क्या सिर्फ़ मस्जिद, मदरसे और मुस्लिम संस्थान ही ग़ैर कानूनी हैं? सुधार का पैमाना सबके लिए एक जैसा होना चाहिए

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(रईस खान)

बेशक देश में कानून का राज सबसे ऊपर होना चाहिए। अगर किसी मस्जिद, मदरसे, स्कूल, कॉलेज या किसी भी इमारत में कानूनी कमी है, तो उसे कानून के दायरे में लाना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। इसमें किसी को ऐतराज़ नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल तब उठता है, जब कार्रवाई का तरीका और उसका दायरा एकतरफा दिखाई देने लगे।

ताज़ा मामला रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय का है जहां आनन फानन में 40 में से 38 बिल्डिंग तोड़ने का आदेश जारी हुआ है। इससे पहले हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में मस्जिदों, मदरसों और मुस्लिम संस्थानों को लेकर नोटिस, सर्वे और कार्रवाई की खबरें लगातार सामने आई हैं। कई जगह तहसील स्तर से लेकर जिला मुख्यालय तक बहुत तेज़ी से आदेश जारी किए जा रहे हैं। इससे आम लोगों के मन में यह सवाल पैदा होना स्वाभाविक है कि क्या देश के हर अवैध निर्माण, हर नियम उल्लंघन और हर संस्थान के मामले में प्रशासन इतनी ही तेजी दिखाता है?

अगर किसी संस्थान का नक्शा पास नहीं है या कोई कानूनी प्रक्रिया अधूरी है, तो यह समस्या केवल मुस्लिम संस्थानों तक सीमित नहीं हो सकती। देश में हजारों निजी स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, धार्मिक स्थल और व्यावसायिक इमारतें हैं। क्या सरकार ने कभी पूरे देश का श्वेत पत्र जारी करके बताया कि कितने संस्थान पूरी तरह नियमों के अनुरूप हैं और कितनों में कमियां हैं?

जरूरत इस बात की है कि कानून का इस्तेमाल बिना किसी भेदभाव के हो। अगर सुधार करना है, तो सभी संस्थानों के लिए एक समान नीति बने। जहां कमी हो, वहां पहले सुधार का अवसर दिया जाए। अगर उसके बाद भी नियमों का पालन न हो, तब कानूनी कार्रवाई की जाए। यही लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण तरीका माना जाता है।

शिक्षा किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होती है। मुस्लिम समाज लंबे समय से शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ने की चुनौती से जूझ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है और कई स्थानों पर नए स्कूल, कॉलेज और शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने की कोशिशें हो रही हैं। ऐसे माहौल में यदि लगातार भय और असुरक्षा का वातावरण बनेगा, तो इसका असर उन परिवारों पर पड़ेगा जो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं।

यह भी सच है कि किसी भी समाज में कानून से ऊपर कोई नहीं है। लेकिन कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि व्यवस्था और सुधार लाना भी होता है। यदि किसी संस्थान में प्रशासनिक या तकनीकी कमी है, तो उसका समाधान संवाद, समयबद्ध सुधार और पारदर्शी प्रक्रिया से भी निकाला जा सकता है।

लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि नागरिकों को अदालतों में अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। यदि किसी कार्रवाई को लोग अनुचित मानते हैं, तो उसका फैसला अदालतों और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से होना चाहिए। यही संविधान का रास्ता है और यही देश की ताकत भी।

सरकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सभी समुदायों के लिए समान नीति अपनाए, पारदर्शी आंकड़े सार्वजनिक करे और ऐसा माहौल बनाए जिसमें शिक्षा, विकास और सामाजिक विश्वास मजबूत हो। समाज को आगे बढ़ाने का रास्ता डर नहीं, बल्कि न्याय, समान अवसर और भरोसे से होकर गुजरता है।

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