, सुरक्षा चुनौतियाँ और राजनीतिक बदलाव जैसे मुद्दे आगे भी बने रहेंगे।

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