हुनर  — बाँस से बुलंदी तक, कैसे तैयार होता है ताज़िया? 

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(विशेष फीचर)

मुहर्रम का चाँद नज़र आते ही मुल्क के कई शहरों में एक अलग ही हलचल शुरू हो जाती है। कहीं बाँस चिरने की आवाज़ सुनाई देती है, कहीं रंगीन काग़ज़ कट रहे होते हैं, तो कहीं जरी, अबरक और चमकीली पन्नियाँ मेज़ों पर बिछी होती हैं। कारीगरों के हाथ रुकते नहीं, क्योंकि वे सिर्फ़ एक सजावटी ढाँचा नहीं, बल्कि अपनी अकीदत और फ़न का शाहकार तैयार कर रहे होते हैं, ताज़िया।

आज भी लखनऊ, बिसवाँ, सीतापुर, बाराबंकी, हैदराबाद, जयपुर, भोपाल, इंदौर और देश के कई हिस्सों में ताज़िया बनाने का फ़न पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज़िंदा है।

पहला मरहला: ख़याल से ख़ाका

हर ताज़िया एक ख़याल से शुरू होता है।

कारीगर सबसे पहले काग़ज़ पर उसका नक़्शा बनाते हैं। कितनी मंज़िलें होंगी, कितने मीनार बनेंगे, गुंबद कैसा होगा, मेहराब कितनी होंगी, हर चीज़ पहले दिमाग़ में तैयार होती है।

बड़े ताज़ियों का डिज़ाइन कई बार पिछले साल से बिल्कुल अलग रखा जाता है ताकि हर साल कुछ नया दिखाई दे। आज कई नौजवान कारीगर मोबाइल और कंप्यूटर पर डिज़ाइन देखकर भी नए आइडिया तैयार कर रहे हैं, लेकिन असली नाप-जोख अब भी हाथ से ही होती है।

दूसरा मरहला: बाँस की हड्डियाँ

ताज़िए की जान उसका ढाँचा होता है।

इसके लिए पतले, मज़बूत और लचीले बाँस चुने जाते हैं। पहले इन्हें लंबाई के हिसाब से चीरकर पतली पट्टियों में बदला जाता है।

फिर इन्हीं पट्टियों से तख़्त, मेहराब, मीनार और गुंबद का पूरा ढाँचा तैयार होता है।

लखनऊ के कई पुराने कारीगर आज भी बाँस को बाँधने के लिए पारंपरिक तरीक़े अपनाते हैं, जबकि दूसरे इलाक़ों में अब मज़बूत धागे, फ़ेविकोल और दूसरे चिपकाने वाले मवाद का इस्तेमाल भी होने लगा है।

तीसरा मरहला: काग़ज़ का जादू

जब ढाँचा तैयार हो जाता है, तब शुरू होती है असली फ़नकारी।

रंग-बिरंगे काग़ज़, सुनहरी और चाँदी जैसी फ़ॉइल, अबरक, सितारे, जरी, मोती, लेस और फूलों से ताज़िया सजाया जाता है।

कारीगर बताते हैं कि पहले आटे की लेई से काग़ज़ चिपकाए जाते थे। आज उसकी जगह अलग-अलग तरह के गोंद और चिपकाने वाले मवाद इस्तेमाल होते हैं। चमकीले काग़ज़ और सजावटी मवाद की वजह से ताज़िए पहले से कहीं ज़्यादा दिलकश दिखाई देते हैं।

चौथा मरहला: हाथों का कमाल

एक ताज़िया मशीन नहीं बनाती।

हर मीनार, हर गुंबद, हर मेहराब और हर नक़्क़ाशी इंसानी हाथों से तैयार होती है।

लखनऊ के कश्मीरी मोहल्ला और रौज़ा-ए-काज़मैन जैसे इलाक़ों में पूरा ख़ानदान इस काम में शरीक होता है। मर्द ढाँचा बनाते हैं, जबकि बहुत-सी ख़्वातीन घरों में बैठकर सजावट, जरी और काग़ज़ का काम करती हैं। यही वजह है कि यह फ़न सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि एक ख़ानदानी विरासत भी है।

नई टेक्नोलॉजी ने क्या बदला?

वक़्त के साथ ताज़िया बनाने का अंदाज़ भी बदला है।

अब कई कारीगर,

एलईडी लाइट लगाते हैं।

लेज़र-कट डिज़ाइन का इस्तेमाल करते हैं।

तैयार सजावटी शीट और ग्लिटर मटेरियल लगाते हैं।

मौसम से बचाने के लिए हल्की वॉटर-रेज़िस्टेंट कोटिंग भी करते हैं।

लेकिन एक बात नहीं बदली, बुनियादी ढाँचा आज भी हाथ से ही तैयार होता है। यही उसकी असली पहचान है।

माहौल का भी ख़याल

पहले कुछ समय तक थर्माकोल और प्लास्टिक का इस्तेमाल बढ़ा, लेकिन बाद में बहुत-से कारीगरों ने इन्हें कम करना शुरू किया।

आज कई जगह फिर से बाँस, काग़ज़ और ऐसी चीज़ों पर ज़ोर दिया जा रहा है जो आसानी से मिट्टी में मिल जाएँ। पर्यावरण की फ़िक्र अब ताज़िया बनाने वालों के बीच भी बढ़ रही है।

बाज़ार भी, इबादत भी

कारीगर कहते हैं कि ताज़िया बिकने तक एक दस्तकारी है, लेकिन जब कोई अज़ादार उसे अपने इमामबाड़े या घर ले जाता है, तो वह उसके लिए अकीदत की निशानी बन जाता है।

मुहर्रम से पहले लखनऊ और दूसरे शहरों में ताज़िया बाज़ार सजते हैं। हथेली जितने छोटे मन्नती ताज़ियों से लेकर 30–35 फ़ुट ऊँचे ताज़िए तक तैयार किए जाते हैं। उनकी क़ीमत सैकड़ों रुपये से लेकर हज़ारों और कभी-कभी लाखों रुपये तक पहुँच जाती है, जो आकार, फ़नकारी और इस्तेमाल हुए मवाद पर निर्भर करती है।

एक कारीगर की ज़ुबानी

लखनऊ के एक बुज़ुर्ग कारीगर कहते हैं,”हम ताज़िया नहीं बनाते, हम अपनी मोहब्बत को शक्ल देते हैं। हर साल कोशिश होती है कि पिछले साल से बेहतर काम करें। जब कोई अज़ादार मुस्कुराकर हमारा बनाया ताज़िया ले जाता है, वही हमारी सबसे बड़ी कमाई होती है।”

सिर्फ़ एक ढाँचा नहीं, ज़िंदा विरासत

ताज़िया सिर्फ़ बाँस, काग़ज़ और जरी का मेल नहीं।

यह कारीगरों की मेहनत, ख़ानदानी फ़न, अकीदत, सब्र और सदियों पुरानी रिवायत का ज़िंदा नमूना है।

बदलते दौर में भले ही नई टेक्नोलॉजी, नई सजावट और नए डिज़ाइन आ गए हों, लेकिन ताज़िया बनाने वाले हाथ आज भी वही हैं, जो हर साल मुहर्रम से पहले अपने फ़न में जान डाल देते हैं।

शायद इसी लिए कहा जाता है कि ताज़िया सिर्फ़ देखा नहीं जाता, महसूस किया जाता है।

क़ौफ़ टीम

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