ख़िराज-ए-अक़ीदत –तारीख़ का एक बड़ा सफ़ा बंद हो गया –प्रोफेसर सैय्यद ज़हीर हुसैन जाफ़री 

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  (रईस खान)

हिंदुस्तान के मशहूर इतिहासकार, दिल्ली यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष और मुग़ल व अवध की तारीख़ के बड़े दानिश्वर प्रोफेसर सैय्यद ज़हीर हुसैन जाफ़री साहब अब हमारे बीच नहीं रहे। 13 जुलाई 2026 को उनकी वफ़ात की ख़बर ने इल्मी दुनिया को गहरे ग़म में डाल दिया। उनका इंतिक़ाल सिर्फ़ एक शख़्स की मौत नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की तारीख़ी तहक़ीक़ के एक अहम दौर का ख़ात्मा है।

प्रोफेसर जाफ़री साहब उन गिने-चुने इतिहासकारों में थे, जिन्होंने किताबों में लिखी बातों पर ही भरोसा नहीं किया, बल्कि पुराने फ़ारसी दस्तावेज़ों, सरकारी रिकॉर्ड, ख़ानक़ाहों के रजिस्टर और ऐतिहासिक काग़ज़ात की गहरी पड़ताल कर इतिहास को नए अंदाज़ में समझाया। उनका मानना था कि असली तारीख़ वही है, जो दस्तावेज़ों और सबूतों पर खड़ी हो।

उन्होंने अपनी शुरुआती तालीम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से हासिल की। वहां उन्हें मशहूर इतिहासकार प्रोफेसर इरफ़ान हबीब जैसे बड़े उस्तादों की रहनुमाई मिली। यही वजह रही कि उनकी पूरी ज़िंदगी इल्म, रिसर्च और सच्चाई की तलाश में गुज़री।

अवध की तारीख़ पर उनका काम सबसे ज़्यादा मक़बूल माना जाता है। उन्होंने मुग़ल दौर से लेकर अंग्रेज़ी हुकूमत तक के बदलावों को बहुत गहराई से समझाया। ज़मींदारी, खेती, राजस्व व्यवस्था और आम लोगों की ज़िंदगी पर उनकी रिसर्च आज भी विश्वविद्यालयों में रेफ़रेंस के तौर पर पढ़ाई जाती है।

सूफ़ी ख़ानक़ाहों और उनके समाजी किरदार पर भी उन्होंने अहम काम किया। सलोन की मशहूर करीमिया नईमिया ख़ानक़ाह पर लिखी उनकी किताब को खूब सराहा गया और उसे दिल्ली उर्दू अकादमी का अवॉर्ड भी मिला। उन्होंने बताया कि सूफ़ी ख़ानक़ाहें सिर्फ़ इबादत की जगह नहीं थीं, बल्कि इल्म, समाजी ख़िदमत और इंसानी भाईचारे के बड़े मरकज़ भी थीं।

1857 की जंग-ए-आज़ादी पर उनकी तहक़ीक़ भी बहुत अहम मानी जाती है। उन्होंने मौलवी अहमदुल्लाह शाह फ़ैज़ाबादी जैसे उन बहादुर लोगों को फिर से सामने लाने की कोशिश की, जिनका ज़िक्र इतिहास की मुख्य किताबों में कम मिलता है। उनके लिए इतिहास सिर्फ़ बादशाहों की कहानी नहीं, बल्कि आम लोगों, किसानों, सूफ़ियों और गुमनाम नायकों की आवाज़ भी था।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर जाफ़री साहब एक बेहतरीन उस्ताद के रूप में जाने जाते थे। उनके शागिर्द बताते हैं कि वे रिसर्च में ईमानदारी, मेहनत और दस्तावेज़ी सबूतों पर सबसे ज़्यादा ज़ोर देते थे। उन्होंने कई नौजवान शोधकर्ताओं को तैयार किया, जो आज देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं।

वे इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस और यूपी हिस्ट्री कांग्रेस जैसे बड़े इल्मी मंचों से भी लंबे समय तक जुड़े रहे। उनकी क़ियादत में कई राष्ट्रीय सेमिनार और इतिहास सम्मेलन हुए, जिनसे नई रिसर्च को बढ़ावा मिला।

प्रोफेसर जाफ़री साहब की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि उन्होंने इतिहास को किसी मज़हब या सियासत का ज़रिया नहीं बनाया। उन्होंने हमेशा दस्तावेज़ों की ज़बान में बात की और हिंदुस्तान की साझा तहज़ीब, गंगा-जमुनी संस्कृति और इल्मी रिवायत को मज़बूत करने का काम किया।

आज जब इतिहास को लेकर तरह-तरह की बहसें हो रही हैं, ऐसे दौर में प्रोफेसर ज़हीर हुसैन जाफ़री जैसे विद्वानों की कमी और ज़्यादा महसूस होगी। उनकी किताबें, उनकी रिसर्च और उनके शागिर्द आने वाली नस्लों के लिए हमेशा एक रोशनी का काम करेंगे।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग के हेड (2007-2010) रह चुके प्रोफेसर जाफ़री साहब एक अच्छे उस्ताद, रिसर्च गाइड और संस्था निर्माणकर्ता थे। उनके शागिर्द उन्हें सख़्त मुनज़्ज़म, दस्तावेज़ी तहक़ीक़ सिखाने वाले और हमदर्द उस्ताद के तौर पर याद करते हैं।उनकी महत्वपूर्ण किताबों में इस्लामी राह: भारत में सूफ़ीवाद, राजनीति और समाज (संपादित) कालक्रम से परे: संस्थाओं और परिवारों की ‘पुनर्प्राप्ति’ इतिहास भारतीय इतिहास में क्षेत्र आदि शामिल हैं।

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