(प्रो. मुहम्मद अब्दुल दायम अल-जेंडी)
नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की विलादत की याद मनाने यानी मिलादुन्नबी ﷺ के सिलसिले में अलग-अलग दौर में कई सवाल उठाए जाते रहे हैं। क्या मिलाद मनाना दीन में नई और गलत चीज़ है? क्या हर नई चीज़ गुमराही है? अगर मिलाद की किसी महफ़िल में कोई गलत काम हो जाए तो क्या पूरी महफ़िल को गलत कहा जा सकता है? और क्या अल-अज़हर के उलेमा ने इस विषय पर किताबें लिखी हैं?
इन सवालों का जवाब देते हुए अल-अज़हर इस्लामिक रिसर्च अकादमी के सेक्रेटरी जनरल प्रो. मुहम्मद अब्दुल दायम अल-जेंडी ने मिलादुन्नबी ﷺ के बारे में चार अहम बातों को सामने रखा है।
पहला सवाल: क्या मिलाद मनाना गलत बिदअत है?
प्रो. अल-जेंडी के मुताबिक मिलादुन्नबी ﷺ को ऐसी बिदअत कहना सही नहीं है, जो दीन में गलत तरीके से नई चीज़ शामिल करने के मायने में हो।
उन्होंने बताया कि बिदअत के दो तरह के मायने समझे जाते हैं। एक मायने में बिदअत का मतलब है ऐसी नई चीज़ जो पहले मौजूद नहीं थी। दूसरी बिदअत वह है जो शरीअत के तय किए हुए उसूलों के खिलाफ हो और दीन में ऐसी बात शामिल कर दे जिसका कोई सही आधार न हो।
मिलादुन्नबी ﷺ के बारे में उनका कहना है कि अगर महफ़िल में कुरआन की तिलावत, अल्लाह का ज़िक्र, नबी ﷺ पर दरूद-ओ-सलाम, आपकी सीरत का बयान, गरीबों को खाना खिलाना, सदका करना और आपकी विलादत पर खुशी का इज़हार किया जाए, तो ये सभी ऐसे काम हैं जिनकी शरीअत में अपनी जगह अहमियत है।
इसलिए इन अच्छे कामों को एक जगह जमा करके नबी ﷺ की विलादत की याद मनाने को गलत बिदअत नहीं कहा जा सकता।
हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और रोज़ा-ए-आशूरा की मिसाल
लेख में इसके लिए रोज़ा-ए-आशूरा की मिसाल भी दी गई है।
जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और बनी इसराईल को अल्लाह ने फ़िरऔन से निजात दी, तो उस नेमत के शुक्र के तौर पर आशूरा के दिन रोज़ा रखने की बात सामने आई।
इसी तरह नबी-ए-करीम ﷺ सोमवार के दिन रोज़ा रखते थे और इसकी एक वजह यह बताई कि यह वह दिन है जिस दिन आपकी पैदाइश हुई।
इससे यह बात समझ में आती है कि अल्लाह की किसी बड़ी नेमत के मिलने पर उसके लिए शुक्र और खुशी का इज़हार करना जायज़ है।
इमाम सुयूती समेत कई उलेमा ने भी मिलाद की ऐसी महफ़िल को बिदअते हसना, यानी अच्छी और पसंदीदा नई रिवायत, कहा है जिसमें लोग जमा हों, कुरआन पढ़ें, नबी ﷺ की सीरत और विलादत का ज़िक्र करें और लोगों को खाना खिलाएं।
दूसरा सवाल: “हर बिदअत गुमराही है” तो फिर मिलाद कैसे जायज़ हुआ?
