हुसैनी पैग़ाम—हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन रज़ियल्लाहु अन्हु: कर्बला के बाद ज़िंदा रहने वाली बुलंद आवाज़

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कर्बला की जंग ख़त्म हो गई थी। मैदान में हर तरफ़ शहीदों के जिस्म पड़े थे। रसूलुल्लाह ﷺ के नवासे हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु अपने 72 साथियों के साथ शहादत का जाम पी चुके थे।

लेकिन अल्लाह की मशीयत से अहले-बैत का एक नौजवान ज़िंदा रहा। यह थे हज़रत इमाम अली इब्न हुसैन, जिन्हें दुनिया इमाम ज़ैनुल आबिदीन रज़ियल्लाहु अन्हु के नाम से जानती है।

वे बीमार थे, इसलिए जंग में हिस्सा नहीं ले सके। मगर उन्होंने वह मंज़र अपनी आँखों से देखा, जिसे कोई इंसान भूल नहीं सकता।

कर्बला ने उनकी पूरी ज़िंदगी बदल दी

कर्बला से पहले वे एक नौजवान थे। लेकिन कर्बला के बाद उनकी पूरी ज़िंदगी इबादत, सब्र और इंसानियत की ख़िदमत बन गई।

उन्होंने अपने वालिद, चाचा, भाइयों, रिश्तेदारों और दोस्तों की शहादत देखी। फिर कैदी बनाकर कूफ़ा और दमिश्क ले जाए गए।

इतनी बड़ी मुसीबत के बाद भी उन्होंने न बदला लेने की राह चुनी और न नफ़रत फैलाने की। उन्होंने इल्म, अख़लाक़ और दुआ के ज़रिए उम्मत की इस्लाह का रास्ता अपनाया।

हमेशा ग़मज़दा क्यों दिखाई देते थे?

रिवायतों में आता है कि जब भी उनके सामने पानी रखा जाता, उन्हें कर्बला की प्यास याद आ जाती और उनकी आँखें भर आतीं।

जब खाना सामने आता, उन्हें अपने वालिद और उन बच्चों की याद आ जाती जो कर्बला में भूखे और प्यासे रहे।

लोगों ने एक बार अर्ज़ किया, “क्या आपका ग़म कभी कम नहीं होगा?”

उन्होंने फ़रमाया कि हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम ने अपने एक बेटे की जुदाई में इतना रोया कि उनकी आँखों की रोशनी कम हो गई, जबकि उनका बेटा ज़िंदा था। मैंने तो अपने घर के कई अफ़राद को एक ही दिन शहीद होते देखा है, फिर मेरा ग़म कैसे कम हो सकता है?

यही वजह थी कि लोग उन्हें सब्र करने वाला भी कहते थे और रोने वाला भी। मगर उनका रोना मायूसी का नहीं, बल्कि अपने शहीद वालिद की याद और अल्लाह की मोहब्बत का इज़हार था।

इस्लाम को उनसे क्या मिला?

अगर इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपने ख़ून से इस्लाम के उसूलों की हिफ़ाज़त की, तो इमाम ज़ैनुल आबिदीन रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपने इल्म, दुआ और अख़लाक़ से उन उसूलों को आने वाली नस्लों तक पहुँचाया।

उन्होंने लोगों को सिखाया कि:ग़ुस्से से नहीं, अख़लाक़ से दिल जीते जाते हैं।
ज़ुल्म का जवाब ज़ुल्म नहीं होता।
सब्र कमज़ोरी नहीं, सबसे बड़ी ताक़त है।
इबादत सिर्फ़ नमाज़ नहीं, बल्कि इंसानों की ख़िदमत भी है।

ग़रीबों के सबसे बड़े मददगार

रिवायतों में आता है कि वे रात के अँधेरे में ग़रीबों के घर राशन और खाना पहुँचाते थे। किसी को पता नहीं चलता था कि मदद कौन कर रहा है।

जब उनका इंतिक़ाल हुआ, तब बहुत से ग़रीबों को मालूम हुआ कि वर्षों से उनकी मदद करने वाले यही इमाम ज़ैनुल आबिदीन रज़ियल्लाहु अन्हु थे। उन्होंने कभी अपनी नेकी का ऐलान नहीं किया।

इल्म और दुआ की विरासत

उनकी सबसे बड़ी निशानी “सहीफ़ा सज्जादिय्या” मानी जाती है, जिसमें इंसान और अल्लाह के रिश्ते, सब्र, तौबा, इंसाफ़ और इंसानियत पर गहरी दुआएँ मिलती हैं।

इसी तरह “रिसालतुल हुकूक़” में उन्होंने बताया कि इंसान पर अल्लाह का, माँ-बाप का, पड़ोसी का, औलाद का और समाज का क्या हक़ है।

आज भी यह किताब इस्लामी अख़लाक़ का एक अहम ख़ज़ाना मानी जाती है।

उनका सबसे बड़ा पैग़ाम

इमाम ज़ैनुल आबिदीन रज़ियल्लाहु अन्हु ने यह साबित किया कि हर जंग तलवार से नहीं लड़ी जाती।
कुछ जंगें सब्र से जीती जाती हैं।
कुछ जंगें इल्म से जीती जाती हैं।
कुछ जंगें अख़लाक़ से जीती जाती हैं।
और कुछ जंगें इंसानियत की ख़िदमत से जीती जाती हैं।

उन्होंने कर्बला के दर्द को नफ़रत में नहीं बदला, बल्कि उसे इंसानियत, दुआ, इबादत और ख़िदमत का पैग़ाम बना दिया।

आज के मुसलमानों के लिए सबक

अगर हम इमाम ज़ैनुल आबिदीन रज़ियल्लाहु अन्हु की ज़िंदगी से कुछ सीखना चाहते हैं, तो वह यह है कि:

मुश्किल हालात में भी अल्लाह पर भरोसा रखो।

इल्म हासिल करो और उसे लोगों तक पहुँचाओ।

ग़रीबों और मजबूरों की ख़िदमत करो।

अपने अख़लाक़ से इस्लाम का पैग़ाम दो।

ग़ुस्से की जगह सब्र अपनाओ।

नफ़रत की जगह मोहब्बत फैलाओ।

अपने किरदार से लोगों के दिल जीतने की कोशिश करो।

इसीलिए इमाम ज़ैनुल आबिदीन रज़ियल्लाहु अन्हु को सिर्फ़ कर्बला के गवाह के रूप में नहीं, बल्कि सब्र, इबादत, इल्म, अख़लाक़ और इंसानियत के सबसे बड़े उस्तादों में शुमार किया जाता है। उनका किरदार आज भी हर मुसलमान के लिए रोशनी का चिराग़ है।

– क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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