एक कुर्सी, कुछ किताबें और बड़ा सपना

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लाइब्रेरी में रातें, गुरुद्वारे का लंगर और यूपीएससी अफसर बनने का जुनून

(आरिफा सिद्दीक़ी)

दिल्ली के मुखर्जी नगर में देशभर से हजारों युवा एक सपना लेकर आते हैं, यूपीएससी की परीक्षा पास करना और देश की प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बनना। किसी के पास अच्छी कोचिंग होती है, किसी के पास आरामदायक कमरा और हर सुविधा। लेकिन इसी भीड़ में एक ऐसा युवा भी है, जिसके पास न अपना कमरा है, न महंगी कोचिंग और न ही भरपेट भोजन की कोई पक्की व्यवस्था।

यह कहानी है बिहार के दरभंगा से दिल्ली आए 24 वर्षीय मोहम्मद मीनाज की।

मीनाज की कहानी इन दिनों सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्टों के जरिए लोगों तक पहुंची है। उनकी जिंदगी का संघर्ष जितना कठिन है, उससे कहीं ज्यादा मजबूत उनका हौसला दिखाई देता है।

किराए का कमरा नहीं मिला तो लाइब्रेरी ही घर बन गई

मीनाज वर्ष 2025 में यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली आए। मुखर्जी नगर में पढ़ाई के लिए जगह तो मिल गई, लेकिन रहने के लिए कमरा लेना उनके लिए आसान नहीं था। किराया उनकी आर्थिक क्षमता से बाहर था।

उन्होंने हार नहीं मानी।

जिस 24 घंटे खुली लाइब्रेरी में वे पढ़ने जाते थे, वही धीरे-धीरे उनका आशियाना बन गई।

हर महीने करीब 1,100 से 1,200 रुपये देकर वे लाइब्रेरी की फीस भरते हैं। दिन में उसी कुर्सी पर बैठकर किताबें पढ़ते हैं और रात होने पर वहीं सो जाते हैं। कभी हाथों को मेज पर रखकर सिर टिक जाता है तो कभी पैरों को दूसरी कुर्सी पर रखकर कुछ घंटे नींद पूरी कर लेते हैं।

उनके पास कपड़ों और जरूरी सामान का छोटा-सा सामान है, जिसे उन्होंने लाइब्रेरी के एक लॉकर में रखा हुआ है।

एक कमरा, एक बिस्तर और घर की दूसरी सुविधाओं की जगह उनके पास है, एक कुर्सी, एक मेज और किताबें।

दिन का एक खाना और करीब 10 किलोमीटर का सफर

मीनाज की जिंदगी की मुश्किल सिर्फ रहने तक सीमित नहीं है। खाने और नहाने जैसी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता है।

रिपोर्टों के मुताबिक, वे लाइब्रेरी से करीब 10 किलोमीटर दूर मजनू का टीला स्थित गुरुद्वारे जाते हैं। वहीं नहाने की सुविधा का इस्तेमाल करते हैं और गुरुद्वारे के लंगर में भोजन करते हैं।

आने-जाने के किराए और सीमित पैसों को देखते हुए वे अक्सर दिन में सिर्फ एक बार ही भरपेट खाना खाते हैं।

एक इंटरव्यू में उन्होंने भावुक होकर बताया कि लंबे समय बाद उन्होंने भरपेट पूरी-सब्जी खाई।

यह बात सुनने में छोटी लग सकती है, लेकिन उस युवा के लिए यह उस दिन की सबसे बड़ी राहत थी, जो अपने सपने के लिए अपनी बुनियादी जरूरतों तक को सीमित कर चुका है।

करीब 3,000 रुपये में पूरी जिंदगी चलाने की कोशिश

मीनाज किसी से आर्थिक मदद मांगकर अपनी पढ़ाई नहीं चला रहे हैं। वे एक मोबाइल ऐप के माध्यम से लोगों के बैंक खाते खुलवाने में मदद करते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, एक सफल अकाउंट खुलवाने पर उन्हें करीब 300 से 400 रुपये मिलते हैं।

इसी छोटी-सी कमाई से वे अपना भोजन, आने-जाने और पढ़ाई से जुड़े दूसरे खर्च निकालने की कोशिश करते हैं।