इस सवाल के जवाब में प्रो. अल-जेंडी कहते हैं कि हदीस में आने वाले “हर बिदअत गुमराही है” के मतलब को समझने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि किस तरह की नई चीज़ की बात हो रही है।
वह नई चीज़ जो कुरआन, सुन्नत, इज्मा या शरीअत के तय उसूलों के खिलाफ हो, वह गलत बिदअत है।
लेकिन अगर कोई नया तरीका ऐसा हो जो इस्लाम के बुनियादी उसूलों के खिलाफ न हो और उसमें अच्छे काम किए जाएं, तो उसे उसी तरह की गुमराह करने वाली बिदअत नहीं कहा जा सकता।
इसके लिए उन्होंने उस हदीस का भी हवाला दिया जिसमें इस्लाम में अच्छी रिवायत शुरू करने की बात आती है।
इमाम शाफई और दूसरे उलेमा से भी ऐसी ही बात नक्ल की गई है कि हर नई चीज़ एक जैसी नहीं होती। जो शरीअत के खिलाफ हो वह गलत है, जबकि जो अच्छाई और दीन के सही उसूलों के मुताबिक हो, उसे उसी नजर से नहीं देखा जा सकता।
तीसरा सवाल: अगर कुछ मिलाद की महफ़िलों में गलत काम होते हैं तो क्या मिलाद ही बंद कर दिया जाए?
प्रो. अल-जेंडी इस सवाल का जवाब भी साफ़ तौर पर देते हैं कि किसी महफ़िल में होने वाली गलती की वजह से पूरी मिलाद की महफ़िल को गलत ठहराना सही तरीका नहीं है।
अगर किसी जगह मिलाद के दौरान कोई ऐसा काम किया जाता है जो शरीअत के खिलाफ है, तो उस खास गलत काम की इस्लाह और रोकथाम की जानी चाहिए।
लेकिन किसी गलत अमल की वजह से उन तमाम अच्छे कामों को भी गलत नहीं कहा जा सकता जो मिलाद की महफ़िल में किए जाते हैं।
यानी गलती जहां हो, वहां उसकी निशानदेही की जाए और उसे दूर किया जाए, लेकिन इसकी वजह से पूरी मिलाद की याद को ही गलत करार न दिया जाए।
चौथा सवाल: क्या अल-अज़हर के उलेमा ने मिलाद पर किताबें लिखी हैं?
प्रो. अल-जेंडी ने बताया कि अल-अज़हर के उलेमा ने नबी-ए-करीम ﷺ की विलादत और मिलाद के विषय पर कई किताबें लिखी हैं।
इनमें कई पुरानी और मशहूर किताबें शामिल हैं, जैसे:
ग़ायतुस्सूल फ़ी मौलिदिर्रसूल
उर्फ़ुत-तारीफ़ बिल-मौलिदिश्शरीफ़
मौलिदुन्नबी ﷺ इब्ने दैबा और ख़तीब शिरबीनी
बहजतुस्सामेईन वन-नाज़िरीन बिमौलिदि सय्यिदिल-अव्वलीन वल-आखिरीन
इन किताबों का ज़िक्र करते हुए अल-जेंडी यह बताना चाहते हैं कि नबी-ए-करीम ﷺ की विलादत की याद और आपकी सीरत के बयान का विषय इस्लामी इल्मी विरासत में पुराना और जाना-पहचाना विषय रहा है।
मिलाद का असल मकसद क्या है?
इस पूरे लेख का बुनियादी संदेश यह है कि मिलादुन्नबी ﷺ को सिर्फ एक रस्म के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
अगर ऐसी महफ़िल में कुरआन पढ़ा जाए, अल्लाह का ज़िक्र हो, नबी ﷺ पर दरूद-ओ-सलाम भेजा जाए, आपकी सीरत और अख़लाक का बयान हो, गरीबों की मदद की जाए और लोगों में मोहब्बत व नेकी का जज़्बा पैदा किया जाए, तो यह उन अच्छे कामों का मजमूआ है जिन्हें इस्लाम ने अलग-अलग रूप में पसंद किया है।
साथ ही, जहां कोई ऐसा काम हो जो शरीअत के खिलाफ हो, उसे छोड़ना और उसकी इस्लाह करना जरूरी है।
इस तरह मिलाद की महफ़िल का असल मकसद नबी-ए-करीम ﷺ की विलादत पर खुशी का इज़हार, आपकी सीरत को याद करना, आपसे मोहब्बत बढ़ाना और आपकी तालीमात को अपनी जिंदगी में लाना होना चाहिए।
(लेखक सेक्रेटरी जनरल, अल-अज़हर इस्लामिक रिसर्च अकादमी
अल-अज़हर मैगज़ीन, अंक 100 (3), रबीउल अव्वल 1448 हिजरी / अगस्त-सितंबर 2026)

