साझी विरासत–दरौली का लंगर: जहाँ मुहर्रम में मज़हब नहीं, इंसानियत को खाना खिलाया जाता है

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(रिपोर्ट: विशेष फीचर)

मुहर्रम का महीना आते ही उन्नाव ज़िले के दरौली गाँव की फ़िज़ा बदलने लगती है। यहाँ ताज़िया, अलम और मजलिस के साथ एक और रिवायत लोगों का इंतज़ार करती है, दरौली का मशहूर लंगर।

यह लंगर सिर्फ़ खाना बाँटने का नाम नहीं है, बल्कि मोहब्बत, बराबरी और इंसानियत की ऐसी रिवायत है, जो कई पुश्तों से चली आ रही है। यहाँ कोई यह नहीं पूछता कि सामने वाला किस मज़हब, बिरादरी या जाति से है। जो भी आता है, उसे इज़्ज़त के साथ खाना खिलाया जाता है।

सूफ़िया-ए-किराम की रिवायत से जुड़ा लंगर

इतिहासकारों के मुताबिक, हिंदुस्तान में आने वाले कई सूफ़ी बुज़ुर्गों ने अपनी ख़ानक़ाहों में मुसाफ़िरों, ग़रीबों और ज़रूरतमंदों के लिए मुफ़्त खाने का इंतज़ाम किया। यही लंगर की रिवायत थी, जिसने इंसानियत, ख़िदमत और बराबरी का पैग़ाम दिया।

बाद में देश के अलग-अलग हिस्सों की ख़ानक़ाहों में यह सिलसिला मज़बूत होता गया। इसी तरह, सिख धर्म के गुरुद्वारों में भी लंगर की एक महान परंपरा विकसित हुई, जिसे आज पूरी दुनिया सेवा और समानता की मिसाल मानती है।

दरौली का लंगर भी इसी ख़िदमत और मोहब्बत की रिवायत का एक ख़ूबसूरत नमूना है।

दरौली: जहाँ मुहर्रम सबका होता है

उन्नाव ज़िले का दरौली गाँव गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक ज़िंदा मिसाल है। यहाँ हिंदू और मुस्लिम बरसों से मिल-जुलकर रहते आए हैं। गाँव में ब्राह्मण समाज की भी अच्छी आबादी है और मुहर्रम के मौक़े पर दोनों समाज के लोग एक-दूसरे का साथ निभाते हैं।

दसवीं मुहर्रम को मग़रिब से पहले तक ताज़ियादारी और गश्त का सिलसिला चलता है। लेकिन असली तैयारी तो नौ मुहर्रम की रात से ही शुरू हो जाती है।

रातभर जलते रहते हैं चूल्हे

जैसे ही रात गहराती है, लंगर की तैयारी शुरू हो जाती है।

बड़े-बड़े देग चढ़ाए जाते हैं। लकड़ी या गैस के चूल्हों पर दालचा पकने लगता है। दूसरी तरफ़ तंदूर में रोटियाँ पकाने का सिलसिला चलता रहता है।

गाँव के नौजवान, बुज़ुर्ग और कई ख़्वातीन अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी संभाल लेते हैं। कोई प्याज़ काटता है, कोई मसाले तैयार करता है, कोई आटा गूँधता है और कोई देग की निगरानी करता है।

पूरी रात यह काम बिना रुके चलता रहता है।

हर आने वाला मेहमान है

दसवीं मुहर्रम को दोपहर लगभग एक बजे के बाद लंगर तक़सीम करना शुरू हो जाता है।

हर शख़्स को एक प्याला दालचा और दो रोटियाँ दी जाती हैं। कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई अमीर-ग़रीब नहीं, हर फ़र्द बराबरी के साथ बैठकर खाना खाता है।

यहाँ न कोई टिकट है, न कोई दावत। जो भी आ जाए, वही मेहमान है।

जायरीन का भी इंतज़ार

मुहर्रम के जुलूस में शामिल होने वाले जायरीन, आस-पास के गाँवों से आने वाले लोग और मेहमान भी इस लंगर का हिस्सा बनते हैं।

बहुत से लोग हर साल सिर्फ़ इस रिवायत में शरीक होने के लिए दरौली पहुँचते हैं। उनके लिए यह सिर्फ़ खाना नहीं, बल्कि मोहब्बत और अपनापन महसूस करने का मौक़ा होता है।

ख़िदमत का जज़्बा

दरौली में लंगर की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि यहाँ ज़्यादातर काम ख़ुद गाँव वाले करते हैं।

कोई गोश्त देता है, कोई दाल, कोई आटा, कोई मसाले और कोई अपनी मेहनत। कई लोग नक़द मदद करते हैं, तो कई लोग पूरी रात जागकर ख़िदमत करते हैं।

यह लंगर चंद लोगों का नहीं, पूरे गाँव की मुश्तरका कोशिश बन जाता है।

सिर्फ़ खाना नहीं, दिल भी जुड़ते हैं

मुहर्रम के दिन जब एक ही सफ़ में अलग-अलग बिरादरी और मज़हब के लोग बैठकर खाना खाते हैं, तो यह मंज़र बताता है कि इंसानियत की ज़बान सबसे बड़ी ज़बान है।

यही वजह है कि दरौली का लंगर सिर्फ़ एक रस्म नहीं, बल्कि गाँव की पहचान बन चुका है।

नई नस्ल के लिए पैग़ाम 

आज जब समाज में छोटी-छोटी बातों पर दूरियाँ बढ़ती दिखाई देती हैं, तब दरौली का लंगर हमें याद दिलाता है कि मोहब्बत की शुरुआत एक निवाले से भी हो सकती है।

दो नान रोटियाँ और एक मिट्टी की प्याले में दालचा शायद देखने में बहुत मामूली लगें, लेकिन इन्हीं में सदियों पुरानी तहज़ीब, इंसानियत और भाईचारे का ज़ायका छिपा हुआ है।

दरौली का लंगर यह सिखाता है कि भूख का कोई मज़हब नहीं होता, और इंसानियत की सबसे बड़ी इबादत है, ज़रूरतमंद को इज़्ज़त के साथ खाना खिलाना।

क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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