महंगी कोचिंग उनके लिए संभव नहीं है। इसलिए वे सेल्फ स्टडी कर रहे हैं। पुराने प्रश्नपत्रों और उपलब्ध अध्ययन सामग्री के सहारे वे यूपीएससी की तैयारी में जुटे हैं।

उनकी जिंदगी में शायद सुविधाएं कम हैं, लेकिन लक्ष्य बिल्कुल साफ है।

बूढ़े मां-बाप को नहीं बताई अपनी तकलीफ

दरभंगा में मीनाज के माता-पिता रहते हैं। उनकी उम्र लगभग 70 से 75 वर्ष के आसपास बताई जाती है। उनके पिता मधुमेह से भी पीड़ित हैं।

मीनाज अपने माता-पिता को अपनी असली परिस्थितियों के बारे में नहीं बताते।

जब घर फोन करते हैं तो कोशिश करते हैं कि उनकी आवाज में परेशानी महसूस न हो। वे अपने माता-पिता से यही कहते हैं कि पढ़ाई अच्छी चल रही है और सब ठीक है।

उनका डर है कि अगर मां-बाप को यह पता चल गया कि उनका बेटा न कमरे में रहता है और न ही रोज भरपेट खाना खाता है, तो वे चिंता में टूट जाएंगे।

मीनाज की सबसे बड़ी इच्छा है कि उनके माता-पिता स्वस्थ और लंबी उम्र तक जिएं और अपनी आंखों से अपने बेटे को एक दिन अधिकारी बनते देखें।

सिर्फ नौकरी नहीं, लोगों के काम आना चाहते हैं

मीनाज का सपना केवल सरकारी नौकरी हासिल करना नहीं है।

वे कहते हैं कि उनके गांव और आसपास के इलाकों में बहुत से गरीब और जरूरतमंद लोग सरकारी योजनाओं और अपने अधिकारों की जानकारी न होने के कारण उनका लाभ नहीं उठा पाते।

यही वजह है कि वे यूपीएससी पास करके प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहते हैं। उनका मकसद है कि भविष्य में वे जमीन पर जाकर ऐसे लोगों की मदद कर सकें, जिन्हें सरकारी व्यवस्था तक पहुंचने में परेशानी होती है।

उनके लिए अधिकारी बनना सिर्फ एक पद हासिल करना नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी में बदलाव लाने का जरिया है।

संघर्ष बड़ा है, लेकिन सपना उससे भी बड़ा

मीनाज की कहानी सिर्फ गरीबी या मुश्किल हालात की कहानी नहीं है। यह उस जिद की कहानी भी है जो इंसान को परिस्थितियों के सामने झुकने नहीं देती।

एक तरफ दिल्ली जैसे महंगे शहर में रहने का संघर्ष है। दूसरी तरफ यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा की तैयारी। बीच में रोज का खर्च, खाना, नहाना, पढ़ाई और घरवालों से अपनी परेशानी छिपाने की मजबूरी।

फिर भी वे अपनी किताबों के साथ बैठे हैं।

उनके पास शायद वह सब नहीं है जो एक प्रतियोगी छात्र के पास होना चाहिए, लेकिन उनके पास एक चीज जरूर है, अपने लक्ष्य पर भरोसा।

स्वामी विवेकानंद की मशहूर पंक्ति, “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए”, मीनाज के संघर्ष से जैसे जुड़ती हुई दिखाई देती है।

आज मुखर्जी नगर की उस लाइब्रेरी में शायद उनके पास सोने के लिए बिस्तर नहीं है। खाने के लिए रोज का इंतजाम नहीं है। पढ़ाई के लिए महंगी कोचिंग नहीं है।

लेकिन उनके सामने एक सपना है।

एक दिन अफसर बनने का सपना।

और शायद यही सपना उन्हें हर सुबह उस कुर्सी पर वापस बैठा देता है, जहां किताबें उनका सहारा हैं, लाइब्रेरी उनका कमरा है और उम्मीद उनका सबसे बड़ा साथी।

–क़ौमी फ़रमान डिजिटल मीडिया नेटवर्क

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