लखनऊ, 24 अगस्त 2026। इंसान की सेहत सिर्फ अस्पताल और दवाओं तक सीमित नहीं है। इंसान, जानवर और हमारे आसपास का माहौल, तीनों की सेहत एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। इसी सोच को सामने रखते हुए इंटीग्रल यूनिवर्सिटी, लखनऊ में “वन हेल्थ: इंटीग्रेटिंग स्ट्रैटेजीज टू कॉम्बैट एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस” विषय पर एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई।
संगोष्ठी का मुख्य मकसद एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी एएमआर जैसी तेजी से बढ़ती समस्या पर वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के बीच गंभीर बातचीत करना था। एएमआर उस स्थिति को कहा जाता है जब बैक्टीरिया और दूसरे रोगाणु दवाओं के असर को बेअसर करना शुरू कर देते हैं। ऐसी स्थिति में आम संक्रमण का इलाज भी मुश्किल हो सकता है।
कार्यक्रम इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के जैव विज्ञान विभाग और इंटरडिसिप्लिनरी सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च की ओर से आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय के संस्थापक और कुलाधिपति प्रो. सैयद वसीम अख्तर के मार्गदर्शन में हुए इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम की शुरुआत शोध एवं विकास संकाय के डीन प्रो. वहाज उल हक के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने कहा कि एएमआर जैसी बड़ी चुनौती का मुकाबला किसी एक विभाग या एक देश के लिए अकेले करना आसान नहीं है। इसके लिए अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञों को साथ आकर काम करना होगा।
विज्ञान संकाय के डीन और परीक्षा नियंत्रक प्रो. अब्दुल रहमान ने भी कार्यक्रम में हिस्सा लिया। उन्होंने “एक दुनिया, एक सेहत, एक भविष्य” की सोच को आज के दौर में बेहद जरूरी बताया और विद्यार्थियों को विशेषज्ञों से मिलने वाली जानकारी को गंभीरता से समझने की अपील की।
दुनिया भर के विशेषज्ञों ने रखी अपनी बात
संगोष्ठी में अमेरिका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के सिविल एवं पर्यावरण अभियांत्रिकी विभाग के प्रो. सैयद ए. हाशशाम ने मेटाजीनोमिक्स के जरिए सूक्ष्मजीवों की दुनिया और उनके कामकाज पर रोशनी डाली। उन्होंने एएमआर के साथ-साथ विटामिन बी12 और हाइड्रोजन मेटाबॉलिज्म जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी जानकारी दी।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की इंटरडिसिप्लिनरी बायोटेक्नोलॉजी यूनिट के प्रो. असद यू. खान ने कहा कि एएमआर को सिर्फ एक खतरे के रूप में देखने के बजाय संक्रमण को रोकने और इलाज के नए तरीके तलाशने की जरूरत है।
वहीं आईआईटी कानपुर के प्रो. सरवनन मथेश्वरन ने दवा-रोधी टीबी से मुकाबले के लिए माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के एसओएस रिस्पॉन्स को निशाना बनाने वाली नई वैज्ञानिक और इलाज से जुड़ी संभावनाओं पर बात की।
शोधार्थियों को भी मिला मंच
संगोष्ठी की एक खास बात यह रही कि सिर्फ बड़े वैज्ञानिकों तक कार्यक्रम सीमित नहीं रहा। शोधार्थियों और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों ने भी अपनी रिसर्च को छोटी-छोटी फ्लैश प्रेजेंटेशन के जरिए पेश किया। इससे युवा शोधकर्ताओं को अपने काम को विशेषज्ञों के सामने रखने और नए विचारों पर बातचीत करने का मौका मिला।
कार्यक्रम में एएमआर की निगरानी, संक्रमण पर काबू, नई रोगाणुरोधी दवाओं की तलाश, दवाओं के सही इस्तेमाल और पर्यावरण में फैल रहे दवा-प्रतिरोध जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
इंसान ही नहीं, जानवर और पर्यावरण भी जरूरी
संगोष्ठी का सबसे अहम संदेश यही रहा कि इंसान की सेहत को अकेले नहीं देखा जा सकता। अगर जानवरों में संक्रमण बढ़ता है, पानी और मिट्टी में खतरनाक रोगाणु फैलते हैं या दवाओं का गलत इस्तेमाल होता है, तो उसका असर आखिरकार इंसानों तक भी पहुंच सकता है।
इसीलिए डॉक्टरों, पशु चिकित्सकों, पर्यावरण विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और नीति बनाने वालों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। वन हेल्थ का यही मूल विचार है, इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत को एक साथ देखकर समाधान तलाशना।
संगोष्ठी में संयुक्त राष्ट्र के कई सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान दिया गया, जिनमें बेहतर स्वास्थ्य, अच्छी शिक्षा, साफ पानी और स्वच्छता, जिम्मेदार उत्पादन, जलवायु संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्रमुख हैं।
कार्यक्रम की संयोजक जैव विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. स्नोबर एस. मीर रहीं। डॉ. शाहपर एन. खान और डॉ. मोहम्मद आमिर कुरैशी ने आयोजन सचिव की जिम्मेदारी निभाई।
संगोष्ठी का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि एएमआर जैसी चुनौती का सामना सिर्फ नई दवाओं से नहीं किया जा सकता। इसके लिए सही जानकारी, दवाओं का जिम्मेदार इस्तेमाल, बेहतर संक्रमण नियंत्रण और अलग-अलग क्षेत्रों के बीच लगातार सहयोग जरूरी है।
यानी आने वाले समय की साफ तस्वीर यही है, एक दुनिया, एक सेहत और एक साझा भविष्य।
-क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

