(रईस खान)
जनाजा फंड और समाज की इंसानियत
हिंदुस्तान समेत दुनिया के मुस्लिम समाज में जब कोई मय्यत होती है तो तदफीन का काम जल्द से जल्द पूरा किया जाता है। गुस्ल कफन और नमाजे जनाजा के बाद कब्र में दफनाने की रस्म में गरीब परिवारों को कई ट्रस्ट और संस्थाएं मदद पहुंचाती हैं। ये जनाजा फंड समाज की जिम्मेदारी को निभाते हैं ताकि कोई भी मय्यत बिना इज्जत के दफन न हो।
जनाजा फंड की पाबंदियां और शर्तें
जनाजा फंड की मदद ज्यादातर जकात के हकदार यानी सच्चे गरीब परिवारों तक ही सीमित रहती है। परिवार के पास खुद खर्च न हो या सोशल आइसोलेशन में हो जैसे अकेले बुजुर्ग स्टूडेंट या बिना फैमिली सपोर्ट वाले लोग। मुसलमान मय्यत के लिए ही ये मदद मिलती है। रिवर्ट नए मुसलमान या लावारिस शवों को भी प्राथमिकता दी जाती है। अप्लाई करने के लिए डेथ सर्टिफिकेट इनकम प्रूफ और जरूरत का सबूत देना पड़ता है। कुछ फंड में पहले मेंबर बनना जरूरी होता है और उम्र स्वास्थ्य की शर्तें लागू होती हैं। मदद लोकल इलाके तक सीमित रहती है और पूरा खर्च नहीं बल्कि जरूरी हिस्सा जैसे कफन या कब्र का खर्च ही मिलता है। देरी या गलत जानकारी देने पर मदद रुक सकती है।
दुनिया और हिंदुस्तान की मिसाल
यूनाइटेड किंगडम में मुस्लिम बुरियल फंड ने 2026 में कई मामलों में गुस्ल कफन और दफन का पूरा इंतजाम किया। जून दो हजार छब्बीस में ओमैमा सैदा और जुहैर तिबी की तदफीन में मदद की गई। अमेरिका में दार अल हिजराह इस्लामिक सेंटर का फ्यूनरल फंड रिफ्यूजी और कम आय वाले परिवारों की मदद करता है। एफएआईटीएच संगठन औसतन तीन हजार तीन सौ डॉलर प्रति बुरियल का सहारा देता है। हांगकांग की इंडियन मुस्लिम एसोसिएशन का जनाजा फंड मेंबरशिप के जरिए खर्च उठाता है।
हिंदुस्तान में महाराष्ट्र के सांगली शहर में मदनी चैरिटेबल ट्रस्ट गरीब परिवारों की मदद करता है। हाल ही में इसने पचास जरूरतमंद परिवारों को फल की गाड़ियां मुफ्त दीं। शिक्षा और वेलफेयर के साथ तदफीन में भी लोकल स्तर पर सहयोग करता है। नाइजीरिया की अंसारुल इस्लाम सोसाइटी बेवा और यतीमों के लिए इस्लामिक सोशल फाइनेंस चलाती है। हिदाया फाउंडेशन पाकिस्तान बांग्लादेश और भारत समेत कई देशों में पंद्रह हजार से ज्यादा यतीमों और सात हजार बेवाओं को मासिक मदद देता है। मुस्लिम एड जैसी बड़ी संस्थाएं खाना तालीम और आजीविका का सहारा देती हैं।
बेवा और यतीमों के लिए खास तवज्जो
इस्लाम में बेवा और यतीम अल्लाह के खास मेहमान हैं। पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि यतीम की परवरिश करने वाला जन्नत में मेरे साथ होगा। कुरान की सूरा अन निसा में इनके हकों की हिफाजत का हुक्म है। सदका खैरात और वक्फ के जरिए समाज इनकी देखभाल करता है। हिंदू समाज में भी अंत्येष्टि और श्राद्ध के बाद दान पुण्य से बेवा यतीम परिवारों को सहारा मिलता है।
समाज की जिम्मेदारी और अपील
ये फंड और ट्रस्ट सदका ए जारीया का नेक काम कर रहे हैं। हिंदुस्तान की मस्जिद कमिटियां और लोकल संस्थाएं रोजाना गरीबों की तदफीन का खर्च उठाती हैं। फिर भी फंड सीमित होने से सबकेस कवर नहीं हो पाते। मुसलमानों को चाहिए कि अपने इलाके में ऐसे प्रोग्राम मजबूत करें और खुद योगदान दें।

