(मौलाना उबैदुल्लाह खान आज़मी)
भारत की आज़ादी को लगभग आठ दशक होने को आए। इन वर्षों में न जाने कितनी सभाएँ हुईं, कितने आंदोलन चले, कितने प्रस्ताव पारित हुए, कितने भाषण हुए, कितनी किताबें और लेख लिखे गए, कितने सम्मेलन हुए और कितने नारे लगे कि “समाज को बदलना है”, “मिल्लत को उठाना है”, “भविष्य संवारना है।”
लेकिन ज़रा ठंडे दिल से अपने आप से एक सवाल पूछिए।
क्या सचमुच हम बदल गए?
आज़ादी के बाद से मुस्लिम समाज अपनी जगह से एक इंच भी टस से मस नहीं हुआ। यही सच्चाई है।
अगर ईमानदारी से जवाब दिया जाए तो सच्चाई बहुत कड़वी है। मुसलमान सामूहिक रूप से आज़ादी के बाद जहाँ खड़ा था, आज भी वहीं खड़ा दिखाई देता है। शायद चेहरे बदल गए, संस्थाओं के नाम बदल गए, नारों के शब्द बदल गए, लेकिन सामूहिक स्थिति में कोई मूलभूत बदलाव नहीं आ सका।
आख़िर क्यों?
इसलिए कि हम बीमारी का इलाज नहीं कर रहे, बल्कि उसके लक्षणों का इलाज कर रहे हैं।
हम हर दिन नए-नए मुद्दों पर चर्चा करते हैं, मगर कभी यह नहीं सोचते कि इन समस्याओं की जड़ क्या है?
हमारे यहाँ मतभेद भी हैं, बिखराव भी है, धार्मिक विभाजन भी है, फिरकों की खींचतान भी है, राजनीतिक बिखराव भी है और सोच की दिशा भी स्पष्ट नहीं है। दुख की बात यह है कि ये मतभेद कम होने के बजाय हर दिन बढ़ रहे हैं।
एक वर्ग दीन की सेवा के नाम पर केवल दूसरों को गुमराह, बदअकीदे वाला और जहन्नमी साबित करने में लगा है, जबकि दूसरा वर्ग अपनी सुधार के बजाय रस्मों, अंधविश्वासों और केवल भावनाओं को ही दीन समझ बैठा है। दोनों अपनी-अपनी दुनिया में संतुष्ट हैं, मगर समाज दोनों के बीच पिस रहा है।
हमें यह सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि मतभेद कभी समाप्त नहीं होंगे। न सहाबा के दौर में हुए, न इमामों के दौर में, न आज होंगे।
असल सवाल मतभेद का नहीं, बल्कि मतभेद के साथ जीने का तरीका सीखने का है।
मतभेद अगर अच्छे व्यवहार, सहनशीलता और साझा उद्देश्यों के साथ हो तो रहमत बन जाता है, और अगर अहंकार, पक्षपात और नफ़रत के साथ हो तो मुसीबत बन जाता है।
लेकिन एक सवाल और है।
अगर सचमुच समाज को बदलना है तो यह काम करेगा कौन?
क्या केवल भाषण?
क्या केवल सोशल मीडिया?
क्या केवल सभाएँ?
क्या केवल भावनात्मक नारे?
बिलकुल नहीं।
दुनिया में कोई भी बड़ा बदलाव भीड़ ने नहीं लाया। हमेशा कुछ दूरदर्शी, आर्थिक रूप से सक्षम और दृढ़ निश्चयी लोगों ने इतिहास का रुख मोड़ा, फिर आम लोग उनके पीछे चले।
मुसलमानों को अब केवल इंटेलेक्चुअल, बुद्धिजीवी नहीं, बल्कि काम करने वाले प्रभावी बुद्धिजीवियों की ज़रूरत है। यहाँ ऐसे बुद्धिजीवियों से मतलब उन लोगों से है जिनके पास योजना, दूरदृष्टि और समाज की उन्नति का रोडमैप भी हो और साथ ही मज़बूत आर्थिक शक्ति भी हो। जैसे विप्रो के मालिक, सिप्ला के मालिक, लूलू ग्रुप के मालिक, हमदर्द के मालिक, हिमालया के मालिक आदि, जो आज हज़ारों करोड़ रुपये की संपत्ति के मालिक हैं। और ऐसे हज़ारों लोग आज भी भारत में मौजूद हैं।
मुझे विश्वास है कि अगर भारत के केवल सौ प्रभावशाली मुसलमान, जिनके पास हज़ारों करोड़ रुपये की आर्थिक शक्ति है, अपने अहंकार, गुटबाज़ी और छोटे-छोटे स्वार्थों से ऊपर उठकर एक मेज़ पर बैठ जाएँ और अगले पच्चीस वर्षों का साझा रोडमैप तैयार करें, तथा उस पर निवेश करें, तो समाज की तक़दीर बदल सकती है।
ये सौ लोग अगर अपनी संपत्ति का केवल एक छोटा-सा हिस्सा भी शिक्षा, शोध, तकनीक, मीडिया, नेतृत्व निर्माण, छात्रवृत्ति, थिंक टैंक, व्यापारिक प्रशिक्षण, स्टार्टअप, कानूनी सहायता और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर लगाएँ, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बदल सकता है।
याद रखिए, समाज दान से नहीं, निवेश से बनता है। ऐसा निवेश जिसमें त्याग हो, बलिदान की भावना हो।

