(रईस खान)
मुंबई। क़ौमी फ़रमान की टीम ने मुंबई सीएसटी स्थित अंजुमन-ए-इस्लाम के मुख्यालय में संस्था के प्रेसिडेंट डॉ. ज़हीर काज़ी और वाइस प्रेसिडेंट डॉ. शेख़ अब्दुल्लाह से एक घंटे से अधिक समय तक विस्तार से बातचीत की। इस दौरान शिक्षा, रोजगार, आधुनिक तकनीक, मीडिया और समाज में जागरूकता जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर खुलकर चर्चा हुई।
डॉ. ज़हीर काज़ी ने बताया कि अंजुमन-ए-इस्लाम आज लगभग 98 स्कूल, कॉलेज और अन्य शैक्षणिक संस्थान संचालित कर रहा है, जिनमें करीब एक लाख विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि संस्था का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि समाज के हर तबके तक अच्छी और सस्ती शिक्षा पहुँचाना है।
उन्होंने बताया कि मुंबई और महाराष्ट्र के अंजुमन-ए-इस्लाम के स्कूलों और कॉलेजों में दाखिला लेने वाले लगभग 60 से 70 प्रतिशत छात्र उत्तर प्रदेश और बिहार से जुड़े परिवारों के हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि इन राज्यों के लोग शिक्षा के महत्व को समझ रहे हैं और अपने बच्चों को बेहतर संस्थानों तक भेज रहे हैं।
डॉ. काज़ी ने कहा कि अब समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक नेतृत्व को भी बड़े स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने की दिशा में गंभीर पहल करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि समाज मिलकर आगे आए तो अंजुमन-ए-इस्लाम जैसे संस्थान अपना अनुभव और हर संभव सहयोग देने के लिए तैयार हैं।
उन्होंने उत्तर प्रदेश के बाराबंकी स्थित जहांगीराबाद इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी का भी उल्लेख करते हुए कहा कि संस्था वहाँ भी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने की दिशा में प्रयास कर रही है। यदि सभी आवश्यक प्रक्रियाएँ पूरी हो जाती हैं, तो भविष्य में वहाँ भी समाज को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने की कोशिश की जाएगी।
डॉ. ज़हीर काज़ी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अंजुमन-ए-इस्लाम एक चैरिटेबल संस्था है। संस्था का उद्देश्य व्यावसायिक लाभ कमाना नहीं, बल्कि गरीब और जरूरतमंद बच्चों तक अच्छी शिक्षा पहुँचाना है। उन्होंने कहा कि शिक्षा सेवा का माध्यम है और इसी सोच के साथ संस्था पिछले कई दशकों से काम कर रही है।
उन्होंने यह भी जानकारी दी कि संस्था मुंबई के आसपास लगभग 15 से 20 एकड़ क्षेत्र में करीब 700 करोड़ रुपये की लागत से आधुनिक मेडिकल और हेल्थकेयर परियोजना विकसित करने की योजना पर काम कर रही है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं के साथ मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में भी नई संभावनाएँ पैदा होंगी।
वाइस प्रेसिडेंट डॉ. शेख़ अब्दुल्लाह ने क़ौमी फ़रमान के साथ मिलकर मीडिया, शिक्षा, जनजागरूकता और कम्युनिकेशन के क्षेत्र में एक दीर्घकालिक कार्यक्रम चलाने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि छात्रों और शिक्षकों तक हर महीने नई और उपयोगी जानकारी पहुँचाई जानी चाहिए, ताकि वे बदलती दुनिया की ज़रूरतों से जुड़े रहें।
उन्होंने कहा कि आज केवल पारंपरिक शिक्षा पर्याप्त नहीं है। छात्रों को रोजगार, कारोबार, आधुनिक तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मीडिया और नए कौशल से भी जोड़ना होगा। यही आने वाले समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
डॉ. ज़हीर काज़ी ने कहा कि यह धारणा अब बदल रही है कि मुस्लिम समाज शिक्षा में पीछे है। उन्होंने विश्वास जताया कि आज समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ी है। बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रहे हैं। यहाँ तक कि जो लोग दिन में नौकरी या कारोबार करते हैं, वे भी नाइट क्लासों के माध्यम से अपनी पढ़ाई जारी रख रहे हैं।
हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि अभी समाज को एक बात और समझनी होगी कि शिक्षा पर खर्च किया गया पैसा सबसे बड़ा निवेश होता है। यदि परिवार अपनी आमदनी का एक हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर नियमित रूप से खर्च करें, तो आने वाली पीढ़ियाँ कहीं अधिक मजबूत बन सकती हैं।
डॉ. शेख़ अब्दुल्लाह ने अंत में समाज के सभी वर्गों से अपील करते हुए कहा कि शिक्षा को एक सामाजिक आंदोलन बनाया जाए। उन्होंने कहा कि जब तक समाज सामूहिक रूप से शिक्षा, जागरूकता और कौशल विकास के लिए आगे नहीं आएगा, तब तक अपेक्षित बदलाव संभव नहीं होगा।
उन्होंने कहा, “तालीम ही वह रास्ता है जो समाज को तरक्की, आत्मनिर्भरता और सम्मान दिला सकता है। अगर हम सब मिलकर शिक्षा का आंदोलन खड़ा करें, तो आने वाला दौर हमारी नई पीढ़ी का होगा।
क़ौमी फ़रमान से बातचीत के दौरान दोनों शिक्षाविदों ने इस बात पर सहमति जताई कि मीडिया, शिक्षा और समाज के बीच मजबूत संवाद स्थापित करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। आने वाले दिनों में इस दिशा में साझा पहल की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा।

