उर्स-ए-सफ़वी : सफ़ीपुर शरीफ़ में रूहानियत, अकीदत और इंसानी भाईचारे का अज़ीम संगम

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  (रईस खान)

उन्नाव ज़िले के ऐतिहासिक कस्बे सफ़ीपुर शरीफ़ में इन दिनों हज़रत मख़दूम शाह सफ़ी रहमतुल्लाह अलैह का सालाना उर्स-ए-सफ़वी पूरे अकीदत व एहतराम के साथ जारी है। मुहर्रम की 18 तारीख़ से शुरू हुआ यह रूहानी इज्तिमा 20 मुहर्रम तक चलेगा, जिसमें उत्तर प्रदेश के अलावा दिल्ली, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और देश के दूसरे हिस्सों से बड़ी तादाद में ज़ायरीन दरगाह-ए-आलिया पर हाज़िरी देकर फ़ैज़ हासिल कर रहे हैं। दरगाह परिसर में हर तरफ़ इबादत, ज़िक्र, दुआ और मोहब्बत का ऐसा मंज़र दिखाई देता है, जहाँ मज़हब, जात और तबक़े की तमाम सरहदें ख़ुद-ब-ख़ुद मिटती नज़र आती हैं।

उर्स की शुरुआत मज़ार-ए-अक़दस पर फ़ातेहा, कुरआनख़्वानी और ग़ुस्ल-ए-मज़ार की रस्म से हुई। इसके बाद महफ़िल-ए-मीलाद, ज़िक्र-ओ-अज़कार, सूफ़ियाना तक़रीरों और दुआओं का सिलसिला जारी रहा। शाम ढलते ही महफ़िल-ए-समा में सूफ़ियाना कलाम और कव्वाली ने पूरे माहौल को रूहानियत से सराबोर कर दिया। बुज़ुर्गों की तालीमात, इश्क़-ए-इलाही और इंसानियत का पैग़ाम सुनकर अकीदतमंदों की आँखें नम होती रहीं और दिलों में मोहब्बत की रौशनी महसूस की गई।

उर्स के दौरान दरगाह पर आने वाले ज़ायरीन की सहूलियत के लिए ख़िदमत का बेहतरीन इंतज़ाम किया गया है। बज़्म-ए-सफ़विया और ख़ानक़ाह के ख़ादिम व वालंटियर पूरे एहतिमाम के साथ ज़ायरीन की रहनुमाई, लंगर, पानी, सफ़ाई और इंतज़ामात में मशग़ूल हैं। दिनभर लंगर-ए-आम का सिलसिला जारी रहता है, जहाँ हर आने वाले मेहमान की बिना किसी तफ़रीक़ के ख़िदमत की जाती है। यही सूफ़ी सिलसिलों की अस्ल रिवायत है कि इंसान की पहचान उसके मज़हब से नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत से होती है।

उर्स के मौक़े पर सज्जादा-नशीन हज़रत नवाज़िश मोहम्मद फ़ारूक़ी सफ़वी और हज़रत अफ़ज़ाल मोहम्मद फ़ारूक़ी सफ़वी की सरपरस्ती में विभिन्न रूहानी महफ़िलें आयोजित की जा रही हैं। उलमा-ए-किराम, मशायख़ और ख़ुतबा अपने बयानात में हज़रत मख़दूम शाह सफ़ी रहमतुल्लाह अलैह की ज़िंदगी, तालीमात और ख़िदमत-ए-ख़ल्क़ के पैग़ाम को बयान कर रहे हैं। तक़रीरों में इस बात पर ज़ोर दिया जा रहा है कि औलिया-ए-किराम ने हमेशा मोहब्बत, अमन, सब्र, अख़लाक़ और आपसी भाईचारे की तालीम दी, जिसकी आज के दौर में सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।

इस बार भी हर साल की तरह उर्स के पहले दिन मज़ार-ए-पाक पर बड़ी तादाद में ज़ायरीन ने हाज़िरी दी और महफ़िल-ए-समा में पेश किए गए सूफ़ियाना कलाम ने समां बाँध दिया। मशहूर कव्वालों ने अपने हमनवाओं के साथ इश्क़-ए-रसूल और औलिया-ए-किराम की शान में कलाम पेश किए, जिनसे पूरा माहौल रूहानी कैफ़ियत में डूब गया। महफ़िल के आख़िर में मुल्क की तरक़्क़ी, अमन-ओ-अमान, इंसानी भाईचारे और पूरी इंसानियत की ख़ैरियत के लिए ख़ुसूसी दुआ की गई।

सफ़ीपुर शरीफ़ की यह दरगाह सदियों से सिर्फ़ एक इबादतगाह नहीं, बल्कि मोहब्बत, इल्म और ख़िदमत का मरकज़ रही है। यही वजह है कि हर साल हज़ारों लोग यहाँ सिर्फ़ ज़ियारत के लिए नहीं, बल्कि दिली सुकून, रूहानी इत्मीनान और औलिया-ए-किराम की तालीमात से राब्ता क़ायम करने के लिए पहुँचते हैं। उर्स-ए-सफ़वी आज भी इस बात की ज़िंदा मिसाल है कि सूफ़ी परंपरा इंसानों को जोड़ने, नफ़रत मिटाने और मोहब्बत फैलाने का पैग़ाम देती है।

मुहर्रम की 20 तारीख़ को उर्स के इख़्तितामी मराहिल अदा किए जाएंगे। फ़ातेहा, कुल शरीफ़, ख़ुसूसी दुआ और सलाम के साथ यह सालाना रूहानी इज्तिमा अपने इख़्तिताम को पहुँचेगा, लेकिन हज़रत मख़दूम शाह सफ़ी रहमतुल्लाह अलैह की तालीमात, मोहब्बत, ख़िदमत, अमन और इंसानियत का पैग़ाम, ज़ायरीन के दिलों में हमेशा की तरह ज़िंदा रहेगा।

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