संस्कार –केरल की इंसानी कहानी, मुस्लिम महिला ने किया हिंदू भाई का अंतिम संस्कार 

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  (रईस खान)

केरल के कासरगोड जिले में एक दिल छू लेने वाली घटना हुई है। एक मुस्लिम महिला पंचायत सदस्य ने एक हिंदू व्यक्ति के अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज से किए, क्योंकि उनका अपना परिवार शव लेने नहीं आया। यह घटना दिखाती है कि धर्म से ऊपर इंसानियत है।

टी. नारायणन,64 वर्ष मंजेश्वर तालुक के मीनजा ग्राम पंचायत के चिगुरुपाडे गांव के रहने वाले थे। वे दिहाड़ी मजदूर थे। पहले वे आरएसएस से जुड़े थे, लेकिन पिछले कई सालों से परिवार से अलग थे। उनकी दो पत्नियां, बच्चे और बहन थीं।

लगभग एक महीने पहले नारायणन को गांव में एक पुरानी दुकान के बरामदे में बेहद कमजोर हालत में पड़ा पाया गया। उनका मुंह का कैंसर आखिरी स्टेज में पहुंच गया था। वे कई दिनों से बिना खाए-पिए थे। बदबू की वजह से आसपास के लोग भी उनके पास नहीं जाते थे।

मीनजा पंचायत के वार्ड सदस्य शरीफ चिनाला ने इसकी सूचना इरफाना इकबाल को दी। इरफाना कासरगोड डिस्ट्रिक्ट पंचायत की सदस्य और डेवलपमेंट चेयरपर्सन हैं। वे उप्पला में शेख जायद ओल्ड एज होम चलाती हैं।

इरफाना और उनके स्वयंसेवकों ने नारायणन को साफ किया, नहलाया और अस्पताल पहुंचाया। उनकी हालत बहुत गंभीर थी, इसलिए उन्हें कोझिकोड गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। वहां करीब एक महीने इलाज चला, लेकिन 26 जून 2026 को उनकी मृत्यु हो गई।

पुलिस ने परिवार को सूचना दी, लेकिन कोई भी शव लेने नहीं आया। उनकी बहन कमला और दोनों पत्नियां ने लिखित में कहा कि वे शव नहीं लेंगे और अंतिम संस्कार का जिम्मा इरफाना इकबाल को सौंपते हैं। परिवार ने पुराने झगड़ों और खर्च न उठा पाने का हवाला दिया।

शव को एम्बुलेंस से उप्पला ले जाया गया। चेर्गोली पब्लिक क्रेमेटोरियम, हिंदू श्मशान घाट में हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार हुआ। इरफाना इकबाल ने खुद चिता जलाई और बेटी की तरह सभी रस्में पूरी कीं। कुछ स्थानीय सोशल वर्कर भी मौजूद थे।

इरफाना ने फेसबुक पर लिखा, “कोई करीबी रिश्तेदार नहीं आया। मैंने नारायणन एत्तन के अंतिम संस्कार बेटी की तरह किए। धर्म और राजनीति से ऊपर मानवता है।” उन्होंने कहा कि उनके समुदाय में भी अनाथों का संस्कार उनके धर्म के अनुसार ही किया जाता है।

यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। लोगों ने इरफाना की सराहना की। कासरगोड के सांसद राजमोहन उन्नीथन ने उन्हें “नफरत के बाजार में प्यार की दुकान” कहा।

यह कहानी केरल की सांप्रदायिक सद्भावना और मानवीय मूल्यों को मजबूत करती है। इरफाना का काम दिखाता है कि जरूरतमंद की मदद करना किसी धर्म या पार्टी से बड़ा है।

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