मैं तुम्हारी तरह इंसान हूँ, लेकिन मुझ पर वही आती है

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             (मौलाना उबैदुल्ला खान आज़मी)

सूरह अल-कहफ़ की आख़िरी आयत में अल्लाह तआला अपने महबूब नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ से फ़रमाता है:

“तुम फ़रमा दो: मैं तुम्हारी तरह एक इंसान हूँ, मेरी तरफ़ वही की जाती है कि तुम्हारा माबूद सिर्फ़ एक ही माबूद है। तो जो अपने रब से मिलने की उम्मीद रखता है, उसे चाहिए कि नेक अमल करे और अपने रब की इबादत में किसी को शरीक न करे।”
(सूरह अल-कहफ़: 110)

इस आयत में एक तरफ़ नबी ﷺ की बशरियत बयान हुई है और दूसरी तरफ़ उनकी रिसालत और वही का साफ़ ऐलान किया गया है।

बशर हैं, मगर आम इंसान नहीं

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से इस आयत की तफ़सीर के बारे में मन्क़ूल है कि अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को आज़िज़ी और विनम्रता का तरीक़ा सिखाया कि आप फ़रमाएँ: मैं भी तुम्हारी तरह इंसान हूँ। लेकिन एक बहुत बड़ा फ़र्क़ यह है कि मेरी तरफ़ वही आती है।

यानी ज़ाहिरी तौर पर नबी ﷺ इंसानों की तरह खाते, पीते, आराम फ़रमाते और लोगों के साथ रहते थे, लेकिन आप ﷺ पर अल्लाह की वही आती थी और इसी वही ने आपको पूरी इंसानियत का रहनुमा और रसूल बनाया।

इसलिए सिर्फ़ “मैं इंसान हूँ” कहना पूरी बात नहीं है। आयत में इसके तुरंत बाद “मुझ पर वही आती है” भी फ़रमाया गया है। यही दोनों बातें मिलकर नबी ﷺ की सही पहचान बताती हैं।

कुफ़्फ़ार की गलती क्या थी?

क़ुरआन बताता है कि पहले के नबियों को भी उनकी क़ौमों ने यह कहकर झुठलाया कि:

“तुम तो हमारे जैसे इंसान हो।”
(सूरह यासीन: 15)

उन लोगों ने नबी की बशरियत को देखा, लेकिन रिसालत और वही को नहीं माना।

इससे यह बात समझ आती है कि नबी ﷺ की बशरियत को मानना सही है, लेकिन उन्हें आम इंसानों जैसा समझ लेना सही नहीं। आप ﷺ इंसान और अल्लाह के बंदे हैं, मगर अल्लाह के चुने हुए रसूल हैं।

नबी ﷺ की शान में दो तरह की हद से बचना

फ़तावा रज़विया में इस बात को बहुत खूबसूरती से समझाया गया है कि नबी ﷺ की शान के बारे में दो तरह की ग़लती हो सकती है।

एक तरफ़ कोई नबी को इतना बढ़ा दे कि उन्हें अल्लाह का दर्जा देने लगे। दूसरी तरफ़ कोई उनकी बशरियत देखकर उनकी वह ख़ास शान ही भूल जाए जो अल्लाह ने उन्हें अता की है।

इसलिए कलिमा-ए-शहादत में दोनों बातें एक साथ आई हैं:

“अश्हदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू।”

यानी मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद ﷺ अल्लाह के बंदे और उसके रसूल हैं।

यहाँ “बंदे” कहना इस बात को साफ़ करता है कि आप ﷺ अल्लाह नहीं हैं, और “रसूल” कहना यह बताता है कि आप ﷺ कोई आम इंसान नहीं बल्कि अल्लाह के भेजे हुए पैग़म्बर हैं।

इसीलिए आसान लफ़्ज़ों में कहा जा सकता है:

बंदे हैं, ख़ुदा नहीं; रसूल हैं, मगर ख़ुदा से जुदा नहीं।

आप ﷺ का खाना-पीना और आराम करना

यह भी समझाया गया है कि नबी ﷺ का खाना, पीना, सोना और दूसरे इंसानी काम करना आपकी इंसानियत की निशानी हैं, लेकिन इन कामों का मतलब यह नहीं कि आप ﷺ आम लोगों की तरह हर चीज़ के मोहताज थे।

हदीस में आता है:

“मैं तुम लोगों जैसा नहीं हूँ; मैं अपने रब के पास रात गुज़ारता हूँ, वह मुझे खिलाता और पिलाता है।”

इसी तरह नबी ﷺ की ज़िंदगी का हर पहलू उम्मत के लिए रहनुमाई का ज़रिया था। आपके खाने-पीने, सोने, उठने-बैठने और दूसरे कामों से भी उम्मत को सुन्नत का तरीक़ा मिला।

इस आयत का असल पैग़ाम

इस आयत का मक़सद सिर्फ़ नबी ﷺ की बशरियत बताना नहीं, बल्कि इंसान को अपनी ज़िंदगी का रास्ता बताना भी है।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जो शख़्स अपने रब से मिलने की उम्मीद रखता है, उसे दो काम करने चाहिए:

पहला, नेक अमल करे। दूसरा, इबादत में किसी को अल्लाह का शरीक न बनाए।

यानी सिर्फ़ नबी ﷺ से मोहब्बत का दावा काफी नहीं; उस मोहब्बत का असर हमारे अमल, अख़लाक़ और ज़िंदगी के तरीक़े में भी दिखाई देना चाहिए।

नबी ﷺ की पहचान

इस पूरी बात का ख़ुलासा यही है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ अल्लाह के बंदे भी हैं और उसके सबसे अज़ीम रसूल भी।

आप ﷺ की बशरियत हमें अपने क़रीब करती है और आपकी रिसालत हमें अल्लाह तक पहुँचने का रास्ता दिखाती है। इसलिए न आपको अल्लाह का दर्जा देना सही है और न आपकी रिसालत और बुलंद शान को आम इंसान की तरह समझना।

आप ﷺ बंदे हैं, ख़ुदा नहीं,
आप ﷺ रसूल हैं, मगर अल्लाह के सबसे प्यारे रसूल।

और आपकी ज़िंदगी हमारे लिए सिर्फ़ पढ़ने की चीज़ नहीं, बल्कि सीखने और अमल करने का रास्ता है।

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